By the end of this chapter you'll be able to…

  • 1राजेश जोशी और समकालीन जनवादी कविता
  • 2बाल-श्रम की समस्या और कानून
  • 3प्रश्नात्मक काव्य-शैली
  • 4सामाजिक यथार्थवादी कविता की विशेषताएँ
  • 5बच्चों के अधिकार और शिक्षा
💡
Why this chapter matters
राजेश जोशी की यह कविता बाल-श्रम की भयावह सामाजिक समस्या पर तीखा प्रश्न-चिह्न है। समकालीन कविता का सशक्त उदाहरण; सामाजिक चेतना और मानवाधिकार का सजीव पाठ।

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बच्चे काम पर जा रहे हैं — कक्षा 9 हिन्दी (क्षितिज भाग 1)

"बच्चे काम पर जा रहे हैं। सुबह-सुबह बच्चे काम पर जा रहे हैं हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह।" — राजेश जोशी

1. पाठ-परिचय

'बच्चे काम पर जा रहे हैं' राजेश जोशी की एक प्रबल सामाजिक कविता है जो बाल-श्रम की भयावह समस्या को उजागर करती है। यह कविता हमें झकझोरती है — क्या यह स्वीकार्य है कि जिन हाथों में पुस्तक होनी चाहिए, उनमें औज़ार हैं?

पाठ की पृष्ठभूमि

  • भारत में बाल-श्रम एक गंभीर समस्या
  • 1990 के दशक में राजेश जोशी ने यह कविता लिखी
  • संग्रह: 'दो पंक्तियों के बीच'
  • सरकार ने 1986 में बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम बनाया

मुख्य प्रश्न

  • बच्चों का बचपन कौन छीन रहा है?
  • क्या समाज ने बच्चों के अधिकार सुरक्षित किए हैं?
  • पुस्तक, खिलौने, बाग कहाँ खो गए?

2. कवि-परिचय — राजेश जोशी

जीवनवृत्त

  • जन्म: 18 जुलाई 1946, नरसिंहगढ़ (मध्य प्रदेश)
  • शिक्षा: एम.ए., पीएच.डी
  • पुरस्कार: साहित्य अकादमी (2002, 'दो पंक्तियों के बीच')

व्यवसाय

  • कवि, कहानीकार, नाटककार
  • आलोचक, अनुवादक
  • भारतीय भाषा परिषद, भोपाल से जुड़े

प्रमुख रचनाएँ

काव्य-संग्रह:

  • एक दिन बोलेंगे पेड़ (1980)
  • मिट्टी का चेहरा (1983)
  • नेपथ्य में हँसी (1994)
  • दो पंक्तियों के बीच (2000) — साहित्य अकादमी
  • चांद की वर्तनी (2011)

नाटक/कहानी-संग्रह:

  • अच्छे आदमी, टुकड़ों-टुकड़ों में

भाषा-शैली

  • सरल खड़ी बोली
  • आम जन की भाषा
  • सामाजिक चेतना और प्रतिरोध की कविता
  • आधुनिक, यथार्थवादी

कविता की धारा

  • समकालीन कविता
  • सामाजिक यथार्थ-वादी
  • 'जनवादी' काव्य-धारा से प्रभावित

3. कविता का सारांश और भाव

प्रारम्भिक पंक्तियाँ — झकझोर देने वाला दृश्य

बच्चे काम पर जा रहे हैं। सुबह-सुबह बच्चे काम पर जा रहे हैं हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह।

व्याख्या: कविता शुरू ही एक भयानक यथार्थ से होती है। बच्चे, जिन्हें स्कूल जाना चाहिए, सुबह-सुबह काम पर जा रहे हैं। कवि कहते हैं — यह हमारे समय का सबसे भयानक यथार्थ है।

प्रश्न-शृंखला

भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना भयानक है इसे विवरण की तरह पढ़ा जाना लिखा जाना चाहिए सवाल की तरह काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?

