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  • 1सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और समकालीन कविता
  • 2मानवीकरण-अलंकार का चरम उपयोग
  • 3बिम्ब-प्रधान कविता की विशेषताएँ
  • 4ग्रामीण-संस्कृति में अतिथि-सत्कार
  • 5वर्षा-ऋतु का काव्यात्मक चित्रण
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Why this chapter matters
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की यह कविता बिम्ब-निर्माण की अद्भुत मिसाल है — वर्षा-ऋतु के मेघों को 'दामाद' के रूप में दिखाना; प्रकृति, ग्रामीण-संस्कृति, और काव्य-कला का अनुपम संगम।

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मेघ आए — कक्षा 9 हिन्दी (क्षितिज भाग 1)

"मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के। आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली।" — सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

1. पाठ-परिचय

'मेघ आए' सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक अद्वितीय बिम्ब-प्रधान कविता है। इसमें कवि ने वर्षा-ऋतु के आरम्भ का मानवीकरण इस प्रकार किया है मानो कोई अभिजात्य अतिथि (विशेषकर दामाद/जँवाई) गाँव में आ रहा हो।

मुख्य विशेषता

  • मेघों का मानवीकरण = अतिथि/जँवाई
  • ग्रामीण जीवन का जीवंत चित्रण
  • गाँव वाले मेघ का अद्भुत स्वागत करते हैं
  • प्रकृति और मनुष्य का अद्भुत संबंध

2. कवि-परिचय — सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

जीवनवृत्त

  • जन्म: 15 सितंबर 1927, बस्ती (उत्तर प्रदेश)
  • मृत्यु: 23 सितंबर 1983
  • उपाधि: सर्वेश्वर — समकालीन/प्रयोगवादी कवि
  • पुरस्कार: साहित्य अकादमी (1983, मरणोपरांत — 'खूँटियों पर टँगे लोग')

व्यवसाय

  • आकाशवाणी (All India Radio) में संपादक
  • 'दिनमान' पत्रिका के संपादक (अज्ञेय के साथ)
  • बच्चों के लिए 'पराग' पत्रिका के संपादक
  • कवि, उपन्यासकार, पत्रकार

प्रमुख रचनाएँ

काव्य-संग्रह:

  • काठ की घंटियाँ
  • खूँटियों पर टँगे लोग
  • कुआनो नदी
  • जंगल का दर्द

उपन्यास:

  • पाँव तले की दूब
  • सोया हुआ जल
  • उड़े हुए रंग

बाल-साहित्य:

  • बतूता का जूता
  • महंगू की टाई

भाषा-शैली

  • सरल खड़ी बोली
  • आधुनिक हिन्दी में देसी रंग
  • बिम्ब-प्रधान, सटीक शब्द-चयन
  • ग्रामीण जीवन की पकड़

3. कविता का सारांश और भाव

कविता का दृश्य

यह कविता एक ग्रामीण दृश्य है जहाँ:

  • गाँव में पहली बार वर्षा के मेघ (बादल) आते हैं
  • कवि इन मेघों को 'जँवाई' (दामाद) के रूप में चित्रित करता है
  • गाँव के लोग, पेड़-पौधे, पवन — सब इस अतिथि का स्वागत करते हैं

पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या

पंक्ति 1-2 — मेघ का आगमन

मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के। आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली।

मेघ अच्छे ढंग से सजे-सँवरे, बन-ठन कर आए। उनके आगे-आगे हवा (बयार) नाच-गा रही है।

व्याख्या: मेघों को दूल्हे/दामाद की तरह सजाया गया है। 'बयार' = वर्षा से पहले की हवा, जो खुशी से उछल-कूद करती है।

पंक्ति 3-4 — गाँव की प्रतिक्रिया

दरवाज़े खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली। पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के।

गाँव की हर गली में दरवाज़े-खिड़कियाँ खुल गए। ऐसा लगा मानो कोई शहरी मेहमान (पाहुन) गाँव में आया हो।

व्याख्या: 'पाहुन' = अतिथि। शहर का दामाद गाँव आता है तो सब उत्सुक होते हैं। मेघ शहरी मेहमान के रूप में।

