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  • 1रसखान का जीवन और कृष्ण-भक्त बनने की कथा
  • 2सगुण भक्ति-धारा और निर्गुण से अंतर
  • 3सवैया छंद की पहचान
  • 4ब्रजभाषा की विशेषताएँ
  • 5हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक संगम
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Why this chapter matters
मुस्लिम पठान कवि रसखान के कृष्ण-भक्ति सवैये सगुण भक्ति-धारा का सर्वोच्च उदाहरण और हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता का अद्भुत प्रमाण।

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रसखान के सवैये — कक्षा 9 हिन्दी (क्षितिज भाग 1)

"मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।" — रसखान

1. पाठ-परिचय

'रसखान के सवैये' सगुण भक्ति-धारा के मुस्लिम कवि रसखान द्वारा रचित कृष्ण-भक्ति के सवैये हैं। पाठ में 4 सवैये संकलित हैं। रसखान ने ब्रजभूमि, गोकुल, और श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम का चित्रण किया है।

विशेषता

  • मुस्लिम होते हुए भी कृष्ण-भक्त
  • ब्रज-संस्कृति के अनन्य प्रशंसक
  • सगुण-साकार ईश्वर (कृष्ण) के उपासक

2. कवि-परिचय — रसखान

जीवनवृत्त

  • जन्म: सन् 1548 के आसपास, दिल्ली (कुछ विद्वान: पठान-वंश)
  • मृत्यु: सन् 1628 के आसपास, गोकुल/वृंदावन
  • मूल नाम: सैयद इब्राहीम
  • जाति: पठान मुस्लिम (राजघराने से संबंध)
  • दीक्षा: गोस्वामी विट्ठलनाथ से, पुष्टिमार्ग में

कृष्ण-भक्त बनने की कथा

  • रसखान युवावस्था में सांसारिक सुखों में लिप्त थे
  • एक दिन वैरागी से कृष्ण की प्रतिमा देखी
  • तब से कृष्ण-भक्ति में लीन हो गए
  • ब्रजभूमि में निवास करने लगे

प्रमुख रचनाएँ

  • 'प्रेम-वाटिका' — काव्य-संग्रह (1614)
  • 'सुजान रसखान'
  • 'दानलीला'

भाषा

  • ब्रजभाषा — कृष्ण-काव्य की सर्वाधिक उपयुक्त भाषा
  • मधुर, सरल, भावप्रवण

विधा

  • सवैया — काव्य की एक विशेष छंद-विधा
  • 22-26 मात्राएँ, 4 चरण

3. चार सवैये — व्याख्या

सवैया 1 — मानुष हौं तो वही रसखानि

मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन। पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन। जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिलि, कालिंदी कूल कदंब की डारन॥

भावार्थ: यदि मनुष्य बनूँ तो वही रसखान बनूँ जो ब्रज के गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहता है। यदि पशु बनूँ तो मेरा क्या बस — नंद की गायों के बीच चरता रहूँ। यदि पत्थर बनूँ तो उसी गोवर्धन पर्वत का बनूँ जिसे श्रीकृष्ण ने इंद्र के क्रोध से (पुरंदर = इंद्र) रक्षा के लिए अपने हाथ पर छत्र की तरह उठाया था। यदि पक्षी बनूँ तो यमुना के किनारे कदंब की डाली पर बसेरा करूँ।

विशेषता:

  • चार जन्मों की कल्पना — मनुष्य, पशु, पत्थर, पक्षी
  • सब में ब्रजभूमि और कृष्ण से जुड़ाव
  • 'कालिंदी' = यमुना नदी

सवैया 2 — या लकुटी अरु कामरिया

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं। आठहुँ सिद्धि नवौ निधि के सुख, नंद की धेनु चराइ बिसारौं। ए रसखानि जबै इन नैनन ते, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं। कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

