हिन्दी गद्य साहित्य का विकास — शुक्ल युग एवं शुक्लोत्तर युग
"सच पूछिए तो वर्तमान काल, जो अभी चल रहा है, हमसे इतना दूर पीछे नहीं छूटा है कि इतिहास के भीतर आ सके।" — आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, 'गद्य साहित्य की वर्तमान गति : तृतीय उत्थान' का आरंभ
1. इस अध्याय में क्या है
यह पूरा अध्याय यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी, यूनिट 1 (i) है। पाठ्यक्रम की इकाईवार तालिका इसे 05 अंक देती है, और प्रश्नपत्र में यह खण्ड-अ का सबसे पहला प्रश्न है। पाठ्यक्रम की पंक्ति शब्दशः यह है —
1. हिन्दी गद्य के विकास का संक्षिप्त परिचय (शुक्ल युग तथा शुक्लोत्तर युग) — 5×1=5
तीन शब्द ध्यान से पढ़िए।
"संक्षिप्त परिचय।" बोर्ड पूरा इतिहास नहीं माँगता। पाँच बहुविकल्पीय प्रश्न भर हैं, और वे युग, लेखक, कृति और विधा के मेल पर आते हैं।
"शुक्ल युग तथा शुक्लोत्तर युग।" यही सीमा है। भारतेंदु युग और द्विवेदी युग इस कोष्ठक के बाहर हैं। उन्हें इस अध्याय में केवल इतना रखा गया है कि शुक्ल युग की बात समझ में आ सके — क्योंकि जिस चीज़ को शुक्ल युग आगे बढ़ाता है, वह वहीं से आती है।
यह यूनिट 1 (ii) नहीं है। आपके गद्य खण्ड के सात पाठ — 'मित्रता', 'ममता', 'भारतीय संस्कृति', 'अजन्ता', 'क्या लिखूँ', 'ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से', 'पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी' — अलग 11 अंक के हैं। पर उन सातों के लेखक ठीक इन्हीं दो युगों में बँटे हुए हैं, और यह अध्याय अंत में उन्हें उनके युग के सामने रखकर छोड़ेगा।
2. गद्य के युग व्यक्तियों के नाम पर क्यों हैं
पद्य के इतिहास में काल का नाम प्रवृत्ति पर पड़ता है — वीरगाथा, भक्ति, रीति। गद्य में नाम व्यक्ति पर पड़ता है — भारतेंदु, द्विवेदी, शुक्ल। यह अंतर आकस्मिक नहीं है।
शुक्ल जी स्वयं इसका कारण देते हैं। खड़ी बोली गद्य की उम्र बहुत कम है। जिस भाषा-रूप में यह पूरा साहित्य लिखा गया, वह उन्नीसवीं सदी के मध्य में ही व्यवहार में आया। सौ-सवा सौ वर्ष में "चित्तवृत्ति" जैसी धीमी चीज़ तीन बार नहीं बदलती — पर एक-एक व्यक्ति की लेखनी पूरे लेखक-समाज की शैली बदल देती है।
इसीलिए शुक्ल जी ने अपनी पुस्तक में गद्य के लिए 'काल' शब्द ही नहीं रखा। उन्होंने 'उत्थान' शब्द रखा — और आधुनिक गद्य को तीन उत्थानों में बाँटा।
| पाठ्यक्रम का नाम | शुक्ल जी का अपना नाम | संवत् | ईस्वी |
|---|---|---|---|
| भारतेंदु युग | प्रथम उत्थान | 1925–1950 | 1868–1893 |
| द्विवेदी युग | द्वितीय उत्थान | 1950–1975 | 1893–1918 |
| शुक्ल युग | तृतीय उत्थान | 1975 से | 1918–1936 |
| शुक्लोत्तर युग | — | — | 1936 के बाद |
