इस जल प्रलय में — कक्षा 9 हिन्दी (कृतिका)
"बाढ़ की ख़बर सुनकर मैंने इसे अनेक रिपोर्टों में पढ़ा था, लेकिन देखी पहली बार थी।" — फणीश्वरनाथ रेणु
1. पाठ-परिचय
'इस जल प्रलय में' फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा रचित एक रिपोर्ताज है। यह 1975 में बिहार में आई भयानक पटना की बाढ़ का साक्षात अनुभव-वर्णन है। लेखक स्वयं पटना में थे और इस आपदा का उन्होंने सजीव चित्रण किया।
विधा-परिचय: रिपोर्ताज
- रिपोर्ताज = फ्रेंच शब्द (Reportage)
- अर्थ: 'आँखों देखी रिपोर्ट'
- पत्रकारिता + साहित्य का संगम
- वास्तविक घटना का साहित्यिक चित्रण
- तथ्य + भावना दोनों
पाठ की पृष्ठभूमि
- तिथि: अगस्त-सितंबर 1975
- स्थान: पटना, बिहार
- घटना: गंगा और गंडक नदियों में भयानक बाढ़
- प्रभाव: लाखों लोग प्रभावित, हज़ारों मरे
2. लेखक-परिचय — फणीश्वरनाथ रेणु
जीवनवृत्त
- जन्म: 4 मार्च 1921, औराही हिंगना (पूर्णिया, अब अररिया, बिहार)
- मृत्यु: 11 अप्रैल 1977
- उपाधि: 'आँचलिक उपन्यासकार' / 'धरती के लाल'
विशेष
- आँचलिक साहित्य के सर्वोच्च लेखक
- गांधी-वादी, समाजवादी
- स्वतंत्रता-सेनानी
- नेपाल के क्रांतिकारी आंदोलन (1950) में भाग लिया
- 1975 में आपातकाल के विरोध में पद्मश्री लौटाया
प्रमुख रचनाएँ
उपन्यास:
- मैला आँचल (1954) — हिन्दी का प्रथम आँचलिक उपन्यास
- परती परिकथा (1957)
- कितने चौराहे (1966)
- जुलूस (1965)
- दीर्घतपा (1973)
कहानी-संग्रह:
- ठुमरी, अग्निखोर, अच्छे आदमी
रिपोर्ताज-संग्रह:
- ऋणजल-धनजल (इसी में 'इस जल प्रलय में' है)
- आत्म-परिचय
फिल्म:
- 'तीसरी कसम' (1966) — उनकी कहानी 'तीसरी कसम अर्थात मारे गए गुलफाम' पर आधारित
भाषा-शैली
- आँचलिक हिन्दी — बिहार/पूर्णिया की बोली
- सरल, ठेठ, ज़मीनी
- हिन्दी, मैथिली, भोजपुरी का मिश्रण
- संवेदनशील, भावप्रवण
- सांस्कृतिक रंग
3. पाठ का सारांश
बाढ़ का आगमन
प्रारंभ:
- सितंबर 1975, पटना
- गंगा और गंडक नदियों में पानी बढ़ रहा था
- रेडियो पर समाचार — पानी खतरे के निशान से ऊपर
- लोग शुरू में बहुत गंभीर नहीं थे
लेखक की प्रतिक्रिया:
- रेणु जी पटना में थे
- पहली बार जल-प्रलय देखा
- पहले रिपोर्ट में पढ़ा था, अब साक्षात अनुभव
स्थिति बिगड़ती है
पानी का बढ़ना:
- दिन-प्रतिदिन पानी बढ़ता गया
- सड़कों पर पानी, घरों में पानी
- विद्युत-आपूर्ति बंद
- दूरसंचार ठप
- नागरिक जीवन अस्त-व्यस्त
बचाव कार्य:
- सेना, NDRF, सिविल डिफेंस के जवान
- नावों से लोगों को निकालना
- भोजन-पानी की कमी
मानवीय कथाएँ
1. राजेन्द्र नगर का अनुभव:
- लेखक का परिवार वहाँ रहता था
- घर में पानी घुसा
- ऊपरी मंजिल पर शरण
- भोजन कम, पानी पीने का संकट
2. पड़ोसी की कहानी:
- एक पड़ोसी ने अपनी गाय बचाने का प्रयास
- गाय बह गई
- पूरा परिवार रोता रहा
3. बच्चों का दृश्य:
- बच्चे शुरू में बाढ़ को 'मज़ा' समझ रहे थे
- बाद में भूख, ठंड, बीमारी
- माताओं की चिंता
बाढ़ का प्रभाव
आर्थिक:
- फसलें नष्ट
- मकान ढहे
- व्यवसाय ठप
- करोड़ों का नुकसान
सामाजिक:
- परिवार बिछड़े
- महामारी का खतरा
- शिक्षा-स्वास्थ्य व्यवस्था ठप
मनोवैज्ञानिक:
- लोग सदमे में
- भविष्य की चिंता