भावार्थ: इस लकुटी (छड़ी) और कामरिया (कंबल) पर मैं तीनों लोकों का राज भी न्योछावर करूँ। आठ सिद्धियाँ और नौ निधियों के सुख को नंद की गायों को चराने में भुलाऊँ। हे रसखान! जब इन नेत्रों से ब्रज के बन, बाग, और तालाब निहारता हूँ — तो करोड़ों कलधौत (सोने) के महलों को भी करील के कुंजों पर न्योछावर कर देता हूँ।

विशेषता:

  • कृष्ण की लकुटी-कामरिया = साधारण वस्तुएँ, पर अनमोल
  • भौतिक सुख का त्याग, ब्रजभूमि का प्रेम
  • 'कलधौत' = सोना; 'करील' = ब्रज का प्रसिद्ध पौधा

सवैया 3 — काननि दै अँगुरी रहिहौं

काननि दै अँगुरी रहिहौं, जब काहू टेर सुनैहौं। रसखानि, गड़ी हियरे न अरी, तिनसौं तब कैसी कै आँख मिलैहौं॥ मातु पिता ब्रज के बसिहैं, हरषै रसखानि अली प्रिय जैहौं। गोकुल के बन-वासिनी कौ, सब आजु निहारि के नैन सिरैहौं॥

भावार्थ: यदि कोई पुकारेगा तो कानों पर अँगुली रखकर सुनने से इनकार कर दूँगा। हे रसखान! जिनकी छवि हृदय में बस गई है, उनसे आँख मिलाने का साहस कैसे होगा? ब्रज के माता-पिता (नंद-यशोदा) के पास खुशी से जाऊँगा। आज गोकुल के बन-वासियों (गोपी-ग्वालों) को आँख भर निहार कर ही नेत्र शांत होंगे।

विशेषता:

  • गोपियों की प्रेम-व्याकुलता का चित्रण
  • 'हियरे' = हृदय; 'अली' = सखी

सवैया 4 — मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं

मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी। ओढ़ि पितंबर लै लकुटी, बन गोधन ग्वारिनी संग फिरौंगी॥ भावतो वोहि मेरो रसखानि सो, तेरे कहे सब स्वांग करौंगी। या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी॥

भावार्थ: (गोपी कह रही है) — मैं अपने सिर पर मोर के पंख रखूँगी, गले में गुंज (फल/मनके) की माला पहनूँगी। पीताम्बर (पीला वस्त्र) ओढ़कर, हाथ में लकुटी लेकर, वन में गायों और ग्वालिनों के साथ घूमूँगी। मुझे जो प्रिय है — रसखान कहो, तेरे कहे अनुसार सब वेश-स्वांग करूँगी। पर इस मुरली को, जिसे मुरलीधर (कृष्ण) के होंठों ने छुआ है, अपने होंठों पर नहीं रखूँगी।

विशेषता:

  • गोपी का कृष्ण-वेश धारण करना
  • अंतिम पंक्ति में अद्भुत प्रेम — मुरली को छूना पाप जैसा क्योंकि वह कृष्ण के अधरों ने छुआ है
  • 'अधर' = होंठ

4. प्रमुख भाव

कृष्ण के प्रति प्रेम

  • रसखान कृष्ण के सर्वोत्तम भक्तों में से एक
  • मुस्लिम होते हुए हिन्दू देवता की भक्ति
  • सांप्रदायिक सद्भाव का अनुपम उदाहरण

ब्रजभूमि-प्रेम

  • गोकुल, वृंदावन, यमुना, गोवर्धन
  • भौतिक सुख से अधिक मूल्यवान
  • 'करोड़ों सोने के महल' से भी बढ़कर

सगुण भक्ति

  • साकार ईश्वर (कृष्ण) की उपासना
  • कबीर की निर्गुण भक्ति से भिन्न
  • मीरा, सूरदास, तुलसीदास जैसे सगुण भक्तों की परंपरा