संवत् 1975 कहाँ से आया। यह अनुमान नहीं है। शुक्ल जी की पुस्तक में उस प्रकरण का शीर्षक ही है — गद्य साहित्य की वर्तमान गति : तृतीय उत्थान (सं0 1975 से)। पाठ्यक्रम जिसे "शुक्ल युग" कहता है, वह शुक्ल जी का यही तृतीय उत्थान है, बस नाम बदला हुआ।
और 1936 कहाँ से आया। बोर्ड के अपने मॉडल प्रश्नपत्र से। उसका प्रश्न 8 शब्दशः यह है — "सन् 1918 से 1936 ई0 तक का समय है—" और उसके विकल्प हैं प्रेमचन्द्र युग, शुक्ल युग, प्रसाद युग, उपर्युक्त सभी। यही बोर्ड की अपनी सीमा है, इसलिए यही लिखिए।
3. एक युग, तीन नाम
उसी प्रश्न का उत्तर "उपर्युक्त सभी" है, और यह इस यूनिट की सबसे महत्वपूर्ण बात है। 1918 से 1936 तक के एक ही काल के तीन नाम हैं — और तीनों सही हैं।
| नाम | किसके नाम पर | क्यों |
|---|---|---|
| शुक्ल युग | आचार्य रामचन्द्र शुक्ल | आलोचना और इतिहास-लेखन की देन |
| प्रेमचन्द युग | प्रेमचन्द | उपन्यास और कहानी की देन |
| प्रसाद युग | जयशंकर प्रसाद | नाटक, कहानी और छायावादी काव्य की देन |
तीन नाम इसलिए हैं कि तीन अलग-अलग विधाओं में तीन अलग-अलग लोग शिखर पर थे। नाम इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस विधा की ओर से देख रहे हैं।
सीमा-तिथि पर एक निरीक्षण। बोर्ड कारण नहीं बताता, पर 1936 प्रेमचन्द के देहावसान का वर्ष है, और उसी काल का एक नाम "प्रेमचन्द युग" है। प्रसाद जी का देहावसान 1937 में हुआ और शुक्ल जी का 1941 में। यह जोड़ बोर्ड का लिखा नहीं, इसी तालिका से निकला निरीक्षण है — पर तिथि याद रखने में सहायक है।
प्रश्न ऐसे पहचानिए। यदि विकल्पों में तीनों युग-नाम एक साथ दिखें और "उपर्युक्त सभी" भी हो, तो उत्तर प्रायः "उपर्युक्त सभी" होगा। यदि किसी एक लेखक का नाम देकर उसका युग पूछा जाए, तो उस लेखक की मुख्य विधा देखिए।
4. शुक्ल युग यह नाम क्यों पाया
एक इतिहासकार के नाम पर पूरा युग नहीं चलता। शुक्ल जी के नाम पर चला, क्योंकि उन्होंने इतिहास के अतिरिक्त दो और काम किए — उन्होंने आलोचना को खड़ा किया, और उन्होंने निबंध को विचार का माध्यम बनाया।
इसका सबसे अच्छा प्रमाण उनकी अपनी पुस्तक नहीं, उनके समकालीन की पुस्तक है। नन्ददुलारे वाजपेयी ने हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी इसी युग के भीतर लिखी — वे स्वयं कहते हैं कि "अभी इसके चालीस-बयालीस वर्ष ही व्यतीत हुए हैं", अर्थात् पुस्तक 1940-42 के आसपास की है। उसमें रामचन्द्र शुक्ल पर तीन अध्याय हैं; किसी और लेखक पर इतने नहीं। और उनका पहला ही वाक्य यह है —
"आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी-आलोचना के लिए युग-प्रवर्तक कार्य कर गये हैं।"
वाजपेयी जी आगे बताते हैं कि यह कार्य क्या था। भारतेंदु से पहले तक हिन्दी आलोचना "लक्षण ग्रंथों में रसों, अलंकारों, नायक और विशेषकर नायिकाओं की सूची-मात्र बनी हुई थी।" शुक्ल जी ने उन्हीं रस और अलंकार को मनोवैज्ञानिक आधार देकर "ऊँची मानसिक भूमि पर ला बिठाया।" फल यह हुआ कि "रस और अलंकार हिन्दी-समीक्षा से बहिष्कृत हो जाने से बचे।"