व्याख्या: कवि कहते हैं — यह बात केवल वर्णन की तरह नहीं लिखी जानी चाहिए। यह सवाल बनकर खड़ा होना चाहिए — आखिर ये बच्चे क्यों काम पर जा रहे हैं? यानी हमें इसका कारण खोजना चाहिए और समाधान निकालना चाहिए।

कविता का केन्द्रीय प्रश्न

क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें क्या दीमकों ने खा लिया है सारी रंग बिरंगी किताबों को

व्याख्या: यदि बच्चे काम पर जा रहे हैं, तो क्या उनके खिलौने (गेंदें) सब अंतरिक्ष में गिर गई हैं? क्या उनकी रंग-बिरंगी किताबें दीमकों ने खा लीं? यानी क्या कारण है कि बच्चे बचपन छोड़कर श्रम में लग गए?

और प्रश्न

क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं सारे मदरसों की इमारतें

व्याख्या:

  • क्या सब खिलौने काले पहाड़ के नीचे दब गए?
  • क्या सब मदरसे/स्कूल भूकंप में ढह गए?
  • स्पष्ट है — ऐसा कुछ नहीं हुआ। फिर भी बच्चे काम पर जा रहे हैं।

और प्रश्न

क्या तमाम मैदान, बगीचे और घरों के आँगन खत्म हो गए हैं एकाएक

व्याख्या: क्या बच्चों के खेलने के सब मैदान, बगीचे, आँगन खत्म हो गए हैं? यदि नहीं, तो बच्चे वहाँ क्यों नहीं हैं?

कविता का संदेश

तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में कितनी भयानक है यह बात कि होगा अगर ये सब, फिर भी काम पर जाएँगे बच्चे

व्याख्या: यदि किताबें हैं, खिलौने हैं, स्कूल हैं, मैदान हैं — फिर भी बच्चे काम पर जा रहे हैं — तो यह सबसे भयानक स्थिति है। यह स्थिति समाज, सरकार, और हम सबकी विफलता है।

अंतिम पंक्तियाँ

इसे सहज तरीके से रखकर देखना भी जैसा यह वैसा ही रहने देना है

व्याख्या: यदि हम इस स्थिति को 'सहज' मानकर स्वीकार कर लेते हैं — तो यह वैसी ही बनी रहेगी। बदलाव के लिए इसे 'भयानक' मानना ज़रूरी है, और सक्रिय प्रयास करना अनिवार्य है।


4. केन्द्रीय भाव और संदेश

मुख्य मुद्दे

  1. बाल-श्रम: बच्चों का बचपन छीन कर श्रम में डालना अमानवीय।
  2. शिक्षा का अधिकार: हर बच्चे को शिक्षा मिलनी चाहिए।
  3. समाज की विफलता: व्यवस्था ने बच्चों के अधिकार नहीं सुरक्षित किए।
  4. गरीबी की समस्या: मुख्य कारण आर्थिक।
  5. हम सबकी ज़िम्मेदारी: समाज को बदलाव लाना है।

प्रश्नात्मक शैली

  • कवि सीधा संदेश नहीं देते — प्रश्न पूछते हैं
  • ये प्रश्न पाठक के मन में हलचल पैदा करते हैं
  • 'क्या...?' — व्यंग्यात्मक अंदाज़

मार्मिकता

  • 'गेंदें', 'खिलौने', 'किताबें', 'मैदान', 'बगीचे' — बचपन के प्रतीक
  • ये सब हैं, फिर भी बच्चे काम पर — यही विडंबना

5. साहित्यिक विशेषताएँ

भाषा

  • सरल खड़ी बोली
  • आम बोल-चाल की भाषा
  • कविता की पंक्तियाँ गद्य के समान — पर मार्मिक

शैली

  • प्रश्नात्मक: 'क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें?'
  • यथार्थवादी: समाज के सच्चे मुद्दे
  • विवरणात्मक: स्पष्ट चित्र खींचती है

अलंकार

  • प्रश्न-अलंकार: कई व्यंग्यात्मक प्रश्न
  • विरोधाभास: 'सहज तरीके से रखकर देखना'
  • पुनरुक्ति-प्रकाश: 'भयानक' शब्द का बार-बार प्रयोग
  • अनुप्रास: 'सारी रंग बिरंगी किताबों को'