- ट्रॉमा
बाढ़ का अंत
- पानी धीरे-धीरे उतरना शुरू
- कीचड़, गंदगी, बीमारी
- सरकारी राहत-कार्य
- लोगों ने धीरे-धीरे जीवन फिर शुरू किया
- पर बहुत कुछ हमेशा के लिए खो गया
4. प्रमुख घटनाएँ और तत्व
बाढ़ का कारण
- गंगा और गंडक में अप्रत्याशित बढ़ोतरी
- नेपाल से भी पानी आना
- पटना का नीचा भू-भाग
- अपर्याप्त बाँध-व्यवस्था
राहत-कार्य
- सेना, NDRF, सिविल डिफेंस
- स्थानीय स्वयंसेवक
- मीडिया की भूमिका
- अंतर्राष्ट्रीय सहायता
लोगों का साहस
- आपदा में भी आपसी सहायता
- अजनबी एक-दूसरे की मदद करते
- भारतीय एकता का प्रकटीकरण
5. लेखक के मार्मिक अनुभव
व्यक्तिगत अनुभव
- स्वयं और परिवार का संकट
- पड़ोसियों की पीड़ा
- बच्चों की मासूमियत
- वृद्धों का दर्द
पत्रकारी दृष्टि
- एक-एक विवरण पर ध्यान
- तथ्य और भावना का संगम
- मानवीय कथाओं पर ज़ोर
6. रिपोर्ताज की विशेषताएँ
विशेष
- साक्षात्कार-आधारित: लेखक स्वयं प्रत्यक्ष-दर्शी
- तथ्यात्मक: सच्ची घटनाएँ
- साहित्यिक भाषा: कविता-जैसी अभिव्यक्ति
- मानवीय कोण: व्यक्तियों की कथाएँ
- विवेचनात्मक: कारण-प्रभाव का विश्लेषण
भाषा-शैली
- आँचलिक हिन्दी: बिहार की ज़मीनी भाषा
- विवरणात्मक: हर दृश्य का सजीव चित्रण
- भावनात्मक: संवेदनशीलता
- यथार्थवादी: कोई कल्पना नहीं
7. केन्द्रीय भाव और संदेश
- प्रकृति की शक्ति: मानव-व्यवस्था कितनी भी समर्थ हो, प्रकृति के सामने तुच्छ है।
- मानव-संघर्ष: संकट में भी मनुष्य की जुझारू भावना।
- एकता और सहयोग: आपदा में सब साथ — जाति-धर्म से ऊपर।
- तैयारी का महत्व: आपदा-प्रबंधन की आवश्यकता।
- पर्यावरण-संरक्षण: नदियों की देखभाल, बाँधों का प्रबंधन।
8. 1975 की पटना बाढ़ — ऐतिहासिक तथ्य
- तिथि: अगस्त-सितंबर 1975
- प्रभावित: 35 लाख से अधिक लोग
- मृत्यु: 1,000+ (अनुमानित)
- आर्थिक नुकसान: ₹500 करोड़ (तत्कालीन)
- कारण: गंगा, गंडक, सोन नदियों में अत्यधिक बाढ़
- प्रतिक्रिया: भारत सरकार, सेना, अंतर्राष्ट्रीय सहायता
- परिणाम: बिहार में आपदा-प्रबंधन में सुधार
9. आज की प्रासंगिकता
बिहार और बाढ़
- बिहार आज भी हर साल बाढ़ का सामना करता है
- कोसी, गंडक, गंगा प्रमुख कारण
- 2008 की कोसी बाढ़ — 2.5 लाख प्रभावित
आपदा-प्रबंधन
- NDRF (National Disaster Response Force) 2006 में स्थापित
- राज्य-स्तर पर SDRFs
- Early Warning Systems
- सोशल मीडिया से सहायता
जलवायु परिवर्तन
- ग्लोबल वार्मिंग से बाढ़-आवृत्ति बढ़ी
- 'भगवान-जनित' नहीं — मानव-जनित भी
10. प्रमुख उद्धरण
"बाढ़ की ख़बर सुनकर मैंने इसे अनेक रिपोर्टों में पढ़ा था, लेकिन देखी पहली बार थी।"
"जल-प्रलय के बीच मानवता ही जीतती है।"
"पानी देवता है, पानी ही शत्रु।"
11. समापन
'इस जल प्रलय में' केवल एक रिपोर्ताज नहीं — एक मानवीय दस्तावेज़ है। फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी पैनी पत्रकारी दृष्टि और संवेदनशील साहित्यिक शैली से 1975 की पटना बाढ़ का साक्षात अनुभव हमें दिया। यह पाठ हमें सिखाता है — प्रकृति के सामने विनम्र रहना, आपदा-प्रबंधन को गंभीरता से लेना, और संकट में मानवीय एकता का महत्व। आँचलिक भाषा का यह चमकता उदाहरण आज भी प्रासंगिक है।