यही युग-प्रवर्तन है — पश्चिम से आई नई कसौटी के सामने भारतीय साँचा टूटा नहीं, बदल कर टिक गया।
5. शुक्ल युग की गद्य विधाएँ — शुक्ल जी की अपनी गिनती
'तृतीय उत्थान' प्रकरण में शुक्ल जी स्वयं गद्य के अंगों को क्रम से गिनाते हैं। वही क्रम नीचे है, और हर अंग पर उनका अपना निर्णय भी।
उपन्यास और कहानी — सबसे आगे। शुक्ल जी का वाक्य है: "इस तृतीय उत्थान में हमारा उपन्यास-कहानी साहित्य ही सबसे अधिक समृद्ध हुआ।" वे प्रेमचंद के बाद चार नाम गिनाते हैं — पं0 विश्वंभरनाथ कौशिक, बाबू प्रतापनारायण श्रीवास्तव और श्री जैनेंद्रकुमार को सामाजिक उपन्यासकार, तथा बा0 वृंदावनलाल वर्मा को ऐतिहासिक उपन्यासकार।
नाटक। "इस तृतीय उत्थान के बीच हमारे वर्तमान नाटकक्षेत्र में दो नाटककार बहुत ऊँचे स्थान पर दिखाई पड़े" — जयशंकर प्रसाद और हरिकृष्ण प्रेमी। एकांकी नाटक भी इसी युग में हिन्दी में आया, और उसका पहला बड़ा संग्रह आधुनिक एकांकी नाटक नाम से निकला।
6. निबंध — गद्य की कसौटी, और शुक्ल जी की शिकायत
निबंध पर शुक्ल जी की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति यही है, और वह उन्हीं की पुस्तक में है —
"यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है।"
पर यहीं वे एक ऐसी बात कहते हैं जो अधिकांश पुस्तकों से छूट जाती है। अपने ही युग के निबंध पर उनका निर्णय प्रशंसा का नहीं है —
"निबंध की जो स्थिति हमें द्वितीय उत्थान में दिखाई पड़ी प्रायः वही स्थिति इस काल में भी बनी हुई है। अर्थवैचित्र्य और भाषाशैली का नूतन विकास जैसा कहानियों के भीतर प्रकट हुआ है, वैसा निबंध के क्षेत्र में नहीं देखने में आ रहा है।"
इसे ठीक से पकड़िए। जिस युग को हम "निबंध का युग" कहकर पढ़ते हैं, उसी युग के सबसे बड़े निबंधकार का कहना है कि निबंध पिछड़ा हुआ है और कहानी आगे निकल गई।
पर एक नई चीज़ उन्हें दिखी। "यदि किसी रूप में गद्य की कोई नई गतिविधि दिखाई पड़ी तो काव्यात्मक गद्यप्रबंधों के रूप में।" वे इस भावात्मक-काव्यात्मक गद्य के उदाहरण भी देते हैं — राय कृष्णदास की 'साधना', 'प्रवाल', 'छायापथ'; वियोगी हरि की 'भावना'; और महाराजकुमार डॉ0 रघुवीर सिंह के मुगलकालीन अतीत पर लिखे भावात्मक प्रबंध।
और वे इससे प्रसन्न नहीं हैं। जहाँ "गंभीर विचार और व्यापक दृष्टि अपेक्षित है", वहाँ इस शैली को घसीटा जाते देख उन्हें "दुःख होता है।"
इस बात को याद रखिए। शुक्ल युग की सबसे नई चीज़ वही थी जिससे शुक्ल जी सहमत नहीं थे। और आगे चलकर वही शुक्लोत्तर युग की पहचान बन गई।
7. कहानी — जो सचमुच आगे बढ़ी
शुक्ल जी की बात प्रमाण माँगती है, और वे प्रमाण देते भी हैं। आधुनिक कहानी का आरंभ वे द्वितीय उत्थान के अंतिम भाग में रखते हैं — "जिनका पूर्ण विकास तृतीय उत्थान में हुआ।"