पंक्ति 5-6 — पेड़-पौधों का स्वागत

पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाए। आँधी चली, धूल भागी घाघरा उठाए।

पेड़ झुक-झुक कर गरदन उचका कर देखने लगे। आँधी आई — धूल अपना घाघरा (लहँगा) उठाए भागने लगी।

व्याख्या:

  • पेड़ों का मानवीकरण — जिज्ञासु ग्रामीण की तरह झाँकना
  • 'धूल' को ग्रामीण स्त्री के रूप में — घाघरा उठाए भागती हुई

पंक्ति 7-8 — नदी का स्वागत

बाँकी चितवन उठा, नदी ठिठकी, घूँघट सरके। बूढ़े पीपल ने आगे बढ़ कर जुहार की।

नदी ने तिरछी नज़र उठाई, ठिठक गई — मानो उसका घूँघट सरक गया हो। बूढ़े पीपल पेड़ ने आगे बढ़कर 'जुहार' (नमस्ते) की।

व्याख्या:

  • नदी = नववधू, घूँघट सरकना = शर्म से देखना
  • बूढ़ा पीपल = गाँव का बुज़ुर्ग, अतिथि का स्वागत करता

पंक्ति 9-10 — किवाड़ खुलने का दृश्य

बरसा बेसी के मारे किवाड़ खुले। हरषाई बिजली पर दामिनी दमक उठी।

बरसा (वर्षा) के दबाव (बेसी) से किवाड़ खुल गए। बिजली अपनी प्रसन्नता में चमक उठी — दामिनी (बिजली) दमक उठी।

व्याख्या:

  • 'किवाड़ खुले' = घर के लोग बाहर आए
  • 'दामिनी' = बिजली, 'दमक उठी' = चमकी

पंक्ति 11-12 — मिलन का दृश्य

क्षितिज-अटारी, गहराई दामिनी दमकी, 'क्षमा करो गाँठ खुल गई अब भरम की।'

क्षितिज की अटारी (छज्जा) से दामिनी गहरी चमकी। 'भरम की गाँठ खुल गई' = मिलन के समय की झिझक/अहंकार समाप्त।

व्याख्या:

  • वर्षा-मेघ का गाँव से मिलन = एक प्रेमी-प्रेमिका के मिलन की तरह
  • 'भरम की गाँठ' = प्रिय से दूर रहने की झिझक/शिकवा

पंक्ति 13-14 — समापन

बाँध तोड़ धरती हहाई। मेघ बरसे, बूँदें अंक भरीं!

बाँध टूटा, धरती खुशी से हहाई। मेघ बरसे और बूँदें धरती के अंक (गोद) में भर गईं।

व्याख्या:

  • 'बाँध तोड़ हहाई' = धरती का अधीर खुशी से चिल्लाना
  • 'बूँदें अंक भरीं' = वर्षा-जल धरती में समा गया, उसकी प्यास बुझी

4. केन्द्रीय भाव

प्रकृति का मानवीकरण

सम्पूर्ण कविता में प्रकृति को मानव-रूप में चित्रित किया गया है:

  • मेघ = दामाद/जँवाई/शहरी मेहमान
  • बयार = आगे-आगे चलने वाली अल्हड़ कन्या
  • धूल = घाघरा उठाए भागती ग्रामीण स्त्री
  • पेड़ = जिज्ञासु ग्रामीण
  • नदी = घूँघट डाले नववधू
  • पीपल = स्वागत करने वाला बुज़ुर्ग
  • दामिनी = प्रसन्नता में चमकती बिजली
  • धरती = वर्षा से प्यास बुझी प्रसन्न नायिका

ग्रामीण संस्कृति

  • गाँव में मेहमान का स्वागत
  • दामाद का सम्मान
  • सरल, जीवंत जीवन
  • प्रकृति के साथ अद्भुत संबंध

5. साहित्यिक विशेषताएँ

भाषा

  • सरल खड़ी बोली
  • तत्सम-तद्भव-देसी शब्दों का सुंदर मिश्रण
  • ग्रामीण शब्दावली: बयार, पाहुन, घाघरा, जुहार, बेसी, अंक

