By the end of this chapter you'll be able to…

  • 1हिन्दी गद्य के चारों युगों के नाम, उनके संवत् और यह बताना कि पाठ्यक्रम में केवल अंतिम दो हैं
  • 2शुक्ल युग और शुक्ल जी के 'तृतीय उत्थान' को एक ही वस्तु के दो नाम के रूप में पहचानना
  • 3संवत् 1975 यानी 1918 ई0 को शुक्ल युग के आरंभ के रूप में स्रोत सहित बताना
  • 4शुक्ल युग की दोनों सीमाएँ (1918 और 1936) और उसके तीनों नामों को स्रोत सहित बताना
  • 5यह कारण देना कि युग का नाम एक आलोचक-इतिहासकार पर क्यों पड़ा
  • 6शुक्ल युग की चार प्रमुख गद्य विधाएँ और उन पर शुक्ल जी का अपना निर्णय बताना
  • 7यह बताना कि शुक्ल जी अपने ही युग के निबंध को पिछड़ा हुआ मानते थे और कहानी को आगे
  • 8आरंभिक मौलिक कहानियों — इंदुमती, ग्यारह वर्ष का समय, दुलाईवाली — को लेखक सहित पहचानना
  • 9'उसने कहा था' का लेखक, वर्ष और शुक्ल जी द्वारा दिया गया कारण बताना
  • 10शुक्ल जी की तीन समीक्षाएँ और वे किस रूप में छपीं, यह बताना
  • 11शुक्लोत्तर युग की पहचान तिथि से नहीं, प्रवृत्ति से करना — विचार से अनुभूति की ओर
  • 12'अर्धनारीश्वर', 'कुछ', 'बीसवीं शताब्दी' और 'झिलमिल कथाएँ' को उनके वर्ष और लेखक सहित जोड़ना
  • 13पाठ्यक्रम के सातों गद्य लेखकों को उनके युग के सामने रखना
  • 14कृति, लेखक और विधा को एक साथ जोड़ना — विशेषकर कहानी और उपन्यास का अंतर
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Why this chapter matters
प्रश्नपत्र का पहला ही प्रश्न यही है — पाँच अंक, पाँच बहुविकल्पीय प्रश्न, और सब युग-लेखक-कृति के मेल पर। इस अध्याय का पहला आधा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की अपनी पुस्तक से है, क्योंकि पाठ्यक्रम जिसे 'शुक्ल युग' कहता है उसे शुक्ल जी स्वयं 'तृतीय उत्थान' कहकर लिख गए हैं। दूसरा आधा वहाँ से आगे है, और उसके लिए उन्हीं वर्षों में छपी पुस्तकों के प्रथम संस्करण देखने पड़े हैं।

हिन्दी गद्य साहित्य का विकास — शुक्ल युग एवं शुक्लोत्तर युग

"सच पूछिए तो वर्तमान काल, जो अभी चल रहा है, हमसे इतना दूर पीछे नहीं छूटा है कि इतिहास के भीतर आ सके।" — आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, 'गद्य साहित्य की वर्तमान गति : तृतीय उत्थान' का आरंभ

1. इस अध्याय में क्या है

यह पूरा अध्याय यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी, यूनिट 1 (i) है। पाठ्यक्रम की इकाईवार तालिका इसे 05 अंक देती है, और प्रश्नपत्र में यह खण्ड-अ का सबसे पहला प्रश्न है। पाठ्यक्रम की पंक्ति शब्दशः यह है —

1. हिन्दी गद्य के विकास का संक्षिप्त परिचय (शुक्ल युग तथा शुक्लोत्तर युग) — 5×1=5

तीन शब्द ध्यान से पढ़िए।

"संक्षिप्त परिचय।" बोर्ड पूरा इतिहास नहीं माँगता। पाँच बहुविकल्पीय प्रश्न भर हैं, और वे युग, लेखक, कृति और विधा के मेल पर आते हैं।

"शुक्ल युग तथा शुक्लोत्तर युग।" यही सीमा है। भारतेंदु युग और द्विवेदी युग इस कोष्ठक के बाहर हैं। उन्हें इस अध्याय में केवल इतना रखा गया है कि शुक्ल युग की बात समझ में आ सके — क्योंकि जिस चीज़ को शुक्ल युग आगे बढ़ाता है, वह वहीं से आती है।

यह यूनिट 1 (ii) नहीं है। आपके गद्य खण्ड के सात पाठ — 'मित्रता', 'ममता', 'भारतीय संस्कृति', 'अजन्ता', 'क्या लिखूँ', 'ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से', 'पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी' — अलग 11 अंक के हैं। पर उन सातों के लेखक ठीक इन्हीं दो युगों में बँटे हुए हैं, और यह अध्याय अंत में उन्हें उनके युग के सामने रखकर छोड़ेगा।

2. गद्य के युग व्यक्तियों के नाम पर क्यों हैं

पद्य के इतिहास में काल का नाम प्रवृत्ति पर पड़ता है — वीरगाथा, भक्ति, रीति। गद्य में नाम व्यक्ति पर पड़ता है — भारतेंदु, द्विवेदी, शुक्ल। यह अंतर आकस्मिक नहीं है।

शुक्ल जी स्वयं इसका कारण देते हैं। खड़ी बोली गद्य की उम्र बहुत कम है। जिस भाषा-रूप में यह पूरा साहित्य लिखा गया, वह उन्नीसवीं सदी के मध्य में ही व्यवहार में आया। सौ-सवा सौ वर्ष में "चित्तवृत्ति" जैसी धीमी चीज़ तीन बार नहीं बदलती — पर एक-एक व्यक्ति की लेखनी पूरे लेखक-समाज की शैली बदल देती है।

इसीलिए शुक्ल जी ने अपनी पुस्तक में गद्य के लिए 'काल' शब्द ही नहीं रखा। उन्होंने 'उत्थान' शब्द रखा — और आधुनिक गद्य को तीन उत्थानों में बाँटा।

हिन्दी गद्य के चार युग ऊपर शुक्ल जी के अपने नाम, नीचे पाठ्यक्रम के नाम प्रथम उत्थान द्वितीय उत्थान तृतीय उत्थान — (पुस्तक यहाँ नहीं पहुँचती) भारतेंदु युग सं0 1925–1950 द्विवेदी युग सं0 1950–1975 शुक्ल युग 1918–1936 ई0 शुक्लोत्तर युग 1936 के बाद 1868 ई0 1893 ई0 1918 ई0 1936 ई0 आज तक कक्षा-10 के पाठ्यक्रम में केवल ये दो पृष्ठभूमि — पूछा नहीं जाता = प्रेमचन्द युग = प्रसाद युग ईस्वी = संवत् − 57
पाठ्यक्रम का नामशुक्ल जी का अपना नामसंवत्ईस्वी
भारतेंदु युगप्रथम उत्थान1925–19501868–1893
द्विवेदी युगद्वितीय उत्थान1950–19751893–1918
शुक्ल युगतृतीय उत्थान1975 से1918–1936
शुक्लोत्तर युग1936 के बाद

संवत् 1975 कहाँ से आया। यह अनुमान नहीं है। शुक्ल जी की पुस्तक में उस प्रकरण का शीर्षक ही है — गद्य साहित्य की वर्तमान गति : तृतीय उत्थान (सं0 1975 से)। पाठ्यक्रम जिसे "शुक्ल युग" कहता है, वह शुक्ल जी का यही तृतीय उत्थान है, बस नाम बदला हुआ।

और 1936 कहाँ से आया। बोर्ड के अपने मॉडल प्रश्नपत्र से। उसका प्रश्न 8 शब्दशः यह है — "सन् 1918 से 1936 ई0 तक का समय है—" और उसके विकल्प हैं प्रेमचन्द्र युग, शुक्ल युग, प्रसाद युग, उपर्युक्त सभी। यही बोर्ड की अपनी सीमा है, इसलिए यही लिखिए।

3. एक युग, तीन नाम

उसी प्रश्न का उत्तर "उपर्युक्त सभी" है, और यह इस यूनिट की सबसे महत्वपूर्ण बात है। 1918 से 1936 तक के एक ही काल के तीन नाम हैं — और तीनों सही हैं।

नामकिसके नाम परक्यों
शुक्ल युगआचार्य रामचन्द्र शुक्लआलोचना और इतिहास-लेखन की देन
प्रेमचन्द युगप्रेमचन्दउपन्यास और कहानी की देन
प्रसाद युगजयशंकर प्रसादनाटक, कहानी और छायावादी काव्य की देन