आरंभ की मौलिक कहानियों की सूची वे 'सरस्वती' से वर्षक्रम में देते हैं। उसमें एक नाम चौंकाता है।
| कहानी | लेखक | कहाँ छपी |
|---|---|---|
| इंदुमती | पं0 किशोरीलाल गोस्वामी | 'सरस्वती' |
| ग्यारह वर्ष का समय | रामचन्द्र शुक्ल | 'सरस्वती' |
| पंडित और पंडितानी | गिरिजादत्त वाजपेयी | 'सरस्वती' |
| दुलाईवाली | बंगमहिला | 'सरस्वती', भाग 8, संख्या 5 |
शुक्ल जी इन चारों में से मार्मिकता की दृष्टि से तीन चुनते हैं — इंदुमती, ग्यारह वर्ष का समय, दुलाईवाली — और क्रम में अपनी ही कहानी को दूसरे स्थान पर रखते हैं, बिना यह बताए कि वह उन्हीं की है।
पहली मौलिक कहानी पर वे शर्त लगाते हैं। उनका वाक्य है: "यदि 'इंदुमती' किसी बंगला कहानी की छाया नहीं है तो हिंदी की यही पहली मौलिक कहानी ठहरती है।" — यह "यदि" परीक्षा में नहीं आता, पर यह शुक्ल जी की पद्धति दिखाता है।
'उसने कहा था'। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की यह कहानी सं0 1972 अर्थात् सन् 1915 की 'सरस्वती' में छपी। शुक्ल जी उसे "हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानी" मानते हैं और कारण देते हैं — "इसकी घटनाएँ ही बोल रही हैं, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं।"
प्रेमचंद। शुक्ल जी लिखते हैं कि प्रेमचंद की छोटी कहानियाँ सं0 1973 से निकलने लगीं।
8. समालोचना — शुक्ल युग की असली देन
"इस तृतीय उत्थान में समालोचना का आदर्श भी बदला। गुणदोष के कथन के आगे बढ़कर कवियों की विशेषताओं और उनकी अंतःप्रवृत्ति की छानबीन की ओर भी ध्यान दिया गया।"
शुक्ल जी अपनी तीन समीक्षाएँ स्वयं गिनाते हैं, और तीनों अलग-अलग रूप में छपीं — 'गोस्वामी तुलसीदास' पुस्तक के रूप में, सूर पर समीक्षा 'भ्रमरगीतसार' की भूमिका में, और जायसी पर 'जायसी ग्रंथावली' के साथ।
उनके बाद, उन्हीं के शब्दों में, "'कलाओं' और 'साधनाओं' का ताँता बँधा" — केशव की काव्यकला, गुप्तजी की कला, प्रेमचंद की उपन्यासकला, प्रसाद की नाट्यकला, पद्माकर की काव्यसाधना, मीरा की प्रेमसाधना।
यहाँ एक नाम है जो आपके पाठ्यक्रम का है। पाश्चात्य काव्यमीमांसा पर लिखी पुस्तकों में शुक्ल जी दो गिनाते हैं — बाबू श्यामसुंदरदास कृत 'साहित्यालोचन' और श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी कृत 'विश्वसाहित्य'। यही बख्शी जी आपके गद्य खण्ड के 'क्या लिखूँ' के लेखक हैं। शुक्ल जी ने उन्हें अपने ही युग की सूची में दर्ज किया है।
9. जहाँ शुक्ल जी की पुस्तक रुक जाती है
यह अध्याय का मोड़ है, और इसे छिपाना नहीं चाहिए।
शुक्ल जी 'तृतीय उत्थान' का आरंभ इस स्वीकारोक्ति से करते हैं —
"इस तृतीय उत्थान में हम वर्तमान काल में पहुँचते हैं जो अभी चल रहा है। ... सच पूछिए तो वर्तमान काल, जो अभी चल रहा है, हमसे इतना दूर पीछे नहीं छूटा है कि इतिहास के भीतर आ सके।"