शैली

  • बिम्ब-प्रधान
  • मानवीकरण-शैली
  • दृश्य-चित्रण की कला

अलंकार

  • मानवीकरण: सम्पूर्ण कविता का आधार
  • उपमा: 'पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के'
  • रूपक: मेघ = जँवाई; धूल = घाघरा वाली स्त्री
  • अनुप्रास: 'दामिनी दमक उठी'
  • यमक: 'दामिनी दमकी'

छंद

  • मुक्त छंद
  • लयबद्ध, गेय

रस

  • शृंगार रस (संयोग शृंगार) — मेघ-धरती मिलन
  • अद्भुत रस — प्रकृति की रोचक प्रस्तुति

6. ग्रामीण संस्कृति का चित्रण

अतिथि-सत्कार

  • गाँव में अतिथि का अद्भुत स्वागत
  • 'पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के' — विशेष महत्व
  • दामाद का सम्मान भारतीय संस्कृति में सर्वोच्च

स्त्री-छवियाँ

  • बयार (नाचती-गाती) — अल्हड़ कन्या
  • धूल (घाघरा उठाए) — सक्रिय ग्रामीण स्त्री
  • नदी (घूँघट सरके) — संकोची नववधू
  • धरती (अंक भरीं) — आतुर नायिका

बुज़ुर्ग

  • बूढ़ा पीपल — गाँव का बुज़ुर्ग जो स्वागत करता है
  • 'जुहार' = प्रणाम/नमस्ते

7. वर्षा-ऋतु का सौंदर्य

वर्षा के लक्षण

  • बयार = ठंडी हवा
  • आँधी = वर्षा से पहले
  • धूल = आँधी के साथ उठती धूल
  • मेघ = वर्षा के बादल
  • दामिनी = बिजली
  • बूँदें = वर्षा-जल

भारतीय कृषक के लिए वर्षा

  • वर्षा = जीवन-दायिनी
  • फसलों के लिए अनिवार्य
  • त्यौहार जैसा उल्लास

8. कविता का संदेश

  1. प्रकृति-प्रेम: प्रकृति को मानव की तरह देखो — प्रेम बढ़ेगा।
  2. ग्रामीण संस्कृति: सरल, जीवंत, अतिथि-सत्कारी।
  3. दृश्य-कौशल: छोटे विवरणों में सौंदर्य।
  4. बिम्ब-निर्माण: कविता बिम्बों का खेल है।
  5. मानवीकरण की शक्ति: निर्जीव को सजीव बनाने की कला।

9. प्रमुख उद्धरण

"मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के।"

"पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के।"

"आँधी चली, धूल भागी घाघरा उठाए।"

"मेघ बरसे, बूँदें अंक भरीं!"


10. समापन

'मेघ आए' हिन्दी काव्य की एक अनुपम बिम्ब-कविता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने वर्षा-ऋतु को ग्रामीण-संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में देखकर एक अनूठी कविता रची है। मेघ को 'जँवाई' के रूप में चित्रित करना — हिन्दी काव्य की मौलिक उपलब्धि। यह कविता प्रकृति, मनुष्य, और ग्रामीण-संस्कृति के अद्भुत संगम की एक छवि प्रस्तुत करती है।

