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  • 1यह बताना कि 'हल्दीघाटी' पद्य खण्ड के तेरह पाठों में से एक है और इसके अंक जीवन-परिचय तथा पद्यांश दोनों में बँटे हैं
  • 2श्याम नारायण पाण्डेय का जीवन-परिचय और प्रमुख रचनाएँ ('हल्दीघाटी', 'जौहर', 'तुमुल') बताना
  • 318 जून 1576 के हल्दीघाटी युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि संक्षेप में बताना
  • 4चित्तौड़ की पुकार और वीर सिपाहियों के उत्साह वाले अंशों का आशय स्पष्ट करना
  • 5अकबर के दरबार और प्रताप की आज़ादी के बीच के विरोधाभास को समझाना
  • 6मानसिंह की बंदी और प्रताप द्वारा की गई क्षमा का प्रसंग और उसका नैतिक निहितार्थ बताना
  • 7चेतक की वीरगति वाले अंश में वीर रस से करुण रस में हुए बदलाव को पहचानना
  • 8दिए गए किसी पद्यांश में प्रयुक्त रस और अलंकार पहचानना
  • 9मानवीकरण और अनुप्रास अलंकार के उदाहरण काव्य से चुनना
  • 10काव्य के छंद-विन्यास (तुकांत चतुष्पदी) की सामान्य पहचान करना
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Why this chapter matters
यह खण्डकाव्य वीर रस से करुण रस की ओर स्पष्ट मोड़ लेता है, इसलिए यह रस-पहचान और अलंकार-पहचान दोनों तरह के काव्य-सौन्दर्य प्रश्नों के लिए एक ही पाठ में तैयार सामग्री देता है। यह अध्याय श्याम नारायण पाण्डेय के मूल काव्य 'हल्दीघाटी' (1949 संस्करण, इंडियन प्रेस, प्रयाग) से सीधे लिया गया है, किसी गाइड से नहीं।

हल्दीघाटी — श्याम नारायण पाण्डेय

"हा ! चेतक, तू पलकें खोल, कुछ तो उठकर मुझसे बोल। मिला बन्धु जो खोकर काल, तो तेरा चेतक, यह हाल ! हा चेतक, हा चेतक, हाय" — कहकर चिपट गया तत्काल।

— श्याम नारायण पाण्डेय, हल्दीघाटी (1949)

1. इस अध्याय में क्या है

'हल्दीघाटी' यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी के पद्य खण्ड (यूनिट 2 ii) के तेरह निर्धारित पाठों में से एक है। इस यूनिट का कुल भार 11 अंक है, तेरहों पाठों में साझा — मॉडल प्रश्नपत्र के अनुसार 6 अंक पद्यांश पर (किसी भी पाठ से, खण्ड-ब प्रश्न 2, 3×2=6) और 5 अंक कवि के जीवन-परिचय पर (किसी भी एक कवि का, खण्ड-ब प्रश्न 6-ख, 3+2=5)।

यह ठीक वही ढाँचा है जो गद्य खण्ड में पहले से समझाया जा चुका है, केवल गद्यांश की जगह पद्यांश।

यह किस तरह की कृति है। 'हल्दीघाटी' कोई भावात्मक कविता नहीं, बल्कि एक वीर-रस-प्रधान प्रबन्ध काव्य (खण्डकाव्य) है — महाराणा प्रताप और मुग़ल सेनापति मानसिंह के बीच 18 जून 1576 को खमनोर-बलीचा दर्रे के निकट लड़े गए ऐतिहासिक युद्ध का काव्यात्मक वर्णन।

कवि ने स्वयं अपनी भूमिका में लिखा है कि यह रचना उन्होंने सात वर्षों की साधना से पूरी की — काव्य के भीतर ही वे सीधे प्रताप को संबोधित करते हैं: "आज सात वर्षों से तेरी पवित्र कहानी गा-गाकर सुना रहा था... यह तो तू ही बता सकता है कि मेरी 'हल्दीघाटी' और तेरी 'हल्दीघाटी' में क्या अन्तर है।"