अर्थात् शुक्ल युग का विवरण शुक्ल जी ने इतिहास के रूप में लिखा ही नहीं — उन्होंने उसे "विविध अंगों का संक्षिप्त विवरण" कहा, ताकि प्रवृत्तियाँ भर दिख जाएँ।
और उनकी पुस्तक 1939-40 पर समाप्त हो जाती है। इसलिए शुक्लोत्तर युग के लिए स्रोत बदलना पड़ता है। उस युग की सामग्री शुक्ल जी की पुस्तक में हो ही नहीं सकती।
दो तिथियाँ, दो अलग चीज़ें — इन्हें मत मिलाइए। शुक्ल युग 1936 में समाप्त होता है; शुक्ल जी की पुस्तक 1939-40 तक चलती है। युग की सीमा बोर्ड ने दी है, पुस्तक की सीमा पुस्तक स्वयं बताती है। इसीलिए उनकी पुस्तक में शुक्लोत्तर युग के आरंभ के कुछ वर्ष तो आ जाते हैं, पर उसका साहित्य नहीं आता — जो पुस्तकें उस युग को बनाती हैं वे 1942 के बाद छपीं।
नीचे जो कुछ है, वह उन्हीं वर्षों में छपी पुस्तकों के प्रथम संस्करणों से लिया गया है — मुखपृष्ठ, प्रकाशक और लेखक की अपनी भूमिका से।
10. शुक्लोत्तर युग — पहचान क्या है
नाम का अर्थ सीधा है: शुक्ल जी के बाद का युग। पर पहचान तिथि से नहीं, प्रवृत्ति से बनती है, और वह प्रवृत्ति ठीक वही है जिससे शुक्ल जी सावधान करते थे — व्यक्तिपरक, ललित, काव्य के निकट जाता हुआ गद्य।
इसका सबसे साफ़ प्रमाण एक भूमिका है। रामधारी सिंह 'दिनकर' का निबंध-संग्रह अर्धनारीश्वर जनवाणी प्रकाशन, कलकत्ता से प्रथम संस्करण में छपा; भूमिका मुजफ्फरपुर से, वसंत पंचमी, सन् 1952 ई0 की है। उसमें दिनकर स्वयं संग्रह का नाम समझाते हैं —
"इस संग्रह में ऐसे भी निबन्ध हैं जो मन-बहलाव में लिखे जाने के कारण कविता की चौहद्दी के पास पड़ते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिनमें बौद्धिक चिन्तन या विश्लेषण प्रधान है। इसीलिए, मैंने इस संग्रह का नाम 'अर्धनारीश्वर' रखा है।"
आधा कविता, आधा विचार — और इसीलिए अर्धनारीश्वर। जिस मिश्रण को शुक्ल जी ने खतरा कहा था, दिनकर उसी को अपने संग्रह का नाम बना रहे हैं। यही दो युगों का अंतर है।
और वह पाठ इसी पुस्तक में है। अर्धनारीश्वर की विषय-सूची में छठा निबंध है — 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से'। आपके पाठ्यक्रम का पाठ यही है। (पाठ्यक्रम में वर्तनी 'न गयी' है, मूल पुस्तक में 'न गई'।)
11. शुक्लोत्तर युग की गद्य विधाएँ
ललित निबंध। निबंध अब विषय पर नहीं, लेखक पर केंद्रित हो गया। इसका सबसे साफ़ नमूना पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का संग्रह कुछ है — इंडियन प्रेस, प्रयाग, सन् 1945। उसका पहला ही निबंध 'क्या लिखूँ ?' है, वही जो आपके पाठ्यक्रम में है।
वह निबंध किस बारे में है? इस बारे में कि निबंध लिखा कैसे जाए। बख्शी जी अंग्रेज़ी निबंधकार ए0 जी0 गार्डिनर को उद्धृत करके शुरू करते हैं, फिर स्वीकार करते हैं कि गार्डिनर वाली मनःस्थिति उन्हें कभी आई ही नहीं — "मुझे तो सोचना पड़ता है, चिन्ता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं मैं एक निबन्ध लिख सकता हूँ।"