Key formulas & results

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कवि
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (1927-1983)
समकालीन कवि
जन्म-स्थान
बस्ती (उत्तर प्रदेश)
15 सितंबर 1927
पुरस्कार
साहित्य अकादमी (1983, मरणोपरांत) — 'खूँटियों पर टँगे लोग'
व्यवसाय
आकाशवाणी, दिनमान संपादक, पराग संपादक
अज्ञेय के सहयोगी
प्रमुख काव्य
काठ की घंटियाँ, खूँटियों पर टँगे लोग, कुआनो नदी
बाल-साहित्य
बतूता का जूता, महंगू की टाई
बच्चों के लिए लोकप्रिय
केन्द्रीय अलंकार
मानवीकरण — सम्पूर्ण कविता का आधार
मुख्य बिम्ब
मेघ = जँवाई/दामाद; धरती = आतुर नायिका
अनुपम बिम्ब
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
कविता को साधारण वर्षा-कविता मानना
यह केवल वर्षा का वर्णन नहीं — मेघ को 'जँवाई/दामाद' के रूप में चित्रित करने वाली अद्भुत मानवीकरण-कविता।
WATCH OUT
'पाहुन' का गलत अर्थ
'पाहुन' = अतिथि/मेहमान। 'जँवाई' = दामाद। दोनों अलग हैं — कविता में मेघ शहरी मेहमान/दामाद के रूप में।
WATCH OUT
'जुहार' का अर्थ भूलना
'जुहार' = ग्रामीण भाषा में 'नमस्ते/प्रणाम'। 'बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की' = बुज़ुर्ग ने स्वागत किया।
WATCH OUT
'दामिनी' और 'दमक' में अंतर
'दामिनी' = बिजली। 'दमक' = चमक/प्रकाश। 'दामिनी दमक उठी' = बिजली चमक उठी।

Practice problems

Try each one yourself before tapping "Show solution". Active recall > rereading.