तीन नाम इसलिए हैं कि तीन अलग-अलग विधाओं में तीन अलग-अलग लोग शिखर पर थे। नाम इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस विधा की ओर से देख रहे हैं।

सीमा-तिथि पर एक निरीक्षण। बोर्ड कारण नहीं बताता, पर 1936 प्रेमचन्द के देहावसान का वर्ष है, और उसी काल का एक नाम "प्रेमचन्द युग" है। प्रसाद जी का देहावसान 1937 में हुआ और शुक्ल जी का 1941 में। यह जोड़ बोर्ड का लिखा नहीं, इसी तालिका से निकला निरीक्षण है — पर तिथि याद रखने में सहायक है।

प्रश्न ऐसे पहचानिए। यदि विकल्पों में तीनों युग-नाम एक साथ दिखें और "उपर्युक्त सभी" भी हो, तो उत्तर प्रायः "उपर्युक्त सभी" होगा। यदि किसी एक लेखक का नाम देकर उसका युग पूछा जाए, तो उस लेखक की मुख्य विधा देखिए।

4. शुक्ल युग यह नाम क्यों पाया

एक इतिहासकार के नाम पर पूरा युग नहीं चलता। शुक्ल जी के नाम पर चला, क्योंकि उन्होंने इतिहास के अतिरिक्त दो और काम किए — उन्होंने आलोचना को खड़ा किया, और उन्होंने निबंध को विचार का माध्यम बनाया।

इसका सबसे अच्छा प्रमाण उनकी अपनी पुस्तक नहीं, उनके समकालीन की पुस्तक है। नन्ददुलारे वाजपेयी ने हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी इसी युग के भीतर लिखी — वे स्वयं कहते हैं कि "अभी इसके चालीस-बयालीस वर्ष ही व्यतीत हुए हैं", अर्थात् पुस्तक 1940-42 के आसपास की है। उसमें रामचन्द्र शुक्ल पर तीन अध्याय हैं; किसी और लेखक पर इतने नहीं। और उनका पहला ही वाक्य यह है —

"आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी-आलोचना के लिए युग-प्रवर्तक कार्य कर गये हैं।"

वाजपेयी जी आगे बताते हैं कि यह कार्य क्या था। भारतेंदु से पहले तक हिन्दी आलोचना "लक्षण ग्रंथों में रसों, अलंकारों, नायक और विशेषकर नायिकाओं की सूची-मात्र बनी हुई थी।" शुक्ल जी ने उन्हीं रस और अलंकार को मनोवैज्ञानिक आधार देकर "ऊँची मानसिक भूमि पर ला बिठाया।" फल यह हुआ कि "रस और अलंकार हिन्दी-समीक्षा से बहिष्कृत हो जाने से बचे।"

यही युग-प्रवर्तन है — पश्चिम से आई नई कसौटी के सामने भारतीय साँचा टूटा नहीं, बदल कर टिक गया।

5. शुक्ल युग की गद्य विधाएँ — शुक्ल जी की अपनी गिनती

'तृतीय उत्थान' प्रकरण में शुक्ल जी स्वयं गद्य के अंगों को क्रम से गिनाते हैं। वही क्रम नीचे है, और हर अंग पर उनका अपना निर्णय भी।

शुक्ल युग की चार गद्य विधाएँ — शुक्ल जी का अपना निर्णय उपन्यास और कहानी "सबसे अधिक समृद्ध हुआ" प्रेमचंद · जैनेंद्रकुमार · विश्वंभरनाथ कौशिक प्रतापनारायण श्रीवास्तव · वृंदावनलाल वर्मा सामाजिक और ऐतिहासिक, दोनों समालोचना "समालोचना का आदर्श भी बदला" गुणदोष से आगे — कवि की अंतःप्रवृत्ति तुलसी · सूर · जायसी पर विस्तृत समीक्षा यही शुक्ल जी की अपनी देन है नाटक "दो नाटककार बहुत ऊँचे स्थान पर" जयशंकर प्रसाद · हरिकृष्ण प्रेमी एकांकी नाटक अब आया ऐतिहासिक वृत्त पर आधारित निबंध "प्रायः वही स्थिति इस काल में भी" अर्थात् द्विवेदी युग से आगे नहीं बढ़ा नई गति केवल काव्यात्मक गद्य में यही सबसे चौंकाने वाला निर्णय है स्रोत — 'हिन्दी साहित्य का इतिहास', प्रकरण 5 : गद्य साहित्य की वर्तमान गति

उपन्यास और कहानी — सबसे आगे। शुक्ल जी का वाक्य है: "इस तृतीय उत्थान में हमारा उपन्यास-कहानी साहित्य ही सबसे अधिक समृद्ध हुआ।" वे प्रेमचंद के बाद चार नाम गिनाते हैं — पं0 विश्वंभरनाथ कौशिक, बाबू प्रतापनारायण श्रीवास्तव और श्री जैनेंद्रकुमार को सामाजिक उपन्यासकार, तथा बा0 वृंदावनलाल वर्मा को ऐतिहासिक उपन्यासकार।

नाटक। "इस तृतीय उत्थान के बीच हमारे वर्तमान नाटकक्षेत्र में दो नाटककार बहुत ऊँचे स्थान पर दिखाई पड़े" — जयशंकर प्रसाद और हरिकृष्ण प्रेमी। एकांकी नाटक भी इसी युग में हिन्दी में आया, और उसका पहला बड़ा संग्रह आधुनिक एकांकी नाटक नाम से निकला।

6. निबंध — गद्य की कसौटी, और शुक्ल जी की शिकायत

निबंध पर शुक्ल जी की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति यही है, और वह उन्हीं की पुस्तक में है —

"यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है।"

पर यहीं वे एक ऐसी बात कहते हैं जो अधिकांश पुस्तकों से छूट जाती है। अपने ही युग के निबंध पर उनका निर्णय प्रशंसा का नहीं है —

"निबंध की जो स्थिति हमें द्वितीय उत्थान में दिखाई पड़ी प्रायः वही स्थिति इस काल में भी बनी हुई है। अर्थवैचित्र्य और भाषाशैली का नूतन विकास जैसा कहानियों के भीतर प्रकट हुआ है, वैसा निबंध के क्षेत्र में नहीं देखने में आ रहा है।"

इसे ठीक से पकड़िए। जिस युग को हम "निबंध का युग" कहकर पढ़ते हैं, उसी युग के सबसे बड़े निबंधकार का कहना है कि निबंध पिछड़ा हुआ है और कहानी आगे निकल गई।

पर एक नई चीज़ उन्हें दिखी। "यदि किसी रूप में गद्य की कोई नई गतिविधि दिखाई पड़ी तो काव्यात्मक गद्यप्रबंधों के रूप में।" वे इस भावात्मक-काव्यात्मक गद्य के उदाहरण भी देते हैं — राय कृष्णदास की 'साधना', 'प्रवाल', 'छायापथ'; वियोगी हरि की 'भावना'; और महाराजकुमार डॉ0 रघुवीर सिंह के मुगलकालीन अतीत पर लिखे भावात्मक प्रबंध।

और वे इससे प्रसन्न नहीं हैं। जहाँ "गंभीर विचार और व्यापक दृष्टि अपेक्षित है", वहाँ इस शैली को घसीटा जाते देख उन्हें "दुःख होता है।"

इस बात को याद रखिए। शुक्ल युग की सबसे नई चीज़ वही थी जिससे शुक्ल जी सहमत नहीं थे। और आगे चलकर वही शुक्लोत्तर युग की पहचान बन गई।

7. कहानी — जो सचमुच आगे बढ़ी

शुक्ल जी की बात प्रमाण माँगती है, और वे प्रमाण देते भी हैं। आधुनिक कहानी का आरंभ वे द्वितीय उत्थान के अंतिम भाग में रखते हैं — "जिनका पूर्ण विकास तृतीय उत्थान में हुआ।"

आरंभ की मौलिक कहानियों की सूची वे 'सरस्वती' से वर्षक्रम में देते हैं। उसमें एक नाम चौंकाता है।

कहानीलेखककहाँ छपी
इंदुमतीपं0 किशोरीलाल गोस्वामी'सरस्वती'
ग्यारह वर्ष का समयरामचन्द्र शुक्ल'सरस्वती'
पंडित और पंडितानीगिरिजादत्त वाजपेयी'सरस्वती'
दुलाईवालीबंगमहिला'सरस्वती', भाग 8, संख्या 5