गोपी-भाव

  • गोपियों जैसा सच्चा प्रेम
  • आत्म-समर्पण
  • भक्ति का चरम रूप

5. साहित्यिक विशेषताएँ

भाषा

  • ब्रजभाषा — मधुर, सरस, संगीतमय
  • कृष्ण-काव्य की प्रिय भाषा

छंद

  • सवैया — 22-26 मात्राएँ प्रति चरण, 4 चरण
  • गेय, लयबद्ध

अलंकार

  • अनुप्रास: 'काननि दै अँगुरी', 'मोरपखा सिर'
  • रूपक: 'अधरान धरी अधरा न धरौंगी'
  • उपमा: कृष्ण-छवि की तुलना
  • अनुकरण: गोपी का कृष्ण-वेश

रस

  • श्रृंगार रस — कृष्ण-गोपी प्रेम
  • भक्ति रस — अनन्य कृष्ण-प्रेम

6. हिन्दू-मुस्लिम एकता

रसखान का जीवन भारतीय संस्कृति की महान विशेषता का प्रमाण है:

  • एक मुस्लिम पठान कवि कृष्ण-भक्त बना
  • हिन्दू देवता पर ब्रजभाषा में काव्य लिखा
  • गोकुल/वृंदावन में निवास किया
  • गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा ली
  • आज भी कृष्ण-भक्तों में पूज्य

7. केन्द्रीय संदेश

  1. सच्चा प्रेम धर्म-जाति की सीमाओं से ऊपर है।
  2. भक्ति ही सर्वोच्च जीवन-मूल्य।
  3. साधारणता में सौंदर्य — लकुटी, कामरिया, कदंब, करील।
  4. त्याग का महत्व — संसार के सुख त्याग कर ईश्वर-प्रेम।
  5. सांप्रदायिक सद्भाव — रसखान का जीवन ही संदेश।

8. आज की प्रासंगिकता

  • सांप्रदायिक सद्भाव: रसखान आज भी हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक।
  • ब्रज-संस्कृति: मथुरा-वृंदावन आज विश्व-प्रसिद्ध तीर्थ।
  • साहित्यिक धरोहर: रसखान के सवैये हिन्दी काव्य की अमूल्य निधि।
  • मीडिया में: रसखान पर फिल्में, धारावाहिक, गीत।

9. प्रमुख उद्धरण

"मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।"

"या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।"

"या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी।"


10. समापन

रसखान के सवैये हिन्दी काव्य की मधुरतम रचनाएँ हैं। एक मुस्लिम पठान कवि का कृष्ण-प्रेम — भारतीय संस्कृति के 'सर्व धर्म समभाव' का अद्भुत उदाहरण। उनकी रचनाएँ आज भी हमें सिखाती हैं कि प्रेम और भक्ति की भाषा कोई धार्मिक सीमा नहीं मानती।

Key formulas & results

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कवि
रसखान (1548-1628) — मूल नाम सैयद इब्राहीम
पठान मुस्लिम, बाद में कृष्ण-भक्त
गुरु
गोस्वामी विट्ठलनाथ (पुष्टिमार्ग)
वल्लभाचार्य के पुत्र
भाषा
ब्रजभाषा — कृष्ण-काव्य की प्रिय भाषा
मधुर, संगीतमय
छंद
सवैया — 22-26 मात्राएँ, 4 चरण
गेय, लयबद्ध
प्रमुख रचनाएँ
'प्रेम-वाटिका' (1614), 'सुजान रसखान', 'दानलीला'
धारा
सगुण भक्ति (साकार ईश्वर — कृष्ण)
कबीर की निर्गुण से भिन्न
केन्द्र
ब्रजभूमि, गोकुल, वृंदावन, यमुना, गोवर्धन
सबसे प्रसिद्ध सवैया
'मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन'
चार जन्मों की कल्पना
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
रसखान को हिन्दू कवि मानना
रसखान मुस्लिम पठान थे — मूल नाम सैयद इब्राहीम। बाद में कृष्ण-भक्त बने, ब्रजभूमि में निवास किया।
WATCH OUT
सगुण और निर्गुण भक्ति में अंतर भूलना
सगुण = साकार ईश्वर (कृष्ण, राम)। निर्गुण = निराकार ईश्वर। रसखान सगुण; कबीर निर्गुण।
WATCH OUT
'पुरंदर' का अर्थ गलत
'पुरंदर' = इंद्र देवता। 'जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन' = इंद्र के क्रोध से रक्षा हेतु गोवर्धन उठाया।
WATCH OUT
'कलधौत' का अर्थ
'कलधौत' = सोना/स्वर्ण। 'कोटिक हू कलधौत के धाम' = करोड़ों सोने के महल।