Q1EASY· कवि
'मेघ आए' कविता के रचयिता कौन हैं?
Show solution
✦ उत्तर: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (1927-1983) — समकालीन हिन्दी कवि, साहित्य अकादमी विजेता।
Q2EASY· अलंकार
कविता में सबसे प्रमुख अलंकार कौन-सा है?
Show solution
✦ उत्तर: मानवीकरण — मेघ, बयार, धूल, नदी, पीपल, धरती सबको मानव-रूप दिया गया है।
Q3MEDIUM· बिम्ब
कविता में मेघ को 'जँवाई/दामाद' के रूप में क्यों चित्रित किया गया है?
Show solution
चरण 1 — संदर्भ। वर्षा-ऋतु में पहली बार मेघ गाँव आते हैं — सम्पूर्ण गाँव उत्साह से भर जाता है। चरण 2 — दामाद-संस्कृति। भारतीय ग्रामीण संस्कृति में दामाद का बहुत सम्मान — विशेष सजावट, स्वागत, उत्साह। चरण 3 — मेघ-दामाद की तुलना। • मेघ 'बन-ठन के सँवर के' आते — दामाद की तरह सजे-धजे • गाँव के सब लोग, पेड़, नदी सब उत्सुक — दामाद के स्वागत में • दरवाज़े-खिड़कियाँ खुलना — पारंपरिक स्वागत चरण 4 — साहित्यिक महत्व। यह बिम्ब हिन्दी काव्य में अनुपम — वर्षा को त्यौहार-जैसा बनाना; ग्रामीण-संस्कृति का जीवंत चित्रण। चरण 5 — कवि की दृष्टि। सर्वेश्वर जी ग्रामीण भारत को गहराई से जानते थे — इस अनुभव से यह बिम्ब निकला। ✦ उत्तर: मेघ को 'जँवाई/दामाद' के रूप में चित्रित कर कवि ने वर्षा को उत्सव-रूप में दिखाया है। भारतीय ग्रामीण संस्कृति में दामाद का अद्भुत सम्मान — यही उत्साह मेघ-आगमन पर। यह बिम्ब वर्षा को साधारण मौसम से ऊपर उठाकर सांस्कृतिक उत्सव बनाता है।
Q4MEDIUM· व्याख्या
'आँधी चली, धूल भागी घाघरा उठाए' — व्याख्या कीजिए।
Show solution
चरण 1 — पंक्ति का सरल अर्थ। वर्षा से पहले आँधी आती है। आँधी के साथ धूल उड़ती है। चरण 2 — मानवीकरण। धूल को ग्रामीण स्त्री के रूप में चित्रित — 'घाघरा उठाए' = लहँगा उठाकर तेज़ी से भागती हुई। चरण 3 — दृश्य का सौंदर्य। आँधी के सामने धूल का उड़ना — मानो कोई गाँव की स्त्री अपना घाघरा उठाकर भागती है — दामाद के सामने झिझकती हुई? चरण 4 — अलंकार। • मानवीकरण: धूल को स्त्री-रूप • अनुप्रास: 'आँधी चली, धूल भागी' चरण 5 — कवि-दृष्टि। निर्जीव को सजीव बनाना; प्रकृति को ग्रामीण जीवन से जोड़ना — सर्वेश्वर जी की विशेषता। ✦ उत्तर: इस पंक्ति में आँधी और उसके साथ उड़ती धूल का अद्भुत मानवीकरण — धूल को ग्रामीण स्त्री के रूप में, 'घाघरा उठाए भागती हुई'। दामाद (मेघ) के स्वागत में हड़बड़ाहट का दृश्य। मानवीकरण और अनुप्रास अलंकार से युक्त सौंदर्यमय पंक्ति।
Q5HARD· विश्लेषण
'मेघ आए' कविता में बिम्ब-निर्माण की कला और ग्रामीण-संस्कृति के चित्रण का विश्लेषण कीजिए।
Show solution
चरण 1 — बिम्ब-निर्माण की कला। कविता बिम्बों का अद्भुत संगम है — मेघ = दामाद; बयार = अल्हड़ कन्या; धूल = घाघरा उठाए स्त्री; पेड़ = जिज्ञासु ग्रामीण; नदी = घूँघट डाले नववधू; पीपल = बुज़ुर्ग; धरती = आतुर नायिका। चरण 2 — मानवीकरण की चरम सीमा। सम्पूर्ण कविता में निर्जीव वस्तुओं को मानव-भावनाओं से युक्त — यह कविता का मूल बल। चरण 3 — ग्रामीण-संस्कृति। • अतिथि-सत्कार: 'दरवाज़े खिड़कियाँ खुलने लगीं' • दामाद का सम्मान: मेघ की सजावट • बुज़ुर्ग की भूमिका: पीपल का 'जुहार' • नववधू की लज्जा: नदी का घूँघट सरकना • स्त्री-सक्रियता: धूल का घाघरा उठाकर भागना चरण 4 — भाषाई सौंदर्य। देसी शब्द: बयार, पाहुन, घाघरा, जुहार, बेसी, अंक — ग्रामीण जीवन से सीधे लिए। चरण 5 — संदेश। प्रकृति और मनुष्य का अद्भुत संबंध; ग्रामीण-संस्कृति की सजीवता; वर्षा का उत्सव-रूप। चरण 6 — साहित्यिक महत्व। हिन्दी काव्य में यह कविता बिम्ब-कला का उच्च मानक स्थापित करती है। सर्वेश्वर जी की प्रकृति और ग्राम-समाज की पैनी समझ। ✦ उत्तर: 'मेघ आए' बिम्ब-निर्माण की अद्भुत कला का प्रतीक है — हर पंक्ति में मानवीकरण के अनुपम उदाहरण (मेघ=दामाद, बयार=कन्या, नदी=नववधू, धरती=नायिका)। साथ ही यह ग्रामीण-संस्कृति का जीवंत चित्र — अतिथि-सत्कार, दामाद-सम्मान, बुज़ुर्ग-स्वागत, नववधू-लज्जा। ग्रामीण शब्दावली (बयार, पाहुन, घाघरा, जुहार) कविता को जीवंत बनाती है। हिन्दी काव्य का अनुपम बिम्ब-काव्य।

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • कवि: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (1927-1983), समकालीन कवि
  • जन्म: बस्ती, उत्तर प्रदेश
  • मुख्य कर्म: आकाशवाणी, दिनमान संपादक, पराग संपादक
  • साहित्य अकादमी 1983 (मरणोपरांत) — 'खूँटियों पर टँगे लोग'
  • केन्द्रीय बिम्ब: मेघ = दामाद/जँवाई
  • अन्य बिम्ब: बयार=कन्या; धूल=स्त्री; नदी=नववधू; पीपल=बुज़ुर्ग; धरती=नायिका
  • मुख्य अलंकार: मानवीकरण (सम्पूर्ण कविता)
  • अन्य अलंकार: उपमा, रूपक, अनुप्रास
  • रस: शृंगार + अद्भुत
  • ग्रामीण शब्दावली का प्रचुर प्रयोग
  • बाल-साहित्य: 'बतूता का जूता', 'महंगू की टाई'
  • अन्य रचनाएँ: काठ की घंटियाँ, कुआनो नदी