शुक्ल जी इन चारों में से मार्मिकता की दृष्टि से तीन चुनते हैं — इंदुमती, ग्यारह वर्ष का समय, दुलाईवाली — और क्रम में अपनी ही कहानी को दूसरे स्थान पर रखते हैं, बिना यह बताए कि वह उन्हीं की है।

पहली मौलिक कहानी पर वे शर्त लगाते हैं। उनका वाक्य है: "यदि 'इंदुमती' किसी बंगला कहानी की छाया नहीं है तो हिंदी की यही पहली मौलिक कहानी ठहरती है।" — यह "यदि" परीक्षा में नहीं आता, पर यह शुक्ल जी की पद्धति दिखाता है।

'उसने कहा था'। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की यह कहानी सं0 1972 अर्थात् सन् 1915 की 'सरस्वती' में छपी। शुक्ल जी उसे "हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानी" मानते हैं और कारण देते हैं — "इसकी घटनाएँ ही बोल रही हैं, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं।"

प्रेमचंद। शुक्ल जी लिखते हैं कि प्रेमचंद की छोटी कहानियाँ सं0 1973 से निकलने लगीं।

8. समालोचना — शुक्ल युग की असली देन

"इस तृतीय उत्थान में समालोचना का आदर्श भी बदला। गुणदोष के कथन के आगे बढ़कर कवियों की विशेषताओं और उनकी अंतःप्रवृत्ति की छानबीन की ओर भी ध्यान दिया गया।"

शुक्ल जी अपनी तीन समीक्षाएँ स्वयं गिनाते हैं, और तीनों अलग-अलग रूप में छपीं — 'गोस्वामी तुलसीदास' पुस्तक के रूप में, सूर पर समीक्षा 'भ्रमरगीतसार' की भूमिका में, और जायसी पर 'जायसी ग्रंथावली' के साथ।

उनके बाद, उन्हीं के शब्दों में, "'कलाओं' और 'साधनाओं' का ताँता बँधा" — केशव की काव्यकला, गुप्तजी की कला, प्रेमचंद की उपन्यासकला, प्रसाद की नाट्यकला, पद्माकर की काव्यसाधना, मीरा की प्रेमसाधना।

यहाँ एक नाम है जो आपके पाठ्यक्रम का है। पाश्चात्य काव्यमीमांसा पर लिखी पुस्तकों में शुक्ल जी दो गिनाते हैं — बाबू श्यामसुंदरदास कृत 'साहित्यालोचन' और श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी कृत 'विश्वसाहित्य'। यही बख्शी जी आपके गद्य खण्ड के 'क्या लिखूँ' के लेखक हैं। शुक्ल जी ने उन्हें अपने ही युग की सूची में दर्ज किया है।

9. जहाँ शुक्ल जी की पुस्तक रुक जाती है

यह अध्याय का मोड़ है, और इसे छिपाना नहीं चाहिए।

शुक्ल जी 'तृतीय उत्थान' का आरंभ इस स्वीकारोक्ति से करते हैं —

"इस तृतीय उत्थान में हम वर्तमान काल में पहुँचते हैं जो अभी चल रहा है। ... सच पूछिए तो वर्तमान काल, जो अभी चल रहा है, हमसे इतना दूर पीछे नहीं छूटा है कि इतिहास के भीतर आ सके।"

अर्थात् शुक्ल युग का विवरण शुक्ल जी ने इतिहास के रूप में लिखा ही नहीं — उन्होंने उसे "विविध अंगों का संक्षिप्त विवरण" कहा, ताकि प्रवृत्तियाँ भर दिख जाएँ।

और उनकी पुस्तक 1939-40 पर समाप्त हो जाती है। इसलिए शुक्लोत्तर युग के लिए स्रोत बदलना पड़ता है। उस युग की सामग्री शुक्ल जी की पुस्तक में हो ही नहीं सकती।

दो तिथियाँ, दो अलग चीज़ें — इन्हें मत मिलाइए। शुक्ल युग 1936 में समाप्त होता है; शुक्ल जी की पुस्तक 1939-40 तक चलती है। युग की सीमा बोर्ड ने दी है, पुस्तक की सीमा पुस्तक स्वयं बताती है। इसीलिए उनकी पुस्तक में शुक्लोत्तर युग के आरंभ के कुछ वर्ष तो आ जाते हैं, पर उसका साहित्य नहीं आता — जो पुस्तकें उस युग को बनाती हैं वे 1942 के बाद छपीं।

नीचे जो कुछ है, वह उन्हीं वर्षों में छपी पुस्तकों के प्रथम संस्करणों से लिया गया है — मुखपृष्ठ, प्रकाशक और लेखक की अपनी भूमिका से।

10. शुक्लोत्तर युग — पहचान क्या है

नाम का अर्थ सीधा है: शुक्ल जी के बाद का युग। पर पहचान तिथि से नहीं, प्रवृत्ति से बनती है, और वह प्रवृत्ति ठीक वही है जिससे शुक्ल जी सावधान करते थे — व्यक्तिपरक, ललित, काव्य के निकट जाता हुआ गद्य।

इसका सबसे साफ़ प्रमाण एक भूमिका है। रामधारी सिंह 'दिनकर' का निबंध-संग्रह अर्धनारीश्वर जनवाणी प्रकाशन, कलकत्ता से प्रथम संस्करण में छपा; भूमिका मुजफ्फरपुर से, वसंत पंचमी, सन् 1952 ई0 की है। उसमें दिनकर स्वयं संग्रह का नाम समझाते हैं —

"इस संग्रह में ऐसे भी निबन्ध हैं जो मन-बहलाव में लिखे जाने के कारण कविता की चौहद्दी के पास पड़ते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिनमें बौद्धिक चिन्तन या विश्लेषण प्रधान है। इसीलिए, मैंने इस संग्रह का नाम 'अर्धनारीश्वर' रखा है।"

आधा कविता, आधा विचार — और इसीलिए अर्धनारीश्वर। जिस मिश्रण को शुक्ल जी ने खतरा कहा था, दिनकर उसी को अपने संग्रह का नाम बना रहे हैं। यही दो युगों का अंतर है।

और वह पाठ इसी पुस्तक में है। अर्धनारीश्वर की विषय-सूची में छठा निबंध है — 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से'। आपके पाठ्यक्रम का पाठ यही है। (पाठ्यक्रम में वर्तनी 'न गयी' है, मूल पुस्तक में 'न गई'।)

11. शुक्लोत्तर युग की गद्य विधाएँ

शुक्ल युग → शुक्लोत्तर युग : विधाएँ कैसे बदलीं शुक्ल युग शुक्लोत्तर युग विचारात्मक निबंध ललित निबंध 'अर्धनारीश्वर', 1952 इतिहास और गुण-दोष समीक्षा नई समीक्षा 'बीसवीं शताब्दी', लगभग 1942 सामाजिक-ऐतिहासिक उपन्यास आंचलिक एवं मनोवैज्ञानिक व्यक्ति भीतर से देखा गया — थी ही नहीं — बाल एवं विज्ञान गद्य 'झिलमिल कथाएँ', 1959

ललित निबंध। निबंध अब विषय पर नहीं, लेखक पर केंद्रित हो गया। इसका सबसे साफ़ नमूना पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का संग्रह कुछ है — इंडियन प्रेस, प्रयाग, सन् 1945। उसका पहला ही निबंध 'क्या लिखूँ ?' है, वही जो आपके पाठ्यक्रम में है।

वह निबंध किस बारे में है? इस बारे में कि निबंध लिखा कैसे जाए। बख्शी जी अंग्रेज़ी निबंधकार ए0 जी0 गार्डिनर को उद्धृत करके शुरू करते हैं, फिर स्वीकार करते हैं कि गार्डिनर वाली मनःस्थिति उन्हें कभी आई ही नहीं — "मुझे तो सोचना पड़ता है, चिन्ता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं मैं एक निबन्ध लिख सकता हूँ।"

यही शुक्लोत्तर निबंध है — विषय बहाना है, लेखक का 'मैं' असली वस्तु है। और उसी पुस्तक में प्रेमचंद, महावीरप्रसाद द्विवेदी और सुमित्रानंदन पंत पर भी निबंध हैं, जो दिखाता है कि बख्शी जी दोनों युगों को जोड़ने वाली कड़ी हैं।

नई समीक्षा। नन्ददुलारे वाजपेयी की हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी इस मोड़ की पहली पुस्तक है। वे शुक्ल जी को "युग-प्रवर्तक" कहते हैं और उसी साँस में उनकी सीमाएँ भी गिनाते हैं — कि शुक्ल जी का लोकधर्म-सिद्धांत मध्यवर्ग की आदर्शात्मक प्रेरणाओं से जुड़ा है। गुरु के प्रति श्रद्धा और उसकी खुली आलोचना, एक साथ — यह शुक्ल युग की समीक्षा में संभव न था।