Practice problems

Try each one yourself before tapping "Show solution". Active recall > rereading.

Q1EASY· कवि
रसखान का मूल नाम क्या था?
Show solution
✦ उत्तर: सैयद इब्राहीम — पठान मुस्लिम, बाद में कृष्ण-भक्त बनकर 'रसखान' नाम से प्रसिद्ध हुए।
Q2EASY· गुरु
रसखान के दीक्षा-गुरु कौन थे?
Show solution
✦ उत्तर: गोस्वामी विट्ठलनाथ — पुष्टिमार्ग (वल्लभाचार्य के पुत्र)।
Q3MEDIUM· व्याख्या
'मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन' — व्याख्या कीजिए।
Show solution
चरण 1 — संदर्भ। यह रसखान के प्रथम सवैये की पहली पंक्ति है। कवि चार जन्मों की कल्पना करता है — मनुष्य, पशु, पत्थर, पक्षी। चरण 2 — शाब्दिक अर्थ। 'यदि मैं मनुष्य बनूँ तो वही रसखान बनूँ जो ब्रज के गोकुल गाँव के ग्वालों (चरवाहों) के बीच निवास करता है।' चरण 3 — भाव। कवि के लिए सर्वोच्च जीवन-वरदान — गोकुल के ग्वालों के साथ रहना। राजाओं-सम्राटों का जीवन भी इसके सामने तुच्छ। चरण 4 — गहराई। गोकुल के ग्वालों के साथ ही श्रीकृष्ण ने अपना बचपन बिताया। तो ग्वालों के बीच रहना = कृष्ण के साथ रहना। चरण 5 — दर्शन। साधारणता में परम सौंदर्य है। भौतिक सुख से बढ़कर भक्ति-संग है। ✦ उत्तर: इस पंक्ति में रसखान कहते हैं — यदि मनुष्य का जन्म मिले तो रसखान बनकर ब्रज के गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहूँ। उन्हें यह जन्म सबसे श्रेष्ठ लगता है क्योंकि गोकुल के ग्वालों के साथ श्रीकृष्ण रहे थे। यह सगुण भक्ति का चरम उदाहरण।
Q4MEDIUM· व्याख्या
'या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं' — स्पष्ट कीजिए।
Show solution
चरण 1 — संदर्भ। द्वितीय सवैये की पहली पंक्ति। 'लकुटी' = श्रीकृष्ण की छड़ी; 'कामरिया' = कंबल/कामली। चरण 2 — शाब्दिक अर्थ। कृष्ण की इस छड़ी और कंबल पर मैं तीनों लोकों (स्वर्ग, मृत्यु, पाताल) का राज भी न्योछावर कर दूँ। चरण 3 — भाव। कृष्ण की साधारण वस्तुएँ (छड़ी और कंबल) कवि के लिए अनमोल — तीनों लोकों के राज से भी अधिक। चरण 4 — संदेश। भक्ति में