छंद

  • मुक्त छंद (Free Verse)
  • गद्य-कविता

रस

  • करुण रस — बच्चों की दुर्दशा पर
  • रौद्र रस — समाज के विरुद्ध आक्रोश

6. बाल-श्रम — समस्या और तथ्य

भारत में बाल-श्रम

  • अनुमानित 10 करोड़ बाल-श्रमिक (विभिन्न अनुमान)
  • मुख्य क्षेत्र: कृषि, पटाखे, बीड़ी, कालीन, माचिस, खदान
  • मुख्य कारण: गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी

कानून

  • बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986
  • 2016 का संशोधन: 14 वर्ष से कम के बच्चों का सभी प्रकार के काम पर प्रतिबंध
  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (RTE): 6-14 वर्ष के लिए मुफ्त-अनिवार्य शिक्षा

समाधान

  • शिक्षा को पहुँचाना
  • माता-पिता की रोज़गार सहायता
  • सरकारी योजनाएँ (मिड-डे मील, छात्रवृत्तियाँ)
  • सामाजिक जागरूकता
  • बाल-अधिकार आयोग

7. कविता का आधुनिक संदर्भ

आज भी प्रासंगिक

  • बाल-श्रम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ
  • कोरोना-कोविड (2020-21) के बाद बढ़ोतरी
  • आधुनिक रूप: सोशल मीडिया / डोमेस्टिक हेल्प / मोबाइल-शॉप वर्क

सरकारी योजनाएँ

  • PM Schools for Rising India (PM-SHRI)
  • Beti Bachao, Beti Padhao
  • Mid-Day Meal Scheme
  • National Child Labour Project (NCLP)

अंतर्राष्ट्रीय

  • ILO के अनुसार विश्व में 16 करोड़ बाल-श्रमिक
  • UNICEF, Save the Children जैसी संस्थाएँ

8. कविता का संदेश

  1. जागरूकता: समाज को बाल-श्रम की भयावहता समझनी चाहिए।
  2. प्रश्न पूछना: हर अन्याय पर सवाल उठाना ज़रूरी।
  3. सक्रियता: केवल चिंता काफी नहीं — सक्रिय हस्तक्षेप ज़रूरी।
  4. शिक्षा का अधिकार: हर बच्चे को शिक्षा का जन्मसिद्ध अधिकार।
  5. बचपन की रक्षा: बचपन एक मूल्यवान चरण है — इसे संरक्षित करें।

9. प्रमुख उद्धरण

"बच्चे काम पर जा रहे हैं। सुबह-सुबह बच्चे काम पर जा रहे हैं हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह।"

"लिखा जाना चाहिए सवाल की तरह काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?"

"इसे सहज तरीके से रखकर देखना भी जैसा यह वैसा ही रहने देना है।"


10. समापन

'बच्चे काम पर जा रहे हैं' केवल एक कविता नहीं — यह समाज पर एक तीखा प्रश्न-चिह्न है। राजेश जोशी ने सरल भाषा में, गहरी संवेदना से बाल-श्रम की भयावह समस्या को उजागर किया है। यह कविता हमें झकझोरती है — क्या हम बच्चों के बचपन की रक्षा कर पा रहे हैं? क्या हम 'सहज' मानकर अन्याय को स्वीकार कर रहे हैं? कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए यह कविता — सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना, और कर्तव्य-बोध जगाती है।

Key formulas & results

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कवि
राजेश जोशी (जन्म 18 जुलाई 1946)
नरसिंहगढ़, मध्य प्रदेश
साहित्य अकादमी
2002 — 'दो पंक्तियों के बीच' (काव्य-संग्रह)
मूल संग्रह
'दो पंक्तियों के बीच' (2000)
विधा
मुक्त छंद, समकालीन कविता
गद्य-कविता
केन्द्रीय मुद्दा
बाल-श्रम (Child Labour)
सामाजिक समस्या
मुख्य शैली
प्रश्नात्मक — 'क्या...?' की पुनरुक्ति
अन्य रचनाएँ
एक दिन बोलेंगे पेड़, मिट्टी का चेहरा, नेपथ्य में हँसी, चांद की वर्तनी
धारा
समकालीन जनवादी काव्य-धारा
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
कविता को साधारण सामाजिक वर्णन मानना
यह केवल वर्णन नहीं — एक तीखा सामाजिक प्रश्न और आह्वान है। 'सहज तरीके से रखकर देखना' = वैसा ही रहने देना — इसी का खंडन।
WATCH OUT
राजेश जोशी और राजेश रेड्डी को confuse करना
राजेश जोशी (1946-) = हिन्दी कवि, साहित्य अकादमी 2002। राजेश रेड्डी = अलग कवि।
WATCH OUT
'भयानक' का अर्थ डरावना मानना
यहाँ 'भयानक' = अत्यंत गंभीर/अस्वीकार्य/भीषण। कवि सामाजिक त्रासदी को इंगित करते हैं।
WATCH OUT
बाल-श्रम कानून का गलत वर्ष
बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम — 1986। संशोधन — 2016 (14 वर्ष तक पूर्ण प्रतिबंध)। RTE अधिनियम — 2009।

Practice problems

Try each one yourself before tapping "Show solution". Active recall > rereading.

Q1EASY· कवि
'बच्चे काम पर जा रहे हैं' किस संग्रह से ली गई है?
Show solution
✦ उत्तर: 'दो पंक्तियों के बीच' (2000) — राजेश जोशी का साहित्य अकादमी (2002) विजेता काव्य-संग्रह।
Q2EASY· मुद्दा
कविता का मुख्य मुद्दा क्या है?
Show solution
✦ उत्तर: बाल-श्रम (Child Labour) — बच्चों का बचपन और शिक्षा छीनकर उन्हें श्रम में डालना।
Q3MEDIUM· शैली
कविता में कवि प्रश्न-शैली का उपयोग क्यों करते हैं?
Show solution
चरण 1 — कविता का प्रारम्भ। कविता का प्रारम्भ ही एक भयानक यथार्थ से होता है — 'बच्चे काम पर जा रहे हैं'। चरण 2 — कवि की युक्ति। कवि सीधा बयान न देकर प्रश्न पूछते हैं — 'क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें?', 'क्या दीमकों ने खा लिया किताबों को?' चरण 3 — प्रश्नों का प्रभाव। • पाठक की चेतना जगाते हैं • व्यंग्य की तीव्रता बढ़ाते हैं • स्पष्ट 'नहीं' उत्तर देकर समाज पर प्रहार चरण 4 — कविता की मांग। 'लिखा जाना चाहिए सवाल की तरह — काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?' यानी कवि चाहते हैं कि हम भी सवाल पूछें। चरण 5 — संदेश। प्रश्न पूछना सक्रियता की पहली शर्त। समाज के अन्याय के विरुद्ध प्रश्न ही पहला कदम। ✦ उत्तर: कवि प्रश्न-शैली से पाठक की चेतना को जगाते हैं, समस्या की गंभीरता उजागर करते हैं, और समाज को सक्रिय होने के लिए प्रेरित करते हैं। 'क्या...?' की पुनरुक्ति व्यंग्य की तीव्रता बढ़ाती है। यही शैली कविता को सशक्त बनाती है।
Q4MEDIUM· व्याख्या
'इसे सहज तरीके से रखकर देखना भी, जैसा यह वैसा ही रहने देना है' — व्याख्या कीजिए।
Show solution
चरण 1 — पंक्ति का संदर्भ। कविता की अंतिम पंक्तियाँ — कवि एक गहरा संदेश देते हैं। चरण 2 — शाब्दिक अर्थ। यदि इस भयानक स्थिति (बाल-श्रम) को हम 'सहज' (सामान्य) मानकर देखेंगे — तो यह स्थिति ऐसी ही बनी रहेगी; कोई बदलाव नहीं आएगा। चरण 3 — गहरा अर्थ। समाज में अधिकांश लोग बाल-श्रम को देखकर 'अरे, यह तो आम बात है' कहकर आगे बढ़ जाते हैं। यही 'सहज मानना' है। चरण 4 — कवि की चेतावनी। यह सहजता ही समस्या की जड़ है। जब तक हम इसे 'भयानक' और 'अस्वीकार्य' नहीं मानेंगे — कुछ नहीं बदलेगा। चरण 5 — कार्रवाई का आह्वान। कवि चाहते हैं हम सब सक्रिय हों — बाल-श्रम के विरुद्ध संघर्ष करें, बच्चों के अधिकार सुरक्षित करें। ✦ उत्तर: इस पंक्ति में कवि सामाजिक उदासीनता पर तीखा प्रहार करते हैं — यदि हम बाल-श्रम को 'सामान्य' मानकर स्वीकार कर लें, तो यह वैसा ही बना रहेगा। बदलाव के लिए इसे 'भयानक' और अस्वीकार्य मानना ज़रूरी है, और सक्रिय प्रतिकार आवश्यक। यह कविता का मूल आह्वान।
Q5HARD· विश्लेषण
'बच्चे काम पर जा रहे हैं' कविता बाल-श्रम की समस्या और समाज की ज़िम्मेदारी को कैसे उठाती है? विश्लेषण कीजिए।
Show solution
चरण 1 — कविता का परिचय। राजेश जोशी की यह कविता समकालीन हिन्दी काव्य की एक सशक्त सामाजिक रचना। 'दो पंक्तियों के बीच' (2000) संग्रह से। चरण 2 — समस्या का चित्रण। कविता का प्रारम्भ ही — 'बच्चे काम पर जा रहे हैं... हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह।' यह बाल-श्रम की भयानक यथार्थता। चरण 3 — कारणों की खोज। कवि प्रश्न पूछते हैं — क्या किताबें खत्म? क्या खिलौने नष्ट? क्या मैदान-बगीचे समाप्त? उत्तर — नहीं। फिर भी बच्चे काम पर। यह विडंबना। चरण 4 — समाज की विफलता। खिलौने हैं, स्कूल हैं, बगीचे हैं — फिर भी बच्चे श्रम में। यह स्पष्ट दिखाता है — समस्या व्यवस्था में है, साधनों में नहीं। चरण 5 — समाज की ज़िम्मेदारी। कवि स्पष्ट करते हैं — 'सहज मानना' = बदलाव न आना। समाज की उदासीनता ही समस्या को बनाए रखती है। चरण 6 — आह्वान। कविता एक सक्रिय प्रतिकार का आह्वान — प्रश्न पूछो, चुप मत रहो, बाल-श्रम के विरुद्ध संघर्ष करो। चरण 7 — आज की प्रासंगिकता। बाल श्रम अधिनियम 1986, RTE 2009 के बाद भी समस्या बरकरार। कविता आज भी प्रासंगिक — कोरोना के बाद बाल-श्रम बढ़ा। ✦ उत्तर: राजेश जोशी की कविता बाल-श्रम की भयावह यथार्थता को प्रश्न-शैली में उठाती है — किताबें, खिलौने, स्कूल, मैदान सब हैं फिर भी बच्चे श्रम में — यह व्यवस्था की विफलता। कवि स्पष्ट कहते हैं समाज की उदासीनता ('सहज मानना') ही समस्या बनाए रखती है। कविता एक सक्रिय प्रतिकार का आह्वान — प्रश्न पूछो, संघर्ष करो। आज भी जब लाखों बच्चे श्रम में हैं — यह कविता हमारी अंतरात्मा को झकझोरती है।

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • कवि: राजेश जोशी (जन्म 18 जुलाई 1946), नरसिंहगढ़, MP
  • संग्रह: 'दो पंक्तियों के बीच' (2000)
  • पुरस्कार: साहित्य अकादमी 2002
  • मुख्य मुद्दा: बाल-श्रम (Child Labour)
  • शैली: प्रश्नात्मक, मुक्त छंद, गद्य-कविता
  • अलंकार: प्रश्न-अलंकार, पुनरुक्ति, अनुप्रास, विरोधाभास
  • रस: करुण + रौद्र
  • केन्द्रीय संदेश: सामाजिक चेतना + सक्रिय प्रतिकार
  • अंतिम पंक्ति: 'इसे सहज तरीके से रखकर देखना भी, जैसा यह वैसा ही रहने देना है'
  • अन्य रचनाएँ: एक दिन बोलेंगे पेड़, मिट्टी का चेहरा, नेपथ्य में हँसी
  • धारा: समकालीन जनवादी कविता
  • बाल-श्रम कानून: 1986 (बाल श्रम अधिनियम), 2016 संशोधन, 2009 RTE

CBSE marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: 5–6 अंक प्रति बोर्ड पेपर

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय / अति लघु11–2कवि; संग्रह; मुद्दा; पुरस्कार
व्याख्या-आधारित2–31पंक्तियों की व्याख्या; प्रश्न-शैली
लघु उत्तरीय31बाल-श्रम का चित्रण; समाज की भूमिका
दीर्घ उत्तरीय50–1कविता का सामाजिक विश्लेषण; आधुनिक प्रासंगिकता
Prep strategy
  • कवि का परिचय — राजेश जोशी, साहित्य अकादमी 2002
  • मूल संग्रह 'दो पंक्तियों के बीच'
  • प्रश्न-शैली के उदाहरण याद रखें
  • बाल-श्रम के तथ्य — कानून 1986, RTE 2009
  • केन्द्रीय संदेश: 'सहज मानना' = बदलाव न आना
  • आज की प्रासंगिकता पर 1-2 वाक्य

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

बाल-अधिकार आंदोलन

कैलाश सत्यार्थी (नोबेल शांति 2014) जैसे कार्यकर्ता बाल-श्रम के विरुद्ध संघर्षरत।

Right to Education Act 2009

6-14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त-अनिवार्य शिक्षा का संवैधानिक अधिकार।

Bachpan Bachao Andolan

1980 में कैलाश सत्यार्थी द्वारा स्थापित — हज़ारों बाल-श्रमिकों को मुक्त कराया।

PM-SHRI Schools

2022 में लॉन्च — 14,500 स्कूलों का उन्नयन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का प्रसार।

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

  1. कवि का संक्षिप्त परिचय — राजेश जोशी, साहित्य अकादमी 2002
  2. मुख्य मुद्दा बाल-श्रम स्पष्ट लिखें
  3. प्रश्न-शैली पर बल — व्यंग्य की तीव्रता
  4. बाल-श्रम कानून 1986 का उल्लेख — exam में अंक
  5. अंतिम पंक्ति का गहरा अर्थ ज़रूर दें
  6. आज की प्रासंगिकता पर 1-2 वाक्य — कैलाश सत्यार्थी, RTE Act

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

  • जनवादी कविता का इतिहास — नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल से राजेश जोशी तक
  • कैलाश सत्यार्थी का बाल-श्रम विरोधी आंदोलन (Nobel 2014)
  • ILO की बाल-श्रम पर रिपोर्ट
  • भारत के बाल-अधिकार कानूनों का इतिहास: 1986, 2009, 2016
  • तुलना: मुक्तिबोध की 'अँधेरे में' से जनवादी कविता-परंपरा

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

CBSE Board Class 9उच्च
हिन्दी ओलिंपियाडउच्च
UGC NET हिन्दीउच्च — समकालीन कविता
UPSC Sociology Optionalमध्यम — बाल-श्रम विषय
CTET हिन्दीमध्यम

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

यह शीर्षक एक साधारण-सा कथन है — पर भयावह यथार्थ को सामने रखता है। बच्चे जिन्हें स्कूल जाना चाहिए, वे काम पर — यह विरोधाभास ही शीर्षक को सशक्त बनाता है। कवि स्वयं कहते हैं — 'हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह।'

नहीं। 1986 का बाल-श्रम अधिनियम, 2009 का RTE Act, 2016 का संशोधन — सब आ चुके हैं, फिर भी अनुमानित 10 करोड़ बच्चे विभिन्न रूपों में श्रम में लगे हैं। कोरोना के बाद यह बढ़ा है। कृषि, घरेलू कार्य, छोटी फैक्ट्रियाँ — मुख्य क्षेत्र।

दोनों ही जनवादी/प्रगतिशील कविता-धारा से जुड़े हैं। दोनों सामाजिक यथार्थ पर लिखते हैं। मुक्तिबोध आधुनिक काव्य के पुरोधा; राजेश जोशी समकालीन कवि। दोनों मध्य प्रदेश से जुड़े।
Verified by the tuition.in editorial team
Last reviewed on 20 May 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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