बाल एवं विज्ञान गद्य। यह विधा शुक्ल जी की सूची में है ही नहीं। जय प्रकाश भारती की झिलमिल कथाएँ 1959 में छपी, और उनकी एक और पुस्तक का नाम ही है चलो चाँद पर चलें। आपके पाठ्यक्रम का पाठ 'पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी' इसी परंपरा का है — विज्ञान को हिन्दी गद्य में लाने की।

12. कृति, लेखक और विधा — जो सबसे अधिक पूछा जाता है

बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र के पाँच में से तीन प्रश्न इसी पर हैं — किसी कृति का लेखक कौन, या कोई कृति उपन्यास है या कहानी। नीचे की तालिका इसी के लिए है।

कृतिलेखकविधा
सेवासदन, गोदानप्रेमचन्दउपन्यास
कफनप्रेमचन्दकहानी
चित्रलेखाभगवती चरण वर्माउपन्यास
विराटा की पद्मिनीवृन्दावनलाल वर्माऐतिहासिक उपन्यास
अजातशत्रु, स्कंदगुप्तजयशंकर प्रसादनाटक
ममता, आकाशदीपजयशंकर प्रसादकहानी
उसने कहा थाचंद्रधर शर्मा गुलेरीकहानी
मैला आँचलफणीश्वर नाथ 'रेणु'आंचलिक उपन्यास

यही जाल है। 'कफन' और 'उसने कहा था' कहानियाँ हैं, उपन्यास नहीं। 'अजातशत्रु' नाटक है। प्रश्न प्रायः "निम्नलिखित में से उपन्यास है" के रूप में आता है और सूची में एक कहानी छिपाकर रखी जाती है।

चित्रलेखा पर शुक्ल जी की अपनी टिप्पणी। यह उपन्यास उनकी ही पुस्तक में सराहा गया है। वे पहले बताते हैं कि योरप में ऐसे उपन्यास लिखे जा रहे हैं जो पाप और पुण्य जैसे चिरनिर्धारित मूल्यों की मीमांसा करते हैं, फिर लिखते हैं —

"बड़े हर्ष की बात है कि हमारे हिंदी साहित्य में भी बा0 भगवतीचरण वर्मा ने 'चित्रलेखा' नाम का इस ढंग का एक सुंदर उपन्यास प्रस्तुत किया है।"

उपन्यासकारों के प्रकार। यह भी पूछा जाता है — किस लेखक का उपन्यास किस प्रकार का है।

प्रकारलेखक
सामाजिकप्रेमचन्द, विश्वंभरनाथ कौशिक, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, जैनेन्द्रकुमार
ऐतिहासिकवृन्दावनलाल वर्मा
मनोवैज्ञानिकइलाचन्द्र जोशी
आंचलिकफणीश्वर नाथ 'रेणु'

पहली दो पंक्तियाँ शुक्ल जी की अपनी सूची से हैं। इलाचन्द्र जोशी शुक्ल जी की पुस्तक में नहीं हैं, पर नन्ददुलारे वाजपेयी में हैं — वे उन्हें यथार्थवादी रचना-पद्धति का दूसरा उल्लेखनीय लेखक बताते हैं और उसी प्रसंग में कहते हैं कि यथार्थवादी रचना के लिए "मनोवैज्ञानिक तटस्थता" अनिवार्य-सी है। बोर्ड उनसे यही पूछता है — उनकी कहानियों का विषय मनोवैज्ञानिक है।

13. पाठ्यक्रम के सात गद्य लेखक — किस युग में

पाठलेखकयुगआधार
मित्रतारामचन्द्र शुक्लशुक्ल युगयुग उन्हीं के नाम पर है
ममताजयशंकर प्रसादशुक्ल युगशुक्ल जी उन्हें "स्वर्गीय" लिखते हैं — 1937 में देहावसान
भारतीय संस्कृतिराजेन्द्र प्रसाददोनों में फैला हुआलेखन-काल शुक्ल युग से स्वतंत्रता के बाद तक
अजन्ताभगवतशरण उपाध्यायशुक्लोत्तर युगइतिहास और पुरातत्व का ललित गद्य
क्या लिखूँपदुमलाल पुन्नालाल बख्शीदोनों में फैला हुआ'विश्वसाहित्य' शुक्ल जी की सूची में; 'कुछ' 1945 का
ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन सेरामधारी सिंह दिनकरशुक्लोत्तर युग'अर्धनारीश्वर', प्रथम संस्करण 1952
पानी में चन्दा और चाँद पर आदमीजय प्रकाश भारतीशुक्लोत्तर युगबाल एवं विज्ञान गद्य, 1959 के आगे

दिनकर पर एक अलग बात। शुक्ल जी की पुस्तक में दिनकर का नाम आता है — पर कवि के रूप में, 'स्वच्छंद धारा' में, छायावाद से अलग। वे उनकी पहली रचना 'प्रणभंग' बताते हैं और दो संग्रह गिनाते हैं — 'रेणुका' और 'हुंकार'। अर्थात् शुक्ल युग के अंत में दिनकर कवि थे; गद्यकार वे शुक्लोत्तर युग में बने।

यही इस यूनिट का सबसे उपयोगी सूत्र है। दो युगों की सीमा किसी तिथि पर नहीं, इस बदलाव पर पहचानी जाती है — शुक्ल युग में गद्य विचार का औज़ार था, शुक्लोत्तर युग में वह अनुभूति का माध्यम भी बन गया।

सारांश

पाठ्यक्रम केवल दो युग माँगता है — शुक्ल युग और शुक्लोत्तर युग — और पाँच बहुविकल्पीय प्रश्नों में 5 अंक देता है। शुक्ल युग वही है जिसे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपनी पुस्तक में 'तृतीय उत्थान (सं0 1975 से)' कहते हैं, अर्थात् 1918 ई0 से।

बोर्ड का मॉडल प्रश्नपत्र उसकी दूसरी सीमा भी देता है — 1936 ई0 — और साथ ही यह कि उसी काल के तीन नाम हैं: शुक्ल युग, प्रेमचन्द युग और प्रसाद युग। तीनों सही हैं, क्योंकि तीन विधाओं में तीन लोग शिखर पर थे।

उस युग का नाम शुक्ल जी पर इसलिए पड़ा कि उन्होंने आलोचना को खड़ा किया — उनके समकालीन नन्ददुलारे वाजपेयी के शब्दों में, "युग-प्रवर्तक कार्य।" उस युग में सबसे अधिक समृद्धि उपन्यास और कहानी की हुई; समालोचना का आदर्श बदला; नाटक में प्रसाद और प्रेमी ऊँचे रहे; और निबंध — स्वयं शुक्ल जी के अनुसार — जहाँ का तहाँ रहा।

पर शुक्ल जी ने वही बात लिख भी दी जो इस अध्याय की धुरी है — वर्तमान काल "इतिहास के भीतर" नहीं आ सकता, और उनकी पुस्तक 1939-40 पर रुक जाती है। इसीलिए शुक्लोत्तर युग की सामग्री उन्हीं वर्षों में छपी पुस्तकों के प्रथम संस्करणों से आती है — वाजपेयी की 'बीसवीं शताब्दी' (लगभग 1942), बख्शी का 'कुछ' (1945), दिनकर का 'अर्धनारीश्वर' (1952), भारती की 'झिलमिल कथाएँ' (1959)।

पाँच में से तीन प्रश्न कृति, लेखक और विधा के मेल पर आते हैं, इसलिए वह तालिका अलग से याद कीजिए — विशेषकर यह कि 'कफन' और 'उसने कहा था' कहानियाँ हैं और 'अजातशत्रु' नाटक है।

और शुक्लोत्तर की चारों पुस्तकों में एक ही दिशा दिखती है: गद्य विचार से हटकर व्यक्ति की ओर, विषय से हटकर 'मैं' की ओर। दिनकर ने उसी को अर्धनारीश्वर कहा — आधा विचार, आधी कविता। यही शुक्लोत्तर युग की पहचान है, और यही दो युगों को अलग करने की सबसे भरोसेमंद कसौटी।

परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है

पाठ्यक्रम की पंक्ति में कोष्ठक है, और कोष्ठक सीमा खींचता है। नीचे की बातें बड़ी हैं, पर यूनिट 1 (i) की नहीं हैं।