यही शुक्लोत्तर निबंध है — विषय बहाना है, लेखक का 'मैं' असली वस्तु है। और उसी पुस्तक में प्रेमचंद, महावीरप्रसाद द्विवेदी और सुमित्रानंदन पंत पर भी निबंध हैं, जो दिखाता है कि बख्शी जी दोनों युगों को जोड़ने वाली कड़ी हैं।
नई समीक्षा। नन्ददुलारे वाजपेयी की हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी इस मोड़ की पहली पुस्तक है। वे शुक्ल जी को "युग-प्रवर्तक" कहते हैं और उसी साँस में उनकी सीमाएँ भी गिनाते हैं — कि शुक्ल जी का लोकधर्म-सिद्धांत मध्यवर्ग की आदर्शात्मक प्रेरणाओं से जुड़ा है। गुरु के प्रति श्रद्धा और उसकी खुली आलोचना, एक साथ — यह शुक्ल युग की समीक्षा में संभव न था।
बाल एवं विज्ञान गद्य। यह विधा शुक्ल जी की सूची में है ही नहीं। जय प्रकाश भारती की झिलमिल कथाएँ 1959 में छपी, और उनकी एक और पुस्तक का नाम ही है चलो चाँद पर चलें। आपके पाठ्यक्रम का पाठ 'पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी' इसी परंपरा का है — विज्ञान को हिन्दी गद्य में लाने की।
12. कृति, लेखक और विधा — जो सबसे अधिक पूछा जाता है
बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र के पाँच में से तीन प्रश्न इसी पर हैं — किसी कृति का लेखक कौन, या कोई कृति उपन्यास है या कहानी। नीचे की तालिका इसी के लिए है।
| कृति | लेखक | विधा |
|---|---|---|
| सेवासदन, गोदान | प्रेमचन्द | उपन्यास |
| कफन | प्रेमचन्द | कहानी |
| चित्रलेखा | भगवती चरण वर्मा | उपन्यास |
| विराटा की पद्मिनी | वृन्दावनलाल वर्मा | ऐतिहासिक उपन्यास |
| अजातशत्रु, स्कंदगुप्त | जयशंकर प्रसाद | नाटक |
| ममता, आकाशदीप | जयशंकर प्रसाद | कहानी |
| उसने कहा था | चंद्रधर शर्मा गुलेरी | कहानी |
| मैला आँचल | फणीश्वर नाथ 'रेणु' | आंचलिक उपन्यास |
यही जाल है। 'कफन' और 'उसने कहा था' कहानियाँ हैं, उपन्यास नहीं। 'अजातशत्रु' नाटक है। प्रश्न प्रायः "निम्नलिखित में से उपन्यास है" के रूप में आता है और सूची में एक कहानी छिपाकर रखी जाती है।
चित्रलेखा पर शुक्ल जी की अपनी टिप्पणी। यह उपन्यास उनकी ही पुस्तक में सराहा गया है। वे पहले बताते हैं कि योरप में ऐसे उपन्यास लिखे जा रहे हैं जो पाप और पुण्य जैसे चिरनिर्धारित मूल्यों की मीमांसा करते हैं, फिर लिखते हैं —
"बड़े हर्ष की बात है कि हमारे हिंदी साहित्य में भी बा0 भगवतीचरण वर्मा ने 'चित्रलेखा' नाम का इस ढंग का एक सुंदर उपन्यास प्रस्तुत किया है।"
उपन्यासकारों के प्रकार। यह भी पूछा जाता है — किस लेखक का उपन्यास किस प्रकार का है।
| प्रकार | लेखक |
|---|---|
| सामाजिक | प्रेमचन्द, विश्वंभरनाथ कौशिक, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, जैनेन्द्रकुमार |