2. कवि-परिचय — श्याम नारायण पाण्डेय

  • जन्म-मृत्यु। श्रावण कृष्ण पंचमी, संवत् 1964 (सन् 1907 ई0), ग्राम डुमराँव, ज़िला मऊ (उत्तर प्रदेश) में जन्म। 1991 में 84 वर्ष की आयु में निधन।
  • शिक्षा। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद संस्कृत-अध्ययन हेतु काशी आए; काशी विद्यापीठ से हिन्दी में 'साहित्याचार्य' की उपाधि प्राप्त की।
  • पहचान। वीर रस के सुविख्यात कवि — ओजस्वी वाणी के कारण कवि-सम्मेलनों के मंचों पर अत्यन्त लोकप्रिय हुए।
  • प्रमुख कृतियाँ। 'हल्दीघाटी' (सर्वाधिक लोकप्रिय, देव पुरस्कार से सम्मानित), 'जौहर' (चित्तौड़ की रानी पद्मिनी पर आधारित), 'तुमुल', 'रूपान्तर', 'आरती', 'जय-पराजय', 'गोरा-वध', 'जय हनुमान', 'शिवाजी'। ध्यान देने योग्य बात — 'तुमुल' यू0पी0 बोर्ड की ज़िलेवार खण्डकाव्य सूची में भी शामिल है (वाराणसी, इटावा, बिजनौर आदि ज़िलों के लिए), यानी पाण्डेय जी की दो रचनाएँ इस पाठ्यक्रम में अलग-अलग स्थानों पर आती हैं।
  • रस। वीर रस मुख्य, प्रसंगवश करुण रस (चेतक-वियोग) — दोनों की पहचान काव्य-सौन्दर्य के प्रश्नों के लिए ज़रूरी है।

3. कथा-भूमिका — घटना क्या थी

18 जून 1576 को मेवाड़ की छोटी-सी सेना, महाराणा प्रताप के नेतृत्व में, अकबर की विशाल मुग़ल सेना से भिड़ी — जिसका नेतृत्व आमेर-नरेश मानसिंह कर रहे थे। युद्ध खमनोर और बलीचा गाँवों के बीच के संकरे दर्रे से आरम्भ होकर बनास नदी के सहारे कई घंटे चला।

किसी पक्ष को निर्णायक विजय नहीं मिली, पर प्रताप बुरी तरह घायल हुए और उनका अश्व चेतक इसी युद्ध के बाद वीरगति को प्राप्त हुआ। कवि इसी घटना को दस सर्गों में विस्तार देते हैं; पाठ्यक्रम में इसके सर्वाधिक प्रचलित अंश ही पढ़ाए जाते हैं।

4. चित्तौड़ की पुकार

काव्य की प्रस्तावना में ही कवि चित्तौड़ को सजीव व्यक्ति की तरह सम्बोधित करते हैं —

"अरे ! मेरे चित्तौड़ देश, बिखरे प्रश्नों को कर दे हल; साहस भर दे क्षय-हृदय में, बाहु-बाहु में भर दे बल ॥ वीर-रक्त से तू पवित्र है, मेरे बल का साधन । बोल-बोल तू एक बार फिर कब देगा राणा-सा धन ॥"

यह आह्वान पूरे काव्य का स्वर तय करता है — चित्तौड़ केवल भूमि नहीं, वीरता की जननी है, और प्रताप उसी परम्परा की उपज।

5. वीर सिपाहियों का उत्साह

युद्ध से पहले मेवाड़ के युवा सैनिकों के उत्साह का चित्रण ओज गुण का श्रेष्ठ उदाहरण है —

"कहते थे साले आने दो, शिल्ले पर तीर चढ़ाने दो । आगे को पैर बढ़ाने दो, रण में घोड़ा दौड़ाने दो ॥ हम माता के गुण गायेंगे, बलि जन्म-भूमि पर जायेंगे । अपना झण्डा फहरायेंगे, हम हाहाकार मचायेंगे ॥ वैरी-सम्मुख अड़ जायेंगे, रण में न तनिक घबड़ायेंगे । लड़ जायेंगे लड़ जायेंगे, दुश्मन को ले लड़ जायेंगे ॥"

लगातार भविष्यत्-काल क्रियाओं ('जायेंगे', 'लड़ेंगे') की आवृत्ति सैनिकों के अदम्य संकल्प को गति देती है — यह छंद-रचना की एक सायास युक्ति है, अलंकार-प्रश्नों में इसे अनुप्रास और पुनरुक्ति दोनों की दृष्टि से देखा जा सकता है।

6. अकबर का दरबार और प्रताप की आज़ादी

द्वितीय सर्ग में कवि आगरा के दरबार का वैभव और मेवाड़ की विपन्न स्वाधीनता को आमने-सामने रखते हैं —