  • भारतेंदु युग और द्विवेदी युग का विस्तृत विवरण। भारतेंदु का पहला मौलिक नाटक, 'बनारस अखबार', राजा शिवप्रसाद और राजा लक्ष्मणसिंह का विवाद, लाला श्रीनिवासदास का 'परीक्षागुरु', काशी नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना — यह सब शुक्ल जी की पुस्तक में है, पर आपके कोष्ठक के बाहर है।
  • गद्य का आविर्भाव। मुंशी सदासुखलाल, इंशाअल्ला खाँ, लल्लूलाल और सदल मिश्र — शुक्ल जी जिन्हें "गद्य की एक साथ परंपरा चलाने वाले चार प्रमुख लेखक" कहते हैं — यूनिट 1 (i) में नहीं आते।
  • गद्य खण्ड के सात पाठों का सार। वह यूनिट 1 (ii) है, 11 अंक, और उसके प्रश्न गद्यांश पर आधारित होते हैं।
  • लेखकों का जीवन परिचय। वह खण्ड-ब का प्रश्न 6 (क) है, 3+2=5, और उसमें जीवन परिचय के साथ प्रमुख रचना का नाम भी माँगा जाता है।
  • पद्य का इतिहास। रीतिकाल और आधुनिक काल यूनिट 2 (i) में हैं, अलग 5 अंक के।

एक अनसुलझी बात, जो ईमानदारी से लिखी जा रही है। 'मित्रता' आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की रचना है, इसमें कोई संदेह नहीं। पर यह प्रायः जो कहा जाता है कि वह चिंतामणि में संकलित है, उसकी पुष्टि नहीं हो सकी — चिंतामणि के दोनों प्रकाशित भागों के पूरे पाठ में 'मित्रता' शब्द एक बार भी नहीं आता। परीक्षा में यह पूछा नहीं जाता, इसलिए इसे यहीं छोड़ा जा रहा है — अनुमान लगाकर भरा नहीं जा रहा।

Key formulas & results

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शुक्ल युग का दूसरा नाम
शुक्ल युग = तृतीय उत्थान = सं0 1975 से = 1918–1936 ई0
आरंभ शुक्ल जी के प्रकरण-शीर्षक से, अंत बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र से
संवत् से ईस्वी
ईस्वी = संवत् − 57
सं0 1975 − 57 = 1918 ई0। हर तिथि इसी से मिलाइए
एक युग, तीन नाम
शुक्ल युग = प्रेमचन्द युग = प्रसाद युग (1918–1936 ई0)
बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र का उत्तर 'उपर्युक्त सभी' है। आलोचना से शुक्ल, उपन्यास से प्रेमचन्द, नाटक से प्रसाद
चारों युग एक पंक्ति में
भारतेंदु (1925-50) → द्विवेदी (1950-75) → शुक्ल (1975 से) → शुक्लोत्तर (1936 ई0 के बाद)
संवत् में। पाठ्यक्रम में केवल अंतिम दो
निबंध की कसौटी
गद्य = लेखकों की कसौटी, निबंध = गद्य की कसौटी
शुक्ल जी का वाक्य, 'तृतीय उत्थान' के निबंध खंड का पहला वाक्य
शुक्ल युग की सबसे समृद्ध विधा
उपन्यास-कहानी > समालोचना > नाटक > निबंध
शुक्ल जी के अपने निर्णय के क्रम में, उनकी ही पुस्तक से
दोनों युगों को अलग करने की कसौटी
शुक्ल युग = विचार का गद्य; शुक्लोत्तर युग = अनुभूति का गद्य
तिथि से नहीं, इसी बदलाव से पहचानिए
शुक्ल जी की पुस्तक की सीमा
'बीस-इक्कीस वर्ष' + 'आज', 28 अक्टूबर 1939 का उद्धरण = पुस्तक 1939-40 तक
इसीलिए शुक्लोत्तर युग उसमें हो ही नहीं सकता
शुक्ल जी की तीन समीक्षाएँ
तुलसी = पुस्तक; सूर = 'भ्रमरगीतसार' की भूमिका; जायसी = 'जायसी ग्रंथावली' के साथ
तीनों अलग-अलग रूप में छपीं — यही पूछा जाता है
शुक्लोत्तर की चार पुस्तकें, चार वर्ष
बीसवीं शताब्दी ~1942 → कुछ 1945 → अर्धनारीश्वर 1952 → झिलमिल कथाएँ 1959
प्रथम संस्करणों से। चारों में एक ही दिशा दिखती है
आरंभिक कहानियाँ
इंदुमती (किशोरीलाल गोस्वामी) · ग्यारह वर्ष का समय (रामचन्द्र शुक्ल) · दुलाईवाली (बंगमहिला)
तीनों 'सरस्वती' में; शुक्ल जी इसी क्रम में मार्मिकता से चुनते हैं
युग-प्रवर्तक का प्रमाण
'शुक्ल जी हिन्दी-आलोचना के लिए युग-प्रवर्तक कार्य कर गये हैं' — नन्ददुलारे वाजपेयी
समकालीन का कथन, इसलिए यही सबसे मजबूत प्रमाण है
दो नाटककार
तृतीय उत्थान के दो ऊँचे नाटककार = जयशंकर प्रसाद + हरिकृष्ण प्रेमी
शुक्ल जी के अपने शब्द — 'बहुत ऊँचे स्थान पर दिखाई पड़े'
विधा पहचान का जाल
कफन = कहानी · उसने कहा था = कहानी · अजातशत्रु = नाटक
'निम्नलिखित में से उपन्यास है' वाले प्रश्न में यही तीन छिपाकर रखे जाते हैं
उपन्यास के चार प्रकार
सामाजिक = प्रेमचन्द · ऐतिहासिक = वृन्दावनलाल वर्मा · मनोवैज्ञानिक = इलाचन्द्र जोशी · आंचलिक = रेणु
पहले दो शुक्ल जी की सूची से; इलाचन्द्र जोशी वाजपेयी से
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
शुक्ल युग और तृतीय उत्थान को दो अलग चीज़ें समझना
एक ही चीज़ के दो नाम हैं। शुक्ल जी की पुस्तक में प्रकरण का शीर्षक है 'गद्य साहित्य की वर्तमान गति : तृतीय उत्थान (सं0 1975 से)'। पाठ्यक्रम उसी को शुक्ल युग कहता है। विकल्पों में दोनों नाम साथ रखे जाते हैं।
WATCH OUT
शुक्ल युग को 'निबंध का स्वर्णयुग' कहकर लिख देना
शुक्ल जी स्वयं इसके विरुद्ध हैं — 'निबंध की जो स्थिति हमें द्वितीय उत्थान में दिखाई पड़ी प्रायः वही स्थिति इस काल में भी बनी हुई है।' उनके अनुसार आगे कहानी बढ़ी, निबंध नहीं। शुक्ल जी स्वयं महान निबंधकार थे, पर वे अपने युग के निबंध-साहित्य को नहीं सराहते।
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शुक्लोत्तर युग की सामग्री शुक्ल जी की पुस्तक में ढूँढ़ना
उनकी पुस्तक 1939-40 पर रुक जाती है — वे स्वयं 'बीस-इक्कीस वर्ष' लिखते हैं और 'आज', 28 अक्टूबर 1939 का उद्धरण देते हैं। शुक्लोत्तर युग की पुस्तकें उसके बाद छपीं, इसलिए उनका उल्लेख वहाँ हो ही नहीं सकता।
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दिनकर को शुक्ल युग का गद्यकार बताना क्योंकि शुक्ल जी उनका नाम लेते हैं
शुक्ल जी दिनकर का नाम लेते हैं, पर कवि के रूप में — 'स्वच्छंद धारा' में, छायावाद से अलग, पहली रचना 'प्रणभंग' और संग्रह 'रेणुका' तथा 'हुंकार'। गद्यकार दिनकर शुक्लोत्तर युग के हैं; 'अर्धनारीश्वर' का प्रथम संस्करण 1952 का है।
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'इंदुमती' को बिना शर्त हिन्दी की पहली मौलिक कहानी लिख देना
शुक्ल जी शर्त लगाते हैं — 'यदि इंदुमती किसी बंगला कहानी की छाया नहीं है तो हिंदी की यही पहली मौलिक कहानी ठहरती है।' बहुविकल्पीय प्रश्न में उत्तर 'इंदुमती' ही होगा, पर वर्णनात्मक उत्तर में यह 'यदि' लिख देना चाहिए।
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'उसने कहा था' का वर्ष संवत् में और ईस्वी में गड्डमड्ड करना
शुक्ल जी दोनों साथ देते हैं — 'सं0 1972 अर्थात् सन् 1915 की सरस्वती'। विकल्पों में 1915 और 1972 दोनों रखे जाते हैं। लेखक चंद्रधर शर्मा गुलेरी हैं।
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'ग्यारह वर्ष का समय' का लेखक न पहचानना
वह स्वयं रामचन्द्र शुक्ल की कहानी है, और वे उसे अपनी सूची में बिना यह बताए रखते हैं कि वह उन्हीं की है। मार्मिकता के क्रम में वे उसे इंदुमती के बाद दूसरे स्थान पर रखते हैं।
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शुक्ल जी की तीनों समीक्षाओं को तीन अलग पुस्तकें मान लेना
केवल 'गोस्वामी तुलसीदास' पुस्तकाकार छपी। सूर पर समीक्षा 'भ्रमरगीतसार' की भूमिका है और जायसी पर 'जायसी ग्रंथावली' के साथ है। प्रश्न प्रायः इसी अंतर पर आता है।
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'क्या लिखूँ' को केवल एक हल्का-फुल्का निबंध समझना
वह बख्शी जी के संग्रह 'कुछ' (1945) का पहला निबंध है और उसका विषय ही यह है कि निबंध लिखा कैसे जाए। वे ए0 जी0 गार्डिनर को उद्धृत करके आरंभ करते हैं और फिर स्वीकार करते हैं कि वैसी मनःस्थिति उन्हें कभी नहीं आई। यही शुक्लोत्तर ललित निबंध की पहचान है।
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पाठ्यक्रम की सीमा भूलकर भारतेंदु और द्विवेदी युग विस्तार से लिख देना
पाठ्यक्रम की पंक्ति में कोष्ठक है — '(शुक्ल युग तथा शुक्लोत्तर युग)'। पहले दो युग केवल पृष्ठभूमि हैं। समय बचाइए और उसे इन्हीं दो पर लगाइए।
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यूनिट 1 (i) और यूनिट 1 (ii) को एक मान लेना
(i) गद्य साहित्य का इतिहास है, 5 अंक, सब बहुविकल्पीय। (ii) गद्य खण्ड है, 11 अंक, और उसमें गद्यांश पर प्रश्न आते हैं। लेखकों का जीवन परिचय तीसरी जगह है — खण्ड-ब का प्रश्न 6 (क), 3+2=5।
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शुक्ल युग की अंतिम तिथि 1938 लिख देना
बोर्ड का मॉडल प्रश्नपत्र स्वयं सीमा देता है — 'सन् 1918 से 1936 ई0 तक का समय है' — इसलिए अंतिम तिथि 1936 है, 1938 नहीं। कई पुस्तकों में 1938 मिलता है, पर बोर्ड की अपनी तिथि वही मानी जाएगी जो उसके प्रश्नपत्र में है। साथ ही ध्यान रखिए कि शुक्ल जी की पुस्तक 1939-40 तक चलती है — पुस्तक की सीमा और युग की सीमा दो अलग चीज़ें हैं।
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'कफन' या 'उसने कहा था' को उपन्यास मान लेना
दोनों कहानियाँ हैं। 'निम्नलिखित में से उपन्यास है' वाले प्रश्न में सूची के भीतर एक कहानी छिपाकर रखी जाती है — मॉडल प्रश्नपत्र में यह 'कफन' थी। उपन्यास हैं सेवासदन, विराटा की पद्मिनी और चित्रलेखा; 'अजातशत्रु' नाटक है।
WATCH OUT
शुक्ल युग, प्रेमचन्द युग और प्रसाद युग को तीन अलग काल समझना
तीनों एक ही काल (1918–1936) के तीन नाम हैं, और बोर्ड इसी पर प्रश्न बनाता है — विकल्पों में तीनों नाम रखकर उत्तर 'उपर्युक्त सभी' रखा जाता है। नाम इस पर निर्भर है कि किस विधा की ओर से देखा जा रहा है: आलोचना से शुक्ल, उपन्यास-कहानी से प्रेमचन्द, नाटक से प्रसाद।