CBSE marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: 5–6 अंक प्रति बोर्ड पेपर

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय / अति लघु11–2कवि; मुख्य बिम्ब; अलंकार; ग्रामीण शब्द
व्याख्या-आधारित2–31पंक्तियों की व्याख्या; बिम्ब-विश्लेषण
लघु उत्तरीय31मेघ-दामाद बिम्ब; धूल/नदी का मानवीकरण
दीर्घ उत्तरीय50–1बिम्ब-कला + ग्रामीण-संस्कृति का विश्लेषण
Prep strategy
  • सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का परिचय — समकालीन कवि, साहित्य अकादमी 1983
  • मुख्य बिम्ब: मेघ=दामाद; बयार=कन्या; धूल=स्त्री; नदी=नववधू; धरती=नायिका
  • मानवीकरण अलंकार की चरम सीमा
  • ग्रामीण शब्दावली: बयार, पाहुन, घाघरा, जुहार, बेसी, अंक, दामिनी
  • अतिथि-सत्कार की भारतीय परंपरा
  • वर्षा-ऋतु का उत्सव-रूप

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

मानसून-साहित्य परंपरा

वर्षा-ऋतु पर हिन्दी काव्य की समृद्ध परंपरा — कालिदास के 'मेघदूत' से सर्वेश्वर तक।

बच्चों का साहित्य

सर्वेश्वर जी की 'पराग' पत्रिका के संपादन ने हिन्दी बाल-साहित्य को बहुत समृद्ध किया।

साहित्यिक पत्रकारिता

उनका 'दिनमान' संपादन हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का उत्कृष्ट उदाहरण।

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

  1. कवि का परिचय — समकालीन कवि, साहित्य अकादमी विजेता
  2. मुख्य बिम्ब: मेघ=दामाद, धरती=नायिका
  3. मानवीकरण के अनुप्रयोग पर ज़ोर
  4. ग्रामीण शब्दों के अर्थ ज़रूर लिखें (बयार, पाहुन, घाघरा, जुहार)
  5. अतिथि-सत्कार की भारतीय परंपरा से जोड़ें
  6. व्याख्या में पहले शाब्दिक अर्थ, फिर भावार्थ, फिर अलंकार

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

  • कालिदास का 'मेघदूत' (संस्कृत) — हिन्दी 'मेघ आए' से तुलना
  • अज्ञेय की 'नई कविता' और सर्वेश्वर का स्थान
  • बिम्ब-प्रधान कविता का सिद्धांत (T.S. Eliot, Ezra Pound)
  • हिन्दी में वर्षा-काव्य की परंपरा: कबीर, सूर, तुलसी, बिहारी से सर्वेश्वर तक
  • ग्रामीण शब्दावली का काव्यात्मक प्रयोग

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

CBSE Board Class 9उच्च
हिन्दी ओलिंपियाडउच्च
UGC NET हिन्दीउच्च — समकालीन कविता विशेष
CTET हिन्दीमध्यम

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

'जँवाई/दामाद' = बेटी का पति। 'पाहुन' = सामान्य अतिथि/मेहमान। कविता में मेघ दोनों रूपों में — 'पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के' (सामान्य अतिथि), और 'बन-ठन के सँवर के' (दामाद की तरह सजे-धजे)।

वे समकालीन हिन्दी कविता से जुड़े हैं — अज्ञेय की 'नई कविता' के बाद की पीढ़ी। प्रयोगशील, बिम्ब-प्रधान, सामाजिक चेतना से युक्त। 'दिनमान' पत्रिका के माध्यम से उन्होंने आधुनिक हिन्दी कविता को मंच दिया।

वर्षा से पहले धरती और मेघ के बीच एक अघोषित दूरी थी (भरम की गाँठ) — मानो कोई शिकवा/अहंकार। पर अब वर्षा से वह सब टूट गया — गाँठ खुल गई। प्रेमी-प्रेमिका के मिलन में शिकवों का दूर हो जाना।
Verified by the tuition.in editorial team
Last reviewed on 20 May 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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