| ऐतिहासिक | वृन्दावनलाल वर्मा |
| मनोवैज्ञानिक | इलाचन्द्र जोशी |
| आंचलिक | फणीश्वर नाथ 'रेणु' |
पहली दो पंक्तियाँ शुक्ल जी की अपनी सूची से हैं। इलाचन्द्र जोशी शुक्ल जी की पुस्तक में नहीं हैं, पर नन्ददुलारे वाजपेयी में हैं — वे उन्हें यथार्थवादी रचना-पद्धति का दूसरा उल्लेखनीय लेखक बताते हैं और उसी प्रसंग में कहते हैं कि यथार्थवादी रचना के लिए "मनोवैज्ञानिक तटस्थता" अनिवार्य-सी है। बोर्ड उनसे यही पूछता है — उनकी कहानियों का विषय मनोवैज्ञानिक है।
13. पाठ्यक्रम के सात गद्य लेखक — किस युग में
| पाठ | लेखक | युग | आधार |
|---|---|---|---|
| मित्रता | रामचन्द्र शुक्ल | शुक्ल युग | युग उन्हीं के नाम पर है |
| ममता | जयशंकर प्रसाद | शुक्ल युग | शुक्ल जी उन्हें "स्वर्गीय" लिखते हैं — 1937 में देहावसान |
| भारतीय संस्कृति | राजेन्द्र प्रसाद | दोनों में फैला हुआ | लेखन-काल शुक्ल युग से स्वतंत्रता के बाद तक |
| अजन्ता | भगवतशरण उपाध्याय | शुक्लोत्तर युग | इतिहास और पुरातत्व का ललित गद्य |
| क्या लिखूँ | पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी | दोनों में फैला हुआ | 'विश्वसाहित्य' शुक्ल जी की सूची में; 'कुछ' 1945 का |
| ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से | रामधारी सिंह दिनकर | शुक्लोत्तर युग | 'अर्धनारीश्वर', प्रथम संस्करण 1952 |
| पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी | जय प्रकाश भारती | शुक्लोत्तर युग | बाल एवं विज्ञान गद्य, 1959 के आगे |
दिनकर पर एक अलग बात। शुक्ल जी की पुस्तक में दिनकर का नाम आता है — पर कवि के रूप में, 'स्वच्छंद धारा' में, छायावाद से अलग। वे उनकी पहली रचना 'प्रणभंग' बताते हैं और दो संग्रह गिनाते हैं — 'रेणुका' और 'हुंकार'। अर्थात् शुक्ल युग के अंत में दिनकर कवि थे; गद्यकार वे शुक्लोत्तर युग में बने।
यही इस यूनिट का सबसे उपयोगी सूत्र है। दो युगों की सीमा किसी तिथि पर नहीं, इस बदलाव पर पहचानी जाती है — शुक्ल युग में गद्य विचार का औज़ार था, शुक्लोत्तर युग में वह अनुभूति का माध्यम भी बन गया।
सारांश
पाठ्यक्रम केवल दो युग माँगता है — शुक्ल युग और शुक्लोत्तर युग — और पाँच बहुविकल्पीय प्रश्नों में 5 अंक देता है। शुक्ल युग वही है जिसे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपनी पुस्तक में 'तृतीय उत्थान (सं0 1975 से)' कहते हैं, अर्थात् 1918 ई0 से।
बोर्ड का मॉडल प्रश्नपत्र उसकी दूसरी सीमा भी देता है — 1936 ई0 — और साथ ही यह कि उसी काल के तीन नाम हैं: शुक्ल युग, प्रेमचन्द युग और प्रसाद युग। तीनों सही हैं, क्योंकि तीन विधाओं में तीन लोग शिखर पर थे।