Practice problems

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Readiness check

Are you exam-ready for हिन्दी गद्य साहित्य का विकास — शुक्ल युग एवं शुक्लोत्तर युग?

13 problems from this chapter. Try each one, reveal the worked solution, mark yourself honestly — get your gap report at the end.

13 questions~9 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • पाठ्यक्रम की पंक्ति: 'हिन्दी गद्य के विकास का संक्षिप्त परिचय (शुक्ल युग तथा शुक्लोत्तर युग)', 5×1=5
  • यह खण्ड-अ का प्रश्न 1 है, यानी प्रश्नपत्र का सबसे पहला प्रश्न
  • गद्य के युग व्यक्तियों के नाम पर हैं, पद्य के काल प्रवृत्ति के नाम पर
  • शुक्ल जी ने गद्य के लिए 'काल' नहीं, 'उत्थान' शब्द रखा
  • भारतेंदु युग = प्रथम उत्थान, सं0 1925-1950
  • द्विवेदी युग = द्वितीय उत्थान, सं0 1950-1975
  • शुक्ल युग = तृतीय उत्थान, सं0 1975 से, यानी 1918 ई0 से 1936 ई0 तक
  • शुक्ल युग 1918 से 1936 ई0 — दोनों तिथियाँ प्रमाणित, अंत बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र से
  • एक ही काल के तीन नाम: शुक्ल युग = प्रेमचन्द युग = प्रसाद युग
  • तीन नाम क्यों — आलोचना से शुक्ल, उपन्यास-कहानी से प्रेमचन्द, नाटक से प्रसाद
  • युग का नाम शुक्ल जी पर पड़ा क्योंकि उन्होंने आलोचना खड़ी की और निबंध को विचार का माध्यम बनाया
  • नन्ददुलारे वाजपेयी: 'शुक्ल जी हिन्दी-आलोचना के लिए युग-प्रवर्तक कार्य कर गये हैं'
  • वाजपेयी की पुस्तक 'हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी' में शुक्ल जी पर तीन अध्याय हैं
  • वाजपेयी के अनुसार शुक्ल जी ने रस-अलंकार को मनोवैज्ञानिक आधार देकर समीक्षा से बहिष्कृत होने से बचाया
  • तृतीय उत्थान में सबसे अधिक समृद्ध हुआ उपन्यास-कहानी साहित्य
  • सामाजिक उपन्यासकार: प्रेमचंद, विश्वंभरनाथ कौशिक, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, जैनेंद्रकुमार
  • ऐतिहासिक उपन्यासकार: वृंदावनलाल वर्मा
  • दो ऊँचे नाटककार: जयशंकर प्रसाद और हरिकृष्ण प्रेमी
  • एकांकी नाटक इसी युग में आया; पहला बड़ा संग्रह 'आधुनिक एकांकी नाटक'
  • 'निबंध गद्य की कसौटी है' — शुक्ल जी का वाक्य
  • पर शुक्ल जी के अनुसार निबंध की स्थिति द्विवेदी युग जैसी ही बनी रही
  • गद्य की एकमात्र नई गतिविधि — काव्यात्मक और भावात्मक गद्यप्रबंध
  • उदाहरण: राय कृष्णदास की 'साधना', 'प्रवाल', 'छायापथ'; वियोगी हरि की 'भावना'
  • आधुनिक कहानी का आरंभ द्वितीय उत्थान के अंत में, पूर्ण विकास तृतीय उत्थान में
  • आरंभिक मौलिक कहानियाँ: इंदुमती (किशोरीलाल गोस्वामी), ग्यारह वर्ष का समय (रामचन्द्र शुक्ल), दुलाईवाली (बंगमहिला)
  • 'ग्यारह वर्ष का समय' स्वयं शुक्ल जी की कहानी है
  • 'उसने कहा था' — चंद्रधर शर्मा गुलेरी, सं0 1972 यानी सन् 1915 की 'सरस्वती'
  • शुक्ल जी का कारण: 'इसकी घटनाएँ ही बोल रही हैं, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं'
  • प्रेमचंद की छोटी कहानियाँ सं0 1973 से
  • शुक्ल जी की तीन समीक्षाएँ: 'गोस्वामी तुलसीदास' पुस्तक, सूर पर 'भ्रमरगीतसार' की भूमिका, जायसी पर 'जायसी ग्रंथावली' के साथ
  • पाश्चात्य काव्यमीमांसा पर दो पुस्तकें: श्यामसुंदरदास का 'साहित्यालोचन', बख्शी का 'विश्वसाहित्य'
  • शुक्ल जी की पुस्तक 1939-40 पर रुकती है — 'बीस-इक्कीस वर्ष' और 'आज', 28 अक्टूबर 1939 का उद्धरण
  • उनका अपना वाक्य: वर्तमान काल 'इतना दूर पीछे नहीं छूटा है कि इतिहास के भीतर आ सके'
  • शुक्लोत्तर युग की पहचान तिथि से नहीं, प्रवृत्ति से — विचार से अनुभूति की ओर
  • 'अर्धनारीश्वर' — दिनकर, जनवाणी प्रकाशन कलकत्ता, प्रथम संस्करण, भूमिका 1952 ई0
  • दिनकर की भूमिका: कुछ निबंध 'कविता की चौहद्दी के पास', कुछ में 'बौद्धिक चिन्तन' प्रधान — इसीलिए नाम अर्धनारीश्वर
  • 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' — 'अर्धनारीश्वर' का छठा निबंध
  • 'कुछ' — बख्शी, इंडियन प्रेस प्रयाग, 1945; 'क्या लिखूँ ?' उसका पहला निबंध
  • 'क्या लिखूँ' ए0 जी0 गार्डिनर के उद्धरण से आरंभ होता है
  • जय प्रकाश भारती की 'झिलमिल कथाएँ' 1959 — बाल एवं विज्ञान गद्य, जो शुक्ल युग में था ही नहीं
  • शुक्ल जी दिनकर का नाम कवि के रूप में लेते हैं — 'स्वच्छंद धारा', पहली रचना 'प्रणभंग', संग्रह 'रेणुका' और 'हुंकार'
  • कफन और उसने कहा था कहानियाँ हैं; अजातशत्रु और स्कंदगुप्त नाटक हैं
  • उपन्यास: सेवासदन और गोदान (प्रेमचन्द), चित्रलेखा (भगवती चरण वर्मा), विराटा की पद्मिनी (वृन्दावनलाल वर्मा)
  • मैला आँचल — फणीश्वर नाथ 'रेणु', आंचलिक उपन्यास, शुक्लोत्तर युग
  • इलाचन्द्र जोशी — मनोवैज्ञानिक; वाजपेयी उन्हें यथार्थवादी पद्धति का दूसरा उल्लेखनीय लेखक कहते हैं
  • चित्रलेखा को शुक्ल जी ने स्वयं सराहा — 'बड़े हर्ष की बात है… एक सुंदर उपन्यास प्रस्तुत किया है'