मूल्य वस्तु का नहीं — उसके 'धारक' (कृष्ण) का है। प्रेम-भक्ति में संसार के सब सुख तुच्छ। ✦ उत्तर: रसखान कहते हैं — श्रीकृष्ण की लकुटी और कामरिया पर मैं तीनों लोकों का राज भी न्योछावर कर दूँ। ये साधारण वस्तुएँ भी कृष्ण से जुड़ी होने के कारण अनमोल। भौतिक संपदा से बढ़कर भक्ति-प्रेम — यही केन्द्रीय भाव।
Q5HARD· सांस्कृतिक
रसखान की रचनाओं के माध्यम से हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता को स्पष्ट कीजिए।
Show solution
चरण 1 — रसखान का परिचय। रसखान (1548-1628) — मूल नाम सैयद इब्राहीम, पठान मुस्लिम कवि। चरण 2 — कृष्ण-भक्त बनने की कथा। युवावस्था में सांसारिक सुखों में लिप्त थे। एक दिन वैरागी से कृष्ण की प्रतिमा देखी — तब से कृष्ण-भक्त बने। चरण 3 — सांस्कृतिक संगम। • मुस्लिम होकर हिन्दू देवता की भक्ति • ब्रजभाषा (हिन्दू-काव्य भाषा) में रचना • गोकुल/वृंदावन में निवास • गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा • हिन्दू-भक्तों में पूज्य चरण 4 — रचनाओं में एकता। उनके सवैयों में कहीं भी सांप्रदायिक भेदभाव नहीं — केवल शुद्ध कृष्ण-प्रेम। 'मानुष हौं तो वही रसखानि' — मानवता का सर्वोच्च उद्घोष। चरण 5 — आज की प्रासंगिकता। सांप्रदायिक तनाव के युग में रसखान का जीवन और रचनाएँ अमूल्य संदेश — सच्चा प्रेम धर्म-जाति की सीमाओं से ऊपर। चरण 6 — मूल्यांकन। रसखान भारतीय 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' के अप्रतिम उदाहरण। उनकी रचनाएँ भारत की समन्वयवादी संस्कृति का जीवंत प्रमाण। ✦ उत्तर: रसखान — मुस्लिम पठान कवि — कृष्ण के सर्वोत्तम भक्तों में। उन्होंने ब्रजभाषा में हिन्दू देवता पर अद्वितीय काव्य रचा, ब्रज में निवास किया, गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा ली। उनकी रचनाएँ भारत की हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता ('गंगा-जमुनी तहज़ीब') का अद्भुत प्रमाण। आज के सांप्रदायिक तनाव के युग में उनका जीवन-संदेश और भी प्रासंगिक — सच्चा प्रेम धर्म-सीमाओं से ऊपर है।