"रत्न-जटित मणि-सिंहासन था मणिमय रणधीरों से। उसका पद जगमगा रहा था राजमुकुट-हीरों से ॥ जग के वैभव खेल रहे थे मुग़ल-राज-थाती पर, पर हर रहा था अकबर का झंडा नभ की छाती पर ॥ यह प्रताप यह विभव मिला, पर एक मिला था बादी । रह-रह काँटों-सी चुभती थी राणा की आज़ादी ॥"

यहीं अकबर, मानसिंह को आदेश देते हैं कि प्रताप को अधीन करके 'विजय की माला' उन्हें भेंट करें — यहीं से युद्ध की कथा आरम्भ होती है। यह अंश विरोधाभास (कंट्रास्ट) का उदाहरण है — अकबर के पास वैभव है, प्रताप के पास केवल स्वाधीनता, पर काव्य स्पष्ट करता है कि दूसरा पहले से बड़ा है।

7. मानसिंह की बंदी और क्षमा

युद्ध के बीच एक निर्णायक क्षण आता है — मानसिंह घिर जाते हैं, भील सैनिक उन्हें बाँध लेते हैं, पर प्रताप स्वयं आकर उन्हें छुड़ा देते हैं —

"तूने कह बंधन खोलकर, कह्यो भीलो ! यह कायरता है, युद्ध नहीं धोखा है; विजय नहीं, लघुता है, गौरव नहीं । तुम्हारी वीरता की परीक्षा तो भावी महासमर में होगी, जब तुम्हारी युद्ध-कला देखकर भेड़ों-बकरियों की तरह भागते हुए, बैरी दिल्ली पहुँच जायेंगे ।"

यह प्रसंग कथा की नैतिक धुरी है — प्रताप बंदी शत्रु को बाँधकर जीतना अपमान मानते हैं; असली विजय युद्ध-भूमि में होनी चाहिए, छल से नहीं। मानसिंह को क्षमा-सहित विदा करने पर महाराणा की जय-जयकार से पहाड़ गूँज उठता है।

7क. युद्ध का पुनः प्रारम्भ

मानसिंह की सेना क्षमा से रुकती नहीं — बादल घिरे आकाश के नीचे तोपें पुनः गरज उठती हैं, कवि के ही शब्दों में "धाँय धाँय गोले बरसने लगे"। कवि वर्णन करते हैं कि तोपों के धुएँ से रणभूमि भयानक हो उठी, पर मेवाड़ के राजपूत सैनिक तनिक भी विचलित नहीं हुए — वे भेड़िये की तरह शत्रु-सेना पर टूट पड़े, मानो जीवन का सौदा उनके लिए सस्ता हो गया हो।

आगे कवि हाथियों, घोड़ों और सवारों के त्रिस्तरीय संघर्ष का विस्तृत चित्रण करते हैं — हाथी हाथियों से, घोड़े घोड़ों से, सवार सवारों से भिड़ते हैं, और युद्ध की तीव्रता इतनी बढ़ जाती है कि कवि इसे 'लोम-हर्षण संग्राम' (रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध) कहते हैं। यह अंश मूलतः गद्यात्मक शैली में है — खण्डकाव्य के भीतर पद्य और गद्य दोनों का सम्मिश्रण एक और उल्लेखनीय बिंदु है।

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हल्दीघाटी — कथा-प्रवाह चित्तौड़ की पुकार अकबर का आदेश मानसिंह को हल्दीघाटी का घमासान युद्ध मानसिंह बंदी — प्रताप द्वारा क्षमा युद्ध पुनः छिड़ा प्रताप घायल — चेतक रणक्षेत्र से बाहर ले जाता है चेतक की वीरगति — करुण रस का चरम
<figcaption>हल्दीघाटी की कथा का प्रवाह — पुकार से लेकर वीरगति तक</figcaption>

8. चेतक की वीरगति

युद्ध में चेतक की फुर्ती स्वयं शत्रु को चकित करती है —

"मेवाड़-केसरी गरज उठा, सुनकर अरि की ललकार प्रबल । हर एकलिंग को माथ नवा, लोहा लेने चल पड़ा वीर । चेतक का चंचल वेग देख था महा-महा लज्जित समीर ॥"

पर अन्त में घायल प्रताप को पीठ पर लादे चेतक स्वयं घायल हो जाता है और दम तोड़ देता है। यहीं काव्य वीर रस से करुण रस की ओर मुड़ता है —

"हा ! चेतक, तू पलकें खोल, कुछ तो उठकर मुझसे बोल । मिला बन्धु जो खोकर काल, तो तेरा चेतक, यह हाल ! हा चेतक, हा चेतक, हाय" — कहकर चिपट गया तत्काल ।"