Uttar Pradesh (UPMSP) marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: यूनिट 1 (i) — गद्य साहित्य का इतिहास: 05 अंक (पाठ्यक्रम की इकाईवार तालिका)। प्रश्नपत्र में यह खण्ड-अ का प्रश्न 1 है, 5×1=5, सब बहुविकल्पीय।

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय (खण्ड-अ, प्रश्न 1)15शुक्ल युग का दूसरा नाम और आरंभ-संवत्; युग का नामकरण किस कार्य पर; किस विधा में कितनी प्रगति; कोई लेखक या कृति किस युग की; आरंभिक कहानियाँ और उनके लेखक; शुक्लोत्तर युग की पहचान
लघु उत्तरीय — इस यूनिट में बोर्ड नहीं पूछता, समझ जाँचने के लिए2-30 (अभ्यास हेतु)यही सामग्री खण्ड-ब प्रश्न 6 (क) के लेखक-जीवन-परिचय (3+2=5) में परोक्ष रूप से काम आती है, जहाँ लेखक को उसके युग में रखना पड़ता है
Prep strategy
  • सबसे पहले चारों युगों की तालिका कंठस्थ कीजिए — पाठ्यक्रम का नाम, शुक्ल जी का नाम, संवत्, ईस्वी। आधा यूनिट यहीं तैयार हो जाता है
  • एक पंक्ति याद रखिए: शुक्ल युग = तृतीय उत्थान = सं0 1975 = 1918 ई0। विकल्पों में तीनों रूप मिलाकर रखे जाते हैं
  • शुक्ल जी के चार निर्णय अलग से याद कीजिए — उपन्यास-कहानी सबसे आगे, समालोचना का आदर्श बदला, दो नाटककार ऊँचे, निबंध जहाँ का तहाँ
  • आरंभिक तीन कहानियों को लेखक सहित लिखकर रटिए, क्योंकि नाम अदल-बदल कर पूछे जाते हैं
  • शुक्लोत्तर की चार पुस्तकें उनके वर्ष के साथ एक पंक्ति में लिखिए — बीसवीं शताब्दी, कुछ, अर्धनारीश्वर, झिलमिल कथाएँ
  • अपने गद्य खण्ड के सातों लेखकों को उनके युग के सामने लिखिए — इससे यूनिट 1 (i) और खण्ड-ब का प्रश्न 6 (क) एक साथ तैयार होते हैं
  • शुक्लोत्तर युग के लिए तिथि नहीं, कसौटी याद रखिए — विचार का गद्य बनाम अनुभूति का गद्य

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

गद्य खण्ड के सात निर्धारित लेखकों को उनके युग में रखना

गद्य खण्ड के सात निर्धारित लेखकों को उनके युग में रखना — यही ज्ञान खण्ड-ब के 3+2=5 अंक वाले जीवन-परिचय प्रश्न की रीढ़ है

किसी भी अपरिचित लेखक का नाम सामने आने पर उसकी कृति के प्र…

किसी भी अपरिचित लेखक का नाम सामने आने पर उसकी कृति के प्रकाशन-वर्ष से उसका युग निकाल लेना

किसी पुस्तक का मुखपृष्ठ और भूमिका पढ़कर उसका काल तय करना

किसी पुस्तक का मुखपृष्ठ और भूमिका पढ़कर उसका काल तय करना — यही पद्धति इस अध्याय में बरती गई है

प्रतियोगी परीक्षाओं के हिन्दी साहित्य खंड में युग-लेखक-कृ…

प्रतियोगी परीक्षाओं के हिन्दी साहित्य खंड में युग-लेखक-कृति के मेल वाले प्रश्न, जो लगभग इसी ढाँचे पर आते हैं

पद्य के इतिहास (यूनिट 2 (i)) से तुलना करके यह समझना कि का…

पद्य के इतिहास (यूनिट 2 (i)) से तुलना करके यह समझना कि काल-विभाजन के दो अलग आधार क्यों होते हैं

किसी दावे के सामने यह पूछने की आदत कि उसका स्रोत क्या है

किसी दावे के सामने यह पूछने की आदत कि उसका स्रोत क्या है — जैसे 'मित्रता चिंतामणि में है' जैसे प्रचलित कथन की जाँच

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
खण्ड-अ ओ0एम0आर0 शीट पर है — गोला पूरा काला कीजिए, और उत्तर अंकित करने के बाद न काटिए, न इरेजर या व्हाइटनर लगाइए। यह निर्देश आधिकारिक मॉडल प्रश्नपत्र में स्पष्ट लिखा है
2
यह प्रश्नपत्र का पहला प्रश्न है। पाँचों उत्तर दो मिनट में हो जाने चाहिए, ताकि पूरा समय खण्ड-ब को मिले
3
विकल्पों में संवत् और ईस्वी दोनों साथ रखे जाते हैं। पहले देखिए कि प्रश्न किसमें पूछ रहा है, फिर उत्तर चुनिए
4
यदि किसी लेखक का युग पूछा जाए और याद न आए, तो उसकी किसी कृति का वर्ष याद कीजिए — 1940 से पहले शुक्ल युग, बाद में शुक्लोत्तर
5
'शुक्ल युग' और 'तृतीय उत्थान' एक साथ विकल्पों में रखे जाते हैं ताकि भ्रम हो। दोनों एक ही हैं, इसलिए ऐसा प्रश्न बनेगा ही नहीं जिसमें दोनों सही विकल्प हों — प्रश्न की भाषा देखिए कि वह शुक्ल जी का नाम माँग रहा है या पाठ्यक्रम का
6
विधा-संबंधी प्रश्न में 'सबसे अधिक समृद्ध' शब्द दिखे तो उत्तर उपन्यास-कहानी है, निबंध नहीं। यही सबसे आम जाल है
7
कथन-आधारित प्रश्न में उद्धरण की भाषा देखिए। 'कसौटी' शब्द आए तो शुक्ल जी, 'युग-प्रवर्तक' आए तो वाजपेयी जी
8
समय बचे तो पाँचों उत्तर एक बार दोबारा देखिए — इस यूनिट में सही उत्तर या तो तुरंत आता है या नहीं आता, सोचने से नहीं निकलता

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
शुक्ल जी लिखते हैं कि वर्तमान काल 'इतिहास के भीतर' नहीं आ सकता, फिर भी वे तृतीय उत्थान लिखते हैं। इस विरोध को वे कैसे साधते हैं — देखिए कि वे उसे 'इतिहास' नहीं, 'विविध अंगों का संक्षिप्त विवरण' कहते हैं। क्या यह बचाव पर्याप्त है?
STRETCH
शुक्ल जी काव्यात्मक गद्य को खतरा मानते हैं; दिनकर उसी को अपने संग्रह का नाम बनाते हैं। दोनों के तर्क आमने-सामने रखिए और तय कीजिए कि विचार-प्रधान विषय पर भावात्मक शैली कब उपयोगी है और कब नहीं
STRETCH
पद्य के काल प्रवृत्ति के नाम पर हैं और गद्य के युग व्यक्तियों के नाम पर। यदि गद्य को भी प्रवृत्ति के नाम दिए जाते तो चारों युगों के क्या नाम होते? अपने नाम गढ़िए और उन्हें उचित ठहराइए
STRETCH
वाजपेयी जी शुक्ल जी को युग-प्रवर्तक कहते हैं और उसी पुस्तक में उनकी सीमाएँ भी गिनाते हैं। श्रद्धा और आलोचना का यह मेल किसी और आलोचक में कहाँ दिखता है — खोजकर तुलना कीजिए
STRETCH
शुक्ल जी अपनी ही कहानी 'ग्यारह वर्ष का समय' को सूची में रखते हैं पर लेखक-परिचय नहीं देते। इतिहासकार अपनी ही रचना का मूल्यांकन कैसे करे — इस पर एक पृष्ठ लिखिए
STRETCH
'उसने कहा था' की प्रशंसा में शुक्ल जी कहते हैं कि उसकी घटनाएँ बोलती हैं, पात्र नहीं। अपनी पढ़ी हुई किसी एक कहानी को इसी कसौटी पर परखिए

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

यू0पी0 बोर्ड हाईस्कूल परीक्षा — हिन्दी (विषय कोड 901), खण्ड-अ प्रश्न 1
यू0पी0 बोर्ड हाईस्कूल — खण्ड-ब प्रश्न 6 (क), लेखकों का जीवन परिचय एवं प्रमुख रचना, 3+2=5
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-9 हिन्दी — गद्य साहित्य का इतिहास, जहाँ पहले दो युग आते हैं
यू0पी0 टी0ई0टी0 एवं सी0टी0ई0टी0 — भाषा-1 हिन्दी में साहित्य-इतिहास के प्रश्न
यू0पी0पी0एस0सी0 एवं अन्य राज्य सेवा परीक्षाएँ — सामान्य हिन्दी में युग-लेखक-कृति के मेल वाले प्रश्न

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

1936। बोर्ड का अपना मॉडल प्रश्नपत्र यह तिथि देता है — उसका प्रश्न शब्दशः है 'सन् 1918 से 1936 ई0 तक का समय है'। कई गाइडों में 1938 मिलेगा, पर जब बोर्ड की अपनी तिथि उपलब्ध हो तो वही मान्य है। आरंभ की तिथि भी प्रमाणित है — शुक्ल जी के प्रकरण का शीर्षक ही 'तृतीय उत्थान (सं0 1975 से)' है, और सं0 1975 = 1918 ई0। एक बात अलग रखिए: शुक्ल जी की पुस्तक 1939-40 तक चलती है, पर युग 1936 पर समाप्त माना जाता है।

दोनों अलग-अलग चीज़ों के बारे में हैं। शुक्ल जी स्वयं हिन्दी के सबसे बड़े निबंधकार माने जाते हैं, और उस अर्थ में युग निबंध का है। पर वे अपने समकालीनों के निबंध-साहित्य की बात कर रहे हैं, और वहाँ उनका निर्णय है — 'प्रायः वही स्थिति इस काल में भी बनी हुई है' जो द्विवेदी युग में थी। यानी उनकी अपनी देन बड़ी थी, पर उनके युग की सामूहिक देन उतनी नहीं। यह अंतर लिख देने से उत्तर बहुत मजबूत हो जाता है।

क्योंकि वह पुस्तक उससे पहले समाप्त हो जाती है। शुक्ल जी 'तृतीय उत्थान' में लिखते हैं 'इन बीस-इक्कीस वर्षों के बीच' और अपने उदाहरणों में 'आज', 28 अक्टूबर 1939 तक का हवाला देते हैं। उनका देहावसान 1941 में हुआ। इसलिए 1942, 1945, 1952 और 1959 में छपी पुस्तकों का उल्लेख उसमें हो ही नहीं सकता। इस अध्याय में उन पुस्तकों के प्रथम संस्करण — मुखपृष्ठ, प्रकाशक और लेखक की अपनी भूमिका — देखे गए हैं।

दिनकर ने भूमिका में स्वयं समझाया है — संग्रह में कुछ निबंध ऐसे हैं जो 'कविता की चौहद्दी के पास' पड़ते हैं और कुछ ऐसे जिनमें 'बौद्धिक चिन्तन या विश्लेषण प्रधान' है, इसलिए नाम अर्धनारीश्वर रखा। यही दोनों युगों का अंतर एक शब्द में है। शुक्ल जी ने काव्यात्मक और विचारात्मक गद्य के मेल को खतरा कहा था; दिनकर उसी मेल को अपने संग्रह का नाम बना रहे हैं।

पूछे नहीं जाते, पर पूरी तरह छोड़ भी नहीं सकते। पाठ्यक्रम की पंक्ति का कोष्ठक साफ है — केवल शुक्ल युग और शुक्लोत्तर युग। इसलिए भारतेंदु का पहला मौलिक नाटक या लल्लूलाल-सदल मिश्र जैसे विषयों पर समय न लगाइए। बस इतना जानिए कि शुक्ल युग जिस चीज़ को आगे बढ़ाता है वह द्विवेदी युग से आती है — विशेषकर कहानी, जिसका आरंभ शुक्ल जी द्वितीय उत्थान के अंत में रखते हैं।

वह स्वयं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की है, और यही इसे रोचक बनाता है। वे अपनी पुस्तक में 'सरस्वती' की आरंभिक मौलिक कहानियों की सूची देते हैं, उसमें अपनी कहानी भी रखते हैं, और मार्मिकता के क्रम में उसे दूसरे स्थान पर रखते हैं — बिना यह बताए कि वह उन्हीं की है। बहुविकल्पीय प्रश्न में लेखक का नाम पूछा जाता है, और अधिकांश विद्यार्थी इसे किसी और का मान लेते हैं।

नहीं। जीवन परिचय खण्ड-ब का प्रश्न 6 (क) है, 3+2=5 का, और उसमें जीवन परिचय के साथ प्रमुख रचना का नाम भी माँगा जाता है। आधिकारिक मॉडल प्रश्नपत्र उसके लिए लगभग 80 शब्द रखता है। यूनिट 1 (i) में केवल बहुविकल्पीय प्रश्न हैं। पर तैयारी एक साथ हो सकती है — सातों गद्य लेखकों को उनके युग के सामने लिख लीजिए, दोनों जगह काम आएगा।

कवि के रूप में हाँ, गद्यकार के रूप में नहीं। शुक्ल जी उन्हें 'स्वच्छंद धारा' में रखते हैं, छायावाद से अलग, और उनकी पहली रचना 'प्रणभंग' तथा दो संग्रह 'रेणुका' और 'हुंकार' गिनाते हैं। आपके पाठ्यक्रम में दिनकर गद्यकार के रूप में हैं, और वह गद्य शुक्ल जी के बाद का है — 'अर्धनारीश्वर' का प्रथम संस्करण 1952 का है। इसलिए इस यूनिट में उन्हें शुक्लोत्तर युग में रखिए।

तीन रूपों में, और तीनों उसके मॉडल प्रश्नपत्र में हैं। पहला — सीधा लेखक पूछना ('अजातशत्रु' नाटक के नाटककार हैं)। दूसरा — मिलान, जिसमें चार कृतियाँ और चार लेखक दिए जाते हैं (मैला आँचल–रेणु, चित्रलेखा–भगवती चरण वर्मा, उसने कहा था–गुलेरी, कफन–प्रेमचन्द)। तीसरा — विधा पहचानना ('निम्नलिखित में से उपन्यास है'), जहाँ सूची में एक कहानी छिपाकर रखी जाती है। इसलिए कृति के साथ लेखक और विधा — तीनों एक साथ याद कीजिए, केवल लेखक नहीं।
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