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • कवि: रसखान (1548-1628), मूल नाम सैयद इब्राहीम
  • जाति: पठान मुस्लिम, बाद में कृष्ण-भक्त
  • गुरु: गोस्वामी विट्ठलनाथ (पुष्टिमार्ग)
  • भाषा: ब्रजभाषा
  • छंद: सवैया (22-26 मात्राएँ, 4 चरण)
  • धारा: सगुण भक्ति (साकार ईश्वर)
  • प्रमुख रचनाएँ: प्रेम-वाटिका (1614), सुजान रसखान, दानलीला
  • सवैया 1: 'मानुष हौं तो वही रसखानि' — चार जन्मों की कल्पना
  • सवैया 2: 'या लकुटी अरु कामरिया पर' — ब्रज-वस्तुओं का मूल्य
  • सवैया 3: 'काननि दै अँगुरी रहिहौं' — गोपी-व्याकुलता
  • सवैया 4: 'मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं' — गोपी का कृष्ण-वेश
  • ब्रज-स्थान: गोकुल, वृंदावन, यमुना, गोवर्धन
  • सांस्कृतिक महत्व: हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक

CBSE marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: 5–6 अंक प्रति बोर्ड पेपर

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय / अति लघु11–2कवि; गुरु; भाषा; छंद
व्याख्या-आधारित2–31सवैयों की पंक्तियों की व्याख्या
लघु उत्तरीय31ब्रज-प्रेम; गोपी-भाव; कृष्ण-भक्ति
दीर्घ उत्तरीय50–1रसखान का सांस्कृतिक महत्व; हिन्दू-मुस्लिम एकता
Prep strategy
  • रसखान का परिचय — मूल नाम सैयद इब्राहीम, पठान मुस्लिम, कृष्ण-भक्त
  • चारों सवैयों के शीर्ष-वाक्य याद रखें
  • ब्रजभाषा शब्दावली: लकुटी, कामरिया, कलधौत, करील, कालिंदी, पुरंदर
  • सगुण भक्ति बनाम निर्गुण भक्ति का अंतर
  • रसखान का सांस्कृतिक महत्व — गंगा-जमुनी तहज़ीब
  • गोवर्धन-लीला और कृष्ण-गोपी प्रसंग

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

रसखान समाधि, गोकुल

उत्तर प्रदेश के गोकुल में रसखान की समाधि — हिन्दू-मुस्लिम दोनों श्रद्धालुओं का तीर्थ।

ब्रज सांस्कृतिक महोत्सव

मथुरा-वृंदावन में हर साल रसखान के सवैये गाए जाते हैं।

सांप्रदायिक सद्भाव

आज के तनाव-काल में रसखान का जीवन हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक।

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

  1. रसखान का जीवन-परिचय — मूल नाम, धर्म, गुरु ज़रूर लिखें
  2. व्याख्या-प्रश्न में पहले शाब्दिक अर्थ, फिर भावार्थ
  3. ब्रजभाषा के कठिन शब्दों का अर्थ ज़रूर समझाएँ (लकुटी, कामरिया, कलधौत)
  4. सगुण-निर्गुण भेद कबीर से तुलना के लिए तैयार रखें
  5. हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश हर लंबे उत्तर में जोड़ें
  6. सवैयों के उद्धरण याद रखें — quote करना अंक बढ़ाता है

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

  • पुष्टिमार्ग का इतिहास — वल्लभाचार्य, विट्ठलनाथ, अष्टछाप कवि
  • अष्टछाप के 8 कवि: सूरदास, परमानंददास, कुम्भनदास, कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी, चतुर्भुजदास, नंददास
  • रसखान की 'प्रेम-वाटिका' का विश्लेषण
  • ब्रजभाषा के विकास का इतिहास
  • अन्य मुस्लिम कृष्ण-भक्त कवि: ताज, आलम, मुबारक

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

CBSE Board Class 9उच्च
हिन्दी ओलिंपियाडउच्च
UGC NET हिन्दीउच्च — भक्ति-काल विशेष
CTET हिन्दीमध्यम

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

रसखान युवावस्था में सांसारिक सुखों में लिप्त थे। एक दिन एक वैरागी से कृष्ण की प्रतिमा देखी — तब से कृष्ण-भक्ति में लीन हो गए। ब्रज में आकर गोस्वामी विट्ठलनाथ से पुष्टिमार्ग में दीक्षा ली।

सगुण भक्ति = साकार-रूप ईश्वर की भक्ति (कृष्ण, राम जैसे अवतार)। प्रमुख कवि: सूरदास, तुलसीदास, मीरा, रसखान। निर्गुण भक्ति = निराकार ईश्वर की भक्ति (कोई आकार नहीं)। प्रमुख कवि: कबीर, रैदास, दादूदयाल।

सवैया = एक मात्रिक छंद। प्रति चरण 22-26 मात्राएँ, चार चरण। संगीतमय, गेय। कृष्ण-काव्य में बहुत प्रयुक्त। रसखान के अतिरिक्त घनानंद, पद्माकर जैसे रीतिकालीन कवियों ने भी सवैये रचे।
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Last reviewed on 20 May 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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