प्रताप, चेतक को 'बन्धु' कहकर सम्बोधित करते हैं — यह मानवीकरण (चेतक को मनुष्य-सा सम्बोधन) पूरे प्रसंग की सबसे मार्मिक युक्ति है, और इसी कारण यह अंश पद्यांश-आधारित प्रश्नों में सर्वाधिक प्रयुक्त होता है।

पुस्तक की अपनी चित्र-सूची में 'चेतक चबूतरा' नाम से एक चित्र भी सूचीबद्ध है — यह संकेत करता है कि चेतक की स्मृति केवल काव्य तक सीमित नहीं, बल्कि मेवाड़ में एक भौतिक स्मारक के रूप में भी सुरक्षित है, जिससे यह प्रसंग कथा और इतिहास दोनों को जोड़ता है।

9. भाषा और शैली

'हल्दीघाटी' की भाषा तत्सम-प्रधान, संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है, जिसमें छोटे-छोटे, आघात-प्रधान चरण वीर रस की गति को तेज़ करते हैं — जैसे "फर-फर-फर-फर-फर फहर उठा / अकबर का अभिमानी निशान" में लगातार आवृत्त 'फर' ध्वनि झंडे के फड़फड़ाने की गति को सीधे कानों तक पहुँचाती है। यह ध्वन्यात्मकता (शब्द की ध्वनि से अर्थ का सीधा सम्बन्ध) कवि की शैली की पहचान है।

कवि संवाद-शैली का भी भरपूर प्रयोग करते हैं — चित्तौड़ को सम्बोधन, मानसिंह के प्रति प्रताप के कथन, चेतक से विलाप — सभी सीधे संबोधन (तू, तेरा) में हैं, जिससे काव्य नाटकीय बन जाता है, मानो पाठक स्वयं उस दृश्य के सामने खड़ा हो। यह प्रत्यक्ष सम्बोधन-शैली ही इस खण्डकाव्य को कवि-सम्मेलनों में सस्वर वाचन के लिए विशेष उपयुक्त बनाती है, जो पाण्डेय जी की लोकप्रियता का एक मुख्य कारण था।

10. रस, अलंकार और छंद — काव्य-सौन्दर्य

  • वीर रस — स्थायी भाव उत्साह; उदाहरण: वीर-सिपाहियों का उद्घोष ("लड़ जायेंगे लड़ जायेंगे"), मानसिंह-बंधन प्रसंग में प्रताप का तेज।
  • करुण रस — स्थायी भाव शोक; उदाहरण: चेतक-मृत्यु का पूरा प्रसंग।
  • मानवीकरण अलंकार — चेतक को 'बन्धु', 'तू' कहकर मनुष्यवत् सम्बोधन।
  • अनुप्रास अलंकार — "लड़ जायेंगे लड़ जायेंगे", "हा चेतक, हा चेतक" जैसी पुनरावृत्तियाँ।
  • विरोधाभास/व्यतिरेक — अकबर के वैभव और प्रताप की निर्धन स्वाधीनता का साथ-साथ चित्रण।
  • ओज गुण — पूरे काव्य की भाषा में लघु, आघात-प्रधान शब्दों (झंडा, गरज, ललकार, वेग) की सघनता, जो वीर रस को गति देती है।
  • छंद — काव्य मुख्यतः तुकांत चतुष्पदी (चार पंक्तियों के बंद, दूसरी-चौथी पंक्ति में तुक) में रचा गया है, गीति-शैली के निकट।

11. पद्यांश-आधारित अभ्यास

पद्यांश 1

"हा ! चेतक, तू पलकें खोल, कुछ तो उठकर मुझसे बोल । मिला बन्धु जो खोकर काल, तो तेरा चेतक, यह हाल !"

शब्दार्थ — पलकें खोल: आँखें खोल, जीवित हो जा; बन्धु: भाई-सम मित्र।

  1. यह पंक्तियाँ किस काव्य और किस कवि की हैं?
  2. प्रताप चेतक को 'बन्धु' क्यों कहते हैं?
  3. इस अंश में कौन-सा रस प्रधान है और क्यों?