उस युग का नाम शुक्ल जी पर इसलिए पड़ा कि उन्होंने आलोचना को खड़ा किया — उनके समकालीन नन्ददुलारे वाजपेयी के शब्दों में, "युग-प्रवर्तक कार्य।" उस युग में सबसे अधिक समृद्धि उपन्यास और कहानी की हुई; समालोचना का आदर्श बदला; नाटक में प्रसाद और प्रेमी ऊँचे रहे; और निबंध — स्वयं शुक्ल जी के अनुसार — जहाँ का तहाँ रहा।
पर शुक्ल जी ने वही बात लिख भी दी जो इस अध्याय की धुरी है — वर्तमान काल "इतिहास के भीतर" नहीं आ सकता, और उनकी पुस्तक 1939-40 पर रुक जाती है। इसीलिए शुक्लोत्तर युग की सामग्री उन्हीं वर्षों में छपी पुस्तकों के प्रथम संस्करणों से आती है — वाजपेयी की 'बीसवीं शताब्दी' (लगभग 1942), बख्शी का 'कुछ' (1945), दिनकर का 'अर्धनारीश्वर' (1952), भारती की 'झिलमिल कथाएँ' (1959)।
पाँच में से तीन प्रश्न कृति, लेखक और विधा के मेल पर आते हैं, इसलिए वह तालिका अलग से याद कीजिए — विशेषकर यह कि 'कफन' और 'उसने कहा था' कहानियाँ हैं और 'अजातशत्रु' नाटक है।
और शुक्लोत्तर की चारों पुस्तकों में एक ही दिशा दिखती है: गद्य विचार से हटकर व्यक्ति की ओर, विषय से हटकर 'मैं' की ओर। दिनकर ने उसी को अर्धनारीश्वर कहा — आधा विचार, आधी कविता। यही शुक्लोत्तर युग की पहचान है, और यही दो युगों को अलग करने की सबसे भरोसेमंद कसौटी।
परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है
पाठ्यक्रम की पंक्ति में कोष्ठक है, और कोष्ठक सीमा खींचता है। नीचे की बातें बड़ी हैं, पर यूनिट 1 (i) की नहीं हैं।
- भारतेंदु युग और द्विवेदी युग का विस्तृत विवरण। भारतेंदु का पहला मौलिक नाटक, 'बनारस अखबार', राजा शिवप्रसाद और राजा लक्ष्मणसिंह का विवाद, लाला श्रीनिवासदास का 'परीक्षागुरु', काशी नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना — यह सब शुक्ल जी की पुस्तक में है, पर आपके कोष्ठक के बाहर है।
- गद्य का आविर्भाव। मुंशी सदासुखलाल, इंशाअल्ला खाँ, लल्लूलाल और सदल मिश्र — शुक्ल जी जिन्हें "गद्य की एक साथ परंपरा चलाने वाले चार प्रमुख लेखक" कहते हैं — यूनिट 1 (i) में नहीं आते।
- गद्य खण्ड के सात पाठों का सार। वह यूनिट 1 (ii) है, 11 अंक, और उसके प्रश्न गद्यांश पर आधारित होते हैं।
- लेखकों का जीवन परिचय। वह खण्ड-ब का प्रश्न 6 (क) है, 3+2=5, और उसमें जीवन परिचय के साथ प्रमुख रचना का नाम भी माँगा जाता है।
- पद्य का इतिहास। रीतिकाल और आधुनिक काल यूनिट 2 (i) में हैं, अलग 5 अंक के।
एक अनसुलझी बात, जो ईमानदारी से लिखी जा रही है। 'मित्रता' आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की रचना है, इसमें कोई संदेह नहीं। पर यह प्रायः जो कहा जाता है कि वह चिंतामणि में संकलित है, उसकी पुष्टि नहीं हो सकी — चिंतामणि के दोनों प्रकाशित भागों के पूरे पाठ में 'मित्रता' शब्द एक बार भी नहीं आता। परीक्षा में यह पूछा नहीं जाता, इसलिए इसे यहीं छोड़ा जा रहा है — अनुमान लगाकर भरा नहीं जा रहा।
