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  • 1यशपाल और मार्क्सवादी हिन्दी साहित्य
  • 2वर्ग-भेद और सामाजिक असमानता
  • 3सामाजिक-यथार्थवादी कहानी की विशेषताएँ
  • 4तुलनात्मक शैली का साहित्यिक प्रयोग
  • 5गरीबी और मानवीय गरिमा
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Why this chapter matters
यशपाल की यह कहानी वर्ग-भेद और सामाजिक असमानता पर तीखा प्रहार करती है। 'दुःख का अधिकार' सार्वभौमिक होना चाहिए, पर वास्तव में वर्ग-आधारित है — मार्मिक संदेश।

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दुःख का अधिकार — कक्षा 9 हिन्दी B (स्पर्श भाग 1)

"मनुष्य की पोशाक ही उसके अधिकार और महत्त्व का परिचय देती है।" — यशपाल

1. पाठ-परिचय

'दुःख का अधिकार' यशपाल की एक प्रसिद्ध कहानी है जो सामाजिक असमानता, वर्ग-भेद, और गरीबी की दुर्दशा पर तीखा प्रहार करती है। कहानी का मूल प्रश्न — क्या दुःख मनाने का अधिकार भी वर्ग के अनुसार होता है?

मुख्य भाव

  • वर्ग-भेद का यथार्थ
  • गरीबी की मजबूरी
  • दोहरे सामाजिक मानदंड
  • मानवीय संवेदना
  • 'दुःख' का सार्वभौमिक स्वरूप

कहानी का स्रोत

  • कहानी-संग्रह: 'अभिशप्त' / 'वो दुनिया'

2. लेखक-परिचय — यशपाल

जीवनवृत्त

  • जन्म: 3 दिसंबर 1903, फिरोज़पुर छावनी (पंजाब)
  • मृत्यु: 26 दिसंबर 1976, लखनऊ
  • शिक्षा: D.A.V. कॉलेज, लाहौर
  • उपाधि: स्वतंत्रता-सेनानी और मार्क्सवादी लेखक

स्वतंत्रता-संग्राम में योगदान

  • हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़े
  • भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु के साथी
  • क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय
  • 1932 में गिरफ़्तार, 14 साल जेल में
  • 1938 में रिहा

वैचारिक झुकाव

  • मार्क्सवादी / प्रगतिवादी
  • सामाजिक यथार्थवाद
  • वर्ग-संघर्ष पर बल
  • स्त्री-स्वातंत्र्य के पक्षधर

प्रमुख रचनाएँ

उपन्यास:

  • दादा कामरेड (1941)
  • देशद्रोही (1943)
  • दिव्या (1945)
  • झूठा सच (दो भाग — 1958, 1960) — विभाजन-त्रासदी का महाकाव्य
  • मेरी, तेरी, उसकी बात (1974) — साहित्य अकादमी

कहानी-संग्रह:

  • तर्क का तूफ़ान, अभिशप्त, ज्ञानदान, फूलो का कुर्ता

आत्मकथा:

  • सिंहावलोकन (4 खंड)

सम्मान

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1976) — 'मेरी, तेरी, उसकी बात'
  • पद्मभूषण (1970)

भाषा-शैली

  • सरल खड़ी बोली
  • सामाजिक-यथार्थवादी
  • मार्क्सवादी विश्लेषण
  • तीखा व्यंग्य
  • संवेदनशील

3. पाठ का सारांश

प्रारंभ — लेखक का दृश्य

दृश्य: एक बाज़ार। लेखक खरबूज़े खरीदने जाते हैं। बाज़ार में एक बुढ़िया उदास बैठी है — खरबूज़े बेचने के लिए। पास में टोकरी में रखे हैं खरबूज़े।

बुढ़िया:

  • 60-65 वर्ष की दुर्बल स्त्री
  • फटे-पुराने कपड़े
  • आँखों में आँसू
  • सिर पर खूब बँधा घूँघट
  • कोई ग्राहक नहीं

बुढ़िया से सामना

लेखक के मन में सवाल:

  • क्यों रो रही है?
  • क्या हुआ?
  • ग्राहक उसकी ओर क्यों नहीं आते?

आसपास के लोगों की बातचीत:

  • एक ग्राहक — 'बेशर्म औरत! बेटा मर गया, उसकी लाश घर में पड़ी है, और यहाँ खरबूज़े बेचने आ बैठी!'
  • दूसरा — 'पाप ही पाप!'
  • बुढ़िया चुपचाप बैठी, अपने आँसू पोंछती।

बुढ़िया का दुःख

सत्य का पता चला:

  • बुढ़िया के 23 साल के बेटे की साँप के काटने से मृत्यु हुई थी।
  • वह दो दिन से उपवास पर थी।
  • घर में रोटी नहीं।
  • बहू को बुखार।
  • बच्चे भूख से बिलख रहे।
  • मजबूरी में बुढ़िया खरबूज़े बेचने आई।

लेखक का मन:

  • दुःख से भर गया।
  • मानवीय संवेदना जाग गई।
  • 'यह कैसा समाज?' — प्रश्न उठा।

दूसरा प्रसंग — संभ्रांत महिला

तुलना: लेखक के मन में पिछले साल की एक घटना याद आती है:

  • शहर की एक संभ्रांत महिला (Wealthy lady) का बेटा भी मरा था।
  • उसके पास पैसा था
  • दुःख मनाने के लिए समय भी था
  • दो माह तक डॉक्टरों ने 'शोक से मानसिक स्थिति' का इलाज किया।
  • घर में सब रिश्तेदार जमा।
  • बहुत आँसू, बहुत सहानुभूति।
  • अंत-संस्कार भव्य।
  • शोक-संदेश के पन्ने भर गए।

यह दुःख समाज ने 'मान्य' (पहचान) किया

कहानी का केन्द्रीय प्रश्न

बुढ़िया के बारे में:

  • वही दुःख — बेटे की मृत्यु।
  • पर समाज की प्रतिक्रिया अलग।
  • क्यों? — क्योंकि वह गरीब है
  • गरीब को 'दुःख मनाने का अधिकार' भी नहीं!

लेखक का व्यंग्य:

  • 'मनुष्य की पोशाक ही उसके अधिकार और महत्त्व का परिचय देती है।'
  • अमीर के लिए सब कुछ — समय, सहानुभूति, सम्मान।
  • गरीब के लिए — मजबूरी, अपमान, उपेक्षा।

कहानी का अंत

  • लेखक खरबूज़े खरीदता है (दया से, सम्मान से)।
  • पर मन भारी है।
  • सोचता है — कैसा यह असमान समाज?
  • दुःख तो सार्वभौमिक है — पर अधिकार वर्ग-आधारित।

4. केन्द्रीय भाव और संदेश

मुख्य मुद्दे

  1. वर्ग-भेद: समाज में अमीर-गरीब का गहरा अंतर।
  2. दोहरे मानदंड: एक ही घटना पर वर्ग-आधारित प्रतिक्रिया।
  3. गरीबी की मजबूरी: रोटी के लिए मातम छोड़ना।
  4. मानवीय संवेदना का अभाव: समाज की कठोरता।
  5. दुःख का अधिकार: यह सबका अधिकार है — पर वास्तव में सीमित।

प्रतीक

  • बुढ़िया: गरीब वर्ग की प्रतीक
  • संभ्रांत महिला: अमीर वर्ग की प्रतीक
  • खरबूज़े: गरीबी की पहचान
  • पोशाक: सामाजिक स्थिति का संकेत

5. साहित्यिक विशेषताएँ

विधा

  • कहानी / लघुकथा
  • यथार्थवादी
  • सामाजिक प्रतिबद्धता

भाषा

  • सरल खड़ी बोली
  • भावप्रवण
  • तीखा व्यंग्य
  • मार्मिक

शैली

  • तुलनात्मक: दो दुःखों की तुलना
  • विश्लेषणात्मक: कारणों की खोज
  • व्यंग्यात्मक: समाज के दोहरे मानदंडों पर

अलंकार

  • विरोधाभास: एक ही दुःख की अलग-अलग सामाजिक प्रतिक्रिया
  • रूपक: 'पोशाक' = वर्ग-पहचान
  • व्यंग्य: 'दुःख का अधिकार' स्वयं व्यंग्यात्मक

रस

  • करुण रस — बुढ़िया का दुःख
  • रौद्र रस — समाज के विरुद्ध आक्रोश

6. मार्क्सवादी विश्लेषण

वर्ग-संघर्ष का चित्रण

यशपाल मार्क्सवादी विचारक थे — यह कहानी उनके विचारों का जीवंत उदाहरण:

  1. पूँजीवादी समाज: अमीर के लिए सब अधिकार।
  2. श्रमिक वर्ग: गरीब को रोटी के लिए मातम छोड़ना।
  3. समाज की मानसिकता: वर्ग-आधारित प्रतिक्रिया।
  4. असमानता: मूलभूत समस्या।

समाधान — मार्क्सवादी दृष्टि

  • वर्ग-भेद का अंत
  • समान अधिकार
  • आर्थिक न्याय
  • मानवीय गरिमा सबको

7. कहानी के विशेष तत्व

बुढ़िया का चरित्र-चित्रण

बाहरी रूप:

  • दुर्बल, 60-65 वर्ष
  • फटे कपड़े
  • आँखों में आँसू

आंतरिक स्थिति:

  • गहरी पीड़ा
  • मजबूरी
  • सम्मान का अभाव
  • अकेली, बेसहारा

प्रेरणा:

  • बच्चों के लिए जीना
  • रोटी के लिए संघर्ष
  • अंतिम सहारा

समाज के लोग

व्यापारी:

  • संवेदनहीन
  • बस लाभ-हानि का चिंतन
  • गरीब को इंसान नहीं मानते

ग्राहक:

  • 'बेशर्म औरत!' — कठोर शब्द
  • 'पाप!' — धार्मिक आधार पर निंदा
  • मानवीय भावना का अभाव

लेखक:

  • संवेदनशील
  • सच को पहचानने की क्षमता
  • मार्क्सवादी विश्लेषण

8. आज की प्रासंगिकता

वर्तमान भारत में

गरीबी आज भी:

  • 22 करोड़ लोग गरीबी-रेखा से नीचे (2024 अनुमान)
  • ग्रामीण-शहरी असमानता
  • कृषक संकट
  • दिहाड़ी मज़दूर

दोहरे मानदंड:

  • अमीर-गरीब की अलग-अलग न्याय
  • अमीर के लिए सुविधाएँ, गरीब के लिए संघर्ष
  • सोशल मीडिया में भी वर्ग-भेद दिखाई देता

सरकारी प्रयास

  • MGNREGA (2005) — ग्रामीण रोज़गार गारंटी
  • PM Garib Kalyan Yojana — गरीबों के लिए राशन
  • Ayushman Bharat — स्वास्थ्य बीमा
  • PM-Kisan — किसानों को वित्तीय सहायता

सामाजिक चुनौतियाँ

  • गरीबी-उन्मूलन
  • आर्थिक असमानता
  • शिक्षा का प्रसार
  • स्वास्थ्य-सेवाएँ
  • मानवीय गरिमा

कहानी का संदेश आज

  • हर मनुष्य की समान गरिमा
  • गरीबी को 'पाप' न समझें
  • वास्तविक संवेदना बढ़ाएँ
  • वर्ग-भेद कम करें

9. प्रमुख उद्धरण

"मनुष्य की पोशाक ही उसके अधिकार और महत्त्व का परिचय देती है।"

"बेशर्म औरत! बेटा मर गया है और खरबूज़े बेचने आई!" (कठोर समाज)

"दुःख का भी एक वर्ग होता है।" (यशपाल का व्यंग्य)


10. यशपाल के अन्य कार्य

'झूठा सच' (दो भाग) — महाकाव्यात्मक उपन्यास

  • 1947 के विभाजन पर
  • 'वतन और देश' (1958) + 'देश का भविष्य' (1960)
  • हिन्दी का अद्भुत विभाजन-साहित्य

क्रांतिकारी जीवन

  • HSRA के साथी
  • भगत सिंह के मित्र
  • 14 साल जेल में
  • स्वतंत्रता के बाद लेखन को समर्पित

11. समापन

'दुःख का अधिकार' केवल एक कहानी नहीं — यह वर्ग-भेद और सामाजिक असमानता पर एक तीखा प्रहार है। यशपाल ने मार्मिक शैली में एक गरीब बुढ़िया और एक संभ्रांत महिला की तुलना से समाज के दोहरे मानदंड उजागर किए हैं। 'दुःख का अधिकार' — यह सार्वभौमिक होना चाहिए, पर वास्तव में वर्ग-आधारित है। यह पाठ हमें झकझोरता है — क्या हम सच में मानवीय हैं? क्या हम गरीबों को इंसान मानते हैं? कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए यह कहानी — सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना, और वर्ग-न्याय का अद्भुत स्रोत।

Key formulas & results

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लेखक
यशपाल (1903-1976) — स्वतंत्रता-सेनानी और मार्क्सवादी लेखक
जन्म
3 दिसंबर 1903, फिरोज़पुर छावनी (पंजाब)
क्रांतिकारी जीवन
HSRA सदस्य; भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद के साथी; 14 साल जेल
1932-1938
साहित्य अकादमी
1976 — 'मेरी, तेरी, उसकी बात'
प्रमुख उपन्यास
दादा कामरेड, दिव्या, झूठा सच (विभाजन पर महाकाव्य)
मुख्य पात्र
बुढ़िया (खरबूज़े बेचने वाली); संभ्रांत महिला (तुलना); लेखक
केन्द्रीय मुद्दा
वर्ग-भेद + सामाजिक असमानता + मानवीय संवेदना
केन्द्रीय उद्धरण
'मनुष्य की पोशाक ही उसके अधिकार और महत्त्व का परिचय देती है'
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
यशपाल को केवल लेखक मानना
यशपाल = स्वतंत्रता-सेनानी (HSRA), क्रांतिकारी, मार्क्सवादी लेखक — सब रूपों में। भगत सिंह के साथी थे; 14 साल जेल में रहे।
WATCH OUT
बुढ़िया के बेटे की मृत्यु का कारण
बेटे की मृत्यु साँप के काटने से हुई थी। यह तथ्य कहानी में महत्वपूर्ण।
WATCH OUT
बुढ़िया और संभ्रांत महिला की तुलना भूलना
कहानी का मूल — दो दुःखों की तुलना। बुढ़िया (गरीब) — मजबूरी में काम; संभ्रांत महिला (अमीर) — 2 माह डॉक्टरी-इलाज, भव्य अंत-संस्कार।
WATCH OUT
यशपाल की प्रसिद्ध रचना भूलना
'झूठा सच' (2 भाग, 1958-60) — विभाजन पर महाकाव्यात्मक उपन्यास। साहित्य अकादमी 1976 'मेरी, तेरी, उसकी बात' को।

Practice problems

Try each one yourself before tapping "Show solution". Active recall > rereading.

Q1EASY· लेखक
यशपाल का संबंध किस क्रांतिकारी संगठन से था?
Show solution
✦ उत्तर: हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) — भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु के साथी। 1932 में गिरफ़्तार, 14 साल जेल में।
Q2EASY· मृत्यु-कारण
बुढ़िया के बेटे की मृत्यु किस कारण हुई?
Show solution
✦ उत्तर: साँप के काटने से — 23 साल के बेटे की मृत्यु। बुढ़िया दो दिन से उपवास, घर में रोटी नहीं।
Q3MEDIUM· बुढ़िया-दुःख
बुढ़िया के दुःख और मजबूरी का वर्णन कीजिए।
Show solution
चरण 1 — बेटे की मृत्यु। बुढ़िया के 23 साल के बेटे की साँप के काटने से अचानक मृत्यु। चरण 2 — पारिवारिक संकट। • घर में बहू को बुखार • बच्चे भूख से बिलखते • घर में रोटी नहीं • बुढ़िया दो दिन से उपवास चरण 3 — मजबूरी। बुढ़िया अपने मातम-दुःख को छोड़कर बाज़ार में खरबूज़े बेचने आई — परिवार के लिए रोटी कमाने। चरण 4 — समाज की प्रतिक्रिया। ग्राहक उसे 'बेशर्म' कहते — 'बेटा मर गया, और यहाँ खरबूज़े बेचने आ बैठी!' किसी ने सच को समझा नहीं। चरण 5 — आंतरिक दुःख। बाहर खरबूज़े बेचती; भीतर बेटे के लिए रोती; आँखों से आँसू बहते; पर बच्चों के लिए मजबूर। ✦ उत्तर: बुढ़िया के 23 साल के बेटे की साँप-काटने से मृत्यु हो गई। घर में बहू बीमार, बच्चे भूखे, रोटी नहीं। मजबूरी में मातम छोड़कर खरबूज़े बेचने आई। ग्राहक उसे 'बेशर्म' कहते, सच नहीं समझते। यह गरीबी की चरम मजबूरी — दुःख मनाने का भी अधिकार नहीं।
Q4MEDIUM· तुलना
बुढ़िया और संभ्रांत महिला के दुःख की तुलना से लेखक क्या संदेश देता है?
Show solution
चरण 1 — दो प्रसंगों की प्रस्तुति। कहानी में लेखक दो दुःखों की तुलना करता है — गरीब बुढ़िया का बेटा खोना और एक संभ्रांत महिला का बेटा खोना। चरण 2 — संभ्रांत महिला का दुःख। • पैसा प्रचुर • 2 माह डॉक्टरी-इलाज (शोक के लिए) • रिश्तेदार जमा • बहुत सहानुभूति • भव्य अंत-संस्कार • शोक-संदेशों के पन्ने • समाज ने दुःख 'मान्य' किया चरण 3 — बुढ़िया का दुःख। • गरीबी • मजबूरी में काम • कोई सहानुभूति नहीं • अपमान — 'बेशर्म!' • दुःख अनदेखा चरण 4 — विरोधाभास। एक ही दुःख (बेटे की मृत्यु) — पर सामाजिक प्रतिक्रिया वर्ग-आधारित। यही 'दुःख का अधिकार' का व्यंग्य। चरण 5 — संदेश। • वर्ग-भेद समाज की सबसे बड़ी बुराई • गरीब को 'दुःख मनाने' का भी अधिकार नहीं • 'पोशाक' = सामाजिक स्थिति का संकेत • मानवीय गरिमा सबको समान ✦ उत्तर: तुलना से लेखक वर्ग-भेद और सामाजिक असमानता पर तीखा प्रहार करते हैं। एक ही दुःख — पर अमीर के लिए सब सहानुभूति, सम्मान, समय; गरीब के लिए अपमान, मजबूरी, उपेक्षा। 'दुःख का अधिकार' सार्वभौमिक होना चाहिए, पर वास्तव में वर्ग-आधारित। समाज को मानवीय गरिमा का सम्मान सबको देना चाहिए।
Q5HARD· विश्लेषण
यशपाल के इस कहानी में वर्ग-भेद, सामाजिक असमानता, और मानवीय संवेदना का विश्लेषण कीजिए।
Show solution
चरण 1 — कहानी का परिचय। यशपाल की 'दुःख का अधिकार' मार्क्सवादी सामाजिक यथार्थवाद का उत्कृष्ट उदाहरण। चरण 2 — मार्क्सवादी दृष्टि। यशपाल HSRA सदस्य, मार्क्सवादी विचारक। उनके लिए साहित्य सामाजिक परिवर्तन का माध्यम। चरण 3 — वर्ग-भेद का चित्रण। • अमीर वर्ग: सब अधिकार, समय, सहानुभूति • गरीब वर्ग: मजबूरी, अपमान, उपेक्षा • एक ही दुःख — दो प्रतिक्रियाएँ चरण 4 — सामाजिक असमानता। 'मनुष्य की पोशाक ही उसके अधिकार और महत्त्व का परिचय देती है' — यह मूल वाक्य। पोशाक = वर्ग = अधिकार। चरण 5 — मानवीय संवेदना का अभाव। ग्राहक बुढ़िया को 'बेशर्म' कहते — सच नहीं पूछते, मानवीयता नहीं दिखाते। समाज की कठोरता। चरण 6 — लेखक की संवेदनशीलता। लेखक ही एकमात्र संवेदनशील पात्र — सच को समझता, बुढ़िया से सहानुभूति। यह मार्क्सवादी विचारक का दृष्टिकोण। चरण 7 — आज की प्रासंगिकता। आज भी भारत में 22 करोड़ गरीबी-रेखा से नीचे। वर्ग-भेद बरकरार। दिहाड़ी मज़दूर, कृषक — आज की 'बुढ़िया'। चरण 8 — सरकारी प्रयास। MGNREGA, PM Garib Kalyan, Ayushman Bharat — पर पूर्ण समाधान नहीं। चरण 9 — संदेश। • वर्ग-भेद कम करें • हर मनुष्य की समान गरिमा • गरीबी को 'पाप' न समझें • वास्तविक संवेदना ज़रूरी चरण 10 — मूल्यांकन। यशपाल की यह कहानी समय-कालीन — आज भी प्रासंगिक। मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय के लिए हम सब का दायित्व। ✦ उत्तर: यशपाल की 'दुःख का अधिकार' मार्क्सवादी दृष्टि से वर्ग-भेद और सामाजिक असमानता का तीखा चित्रण है। एक गरीब बुढ़िया और एक संभ्रांत महिला के दुःख की तुलना से समाज के दोहरे मानदंड उजागर। 'मनुष्य की पोशाक ही उसके अधिकार का परिचय देती है' — मूल वाक्य। समाज की संवेदनहीनता पर तीखा व्यंग्य। आज के भारत में भी प्रासंगिक — हर मनुष्य की समान गरिमा का संदेश। साहित्य द्वारा सामाजिक परिवर्तन का उत्कृष्ट उदाहरण।

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • लेखक: यशपाल (1903-1976), स्वतंत्रता-सेनानी और मार्क्सवादी लेखक
  • जन्म: 3 दिसंबर 1903, फिरोज़पुर छावनी (पंजाब)
  • क्रांतिकारी जीवन: HSRA, भगत सिंह के साथी, 14 साल जेल (1932-1938)
  • साहित्य अकादमी 1976 — 'मेरी, तेरी, उसकी बात'
  • पद्मभूषण 1970
  • मुख्य उपन्यास: दादा कामरेड, दिव्या, झूठा सच (विभाजन-महाकाव्य)
  • बुढ़िया: 60-65 वर्ष, गरीब, खरबूज़े बेचती
  • बेटा: 23 साल, साँप के काटने से मृत्यु
  • घर: बहू बीमार, बच्चे भूखे, रोटी नहीं
  • संभ्रांत महिला: तुलना के लिए — 2 माह डॉक्टरी-इलाज, भव्य अंत-संस्कार
  • केन्द्रीय वाक्य: 'मनुष्य की पोशाक ही उसके अधिकार का परिचय देती है'
  • केन्द्रीय मुद्दा: वर्ग-भेद, सामाजिक असमानता, दोहरे मानदंड
  • विधा: सामाजिक-यथार्थवादी कहानी

CBSE marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: 4–5 अंक प्रति बोर्ड पेपर

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय / अति लघु11–2लेखक; पात्र; मृत्यु-कारण; मुख्य भाव
लघु उत्तरीय31बुढ़िया का दुःख; वर्ग-तुलना; समाज की प्रतिक्रिया
दीर्घ उत्तरीय50–1वर्ग-भेद विश्लेषण; मार्क्सवादी दृष्टि; आज की प्रासंगिकता
Prep strategy
  • लेखक यशपाल — स्वतंत्रता-सेनानी, मार्क्सवादी, साहित्य अकादमी 1976
  • HSRA, भगत सिंह से जुड़ाव
  • बुढ़िया का दुःख — बेटे की साँप-काटने से मृत्यु; घर की मजबूरी
  • संभ्रांत महिला से तुलना — दोहरे मानदंड
  • केन्द्रीय वाक्य: 'मनुष्य की पोशाक ही उसके अधिकार और महत्त्व का परिचय देती है'
  • मार्क्सवादी विश्लेषण और आज की प्रासंगिकता

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

MGNREGA (2005)

ग्रामीण रोज़गार गारंटी — गरीबों को 100 दिन का काम। यशपाल की 'बुढ़िया' जैसे लोगों के लिए राहत।

PM Garib Kalyan Anna Yojana

कोविड-19 के बाद गरीबों के लिए मुफ्त राशन योजना — 80 करोड़ लाभार्थी।

Ayushman Bharat

गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा — ₹5 लाख तक का इलाज।

विश्व बैंक गरीबी-डेटा

भारत में 22 करोड़+ लोग गरीबी-रेखा से नीचे (2024 अनुमान)।

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

  1. यशपाल का परिचय — स्वतंत्रता-सेनानी + मार्क्सवादी लेखक
  2. HSRA, भगत सिंह से जुड़ाव ज़रूर लिखें
  3. बुढ़िया के दुःख का सजीव वर्णन
  4. संभ्रांत महिला से तुलना — दोहरे मानदंड
  5. केन्द्रीय वाक्य ('पोशाक' वाला) ज़रूर quote करें
  6. मार्क्सवादी दृष्टि से वर्ग-भेद की व्याख्या
  7. आज की प्रासंगिकता — MGNREGA, गरीबी-आँकड़े

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

  • यशपाल का 'झूठा सच' — हिन्दी विभाजन-साहित्य की मील का पत्थर
  • मार्क्सवादी हिन्दी साहित्य की परंपरा: यशपाल, नागार्जुन, मुक्तिबोध, राहुल सांकृत्यायन
  • HSRA का इतिहास और भगत सिंह से जुड़ी पुस्तकें
  • वर्ग-भेद पर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य: चार्ल्स डिकेंस, जॉन स्टीनबेक
  • भारत में गरीबी-निवारण योजनाओं का इतिहास

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

CBSE Board Class 9उच्च
हिन्दी ओलिंपियाडमध्यम
UGC NET हिन्दीउच्च — मार्क्सवादी कथा-साहित्य
UPSC Sociology Optionalमध्यम — वर्ग-भेद, गरीबी
CTET हिन्दीमध्यम

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

यशपाल लाहौर के D.A.V. कॉलेज में पढ़ते समय क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) में शामिल हुए — जहाँ भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदेव जैसे नेता थे। 1932 में गिरफ़्तार होकर 14 साल जेल में बिताए। 1938 में रिहा। बाद में लेखन को जीवन समर्पित किया।

मार्क्सवादी साहित्य = कार्ल मार्क्स के विचारों से प्रेरित साहित्य। मूल विचार — वर्ग-संघर्ष, पूँजीवाद-विरोध, श्रमिक-वर्ग की मुक्ति। हिन्दी में यशपाल, नागार्जुन, मुक्तिबोध, राहुल सांकृत्यायन, अमृतलाल नागर जैसे लेखक मार्क्सवादी प्रवृत्ति के।

'झूठा सच' (2 भाग, 1958-60) — 1947 के विभाजन पर हिन्दी का महाकाव्यात्मक उपन्यास। भाग 1 'वतन और देश' (1958), भाग 2 'देश का भविष्य' (1960)। पंजाब के एक परिवार के माध्यम से विभाजन की त्रासदी। हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ विभाजन-उपन्यासों में।
Verified by the tuition.in editorial team
Last reviewed on 20 May 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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