पद्यांश 2

"रत्न-जटित मणि-सिंहासन था मणिमय रणधीरों से। उसका पद जगमगा रहा था राजमुकुट-हीरों से ॥ यह प्रताप यह विभव मिला, पर एक मिला था बादी । रह-रह काँटों-सी चुभती थी राणा की आज़ादी ॥"

शब्दार्थ — विभव: वैभव, ऐश्वर्य; बादी: बाधा, रोग जैसी पीड़ा।

  1. यह अंश किसके दरबार का वर्णन करता है?
  2. अकबर के वैभव और प्रताप की आज़ादी के बीच कवि क्या विरोधाभास दिखाता है?
  3. इस अंश में प्रयुक्त अलंकार पहचानिए।

पद्यांश 3

"हम माता के गुण गायेंगे, बलि जन्म-भूमि पर जायेंगे । अपना झण्डा फहरायेंगे, हम हाहाकार मचायेंगे ॥ वैरी-सम्मुख अड़ जायेंगे, रण में न तनिक घबड़ायेंगे ।"

शब्दार्थ — बलि: बलिदान, न्योछावर; वैरी: शत्रु।

  1. यह पंक्तियाँ किसके उत्साह का चित्रण करती हैं?
  2. भविष्यत्-काल क्रियाओं की आवृत्ति का यहाँ क्या प्रभाव है?
  3. इस अंश में कौन-सा गुण (ओज/माधुर्य/प्रसाद) प्रधान है?

12. सारांश

'हल्दीघाटी' श्याम नारायण पाण्डेय का वीर-रस-प्रधान खण्डकाव्य है, जो 18 जून 1576 के ऐतिहासिक युद्ध को दस सर्गों में विस्तार देता है। पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाने वाले प्रमुख अंश हैं — चित्तौड़ की पुकार, वीर सिपाहियों का उत्साह, अकबर के दरबार का वैभव बनाम प्रताप की आज़ादी, मानसिंह की बंदी और प्रताप द्वारा उदार क्षमा, युद्ध का पुनः प्रारम्भ, और अन्त में चेतक की वीरगति।

यह अन्तिम मोड़ काव्य को वीर रस से करुण रस की ओर ले जाता है — इसी उतार-चढ़ाव, तत्सम-प्रधान ध्वन्यात्मक भाषा और सीधे-सम्बोधन की नाटकीय शैली के कारण यह खण्डकाव्य रस, अलंकार और भाषा-शैली तीनों तरह के प्रश्नों के लिए समृद्ध सामग्री देता है।

परिशिष्ट — शब्दार्थ तालिका

शब्दअर्थ
पयान/प्रयाणप्रस्थान, यात्रा पर निकलना (यहाँ: मृत्यु की ओर प्रस्थान)
लघुताछोटापन, तुच्छता
मणिमयमणियों से जड़ा हुआ
नभआकाश
बादीबाधा, पीड़ा
समीरवायु, हवा
लज्जितशर्मिंदा
केसरीसिंह (यहाँ: महाराणा प्रताप के लिए)
एकलिंगमेवाड़ के राजवंश के कुल-देवता, एकलिंगनाथ (शिव)

Key formulas & results

Everything you need to memorise, in one card. Screenshot this for revision.

काव्य का स्रोत
'हल्दीघाटी' = श्याम नारायण पाण्डेय, 1949 संस्करण, इंडियन प्रेस, प्रयाग — दस सर्गों में विभाजित प्रबन्ध काव्य
काव्य की भूमिका में कवि स्वयं प्रताप को सम्बोधित करते हुए 'सात वर्षों की साधना' का उल्लेख करते हैं
ऐतिहासिक तिथि
हल्दीघाटी युद्ध — 18 जून 1576, खमनोर-बलीचा दर्रे के निकट, बनास नदी के सहारे
महाराणा प्रताप (मेवाड़) बनाम मानसिंह के नेतृत्व में मुग़ल सेना; निर्णायक विजय किसी पक्ष को नहीं मिली
कथा का क्रम
चित्तौड़ की पुकार → अकबर का आदेश → हल्दीघाटी का युद्ध → मानसिंह बंदी व क्षमा → युद्ध पुनः छिड़ा → चेतक की वीरगति
पद्यांश-आधारित प्रश्नों में इसी क्रम से प्रसंग पहचानना आसान होता है
रस-परिवर्तन
वीर रस (युद्ध-वर्णन) → करुण रस (चेतक-वियोग)
एक ही खण्डकाव्य में दो रसों के उदाहरण मिलना इसे काव्य-सौन्दर्य प्रश्नों के लिए विशेष उपयोगी बनाता है
मानसिंह-प्रसंग का सार
बंदी शत्रु को बाँधकर जीतना = कायरता (प्रताप के शब्दों में); असली विजय युद्ध-भूमि में
प्रताप मानसिंह को बंधन-मुक्त कर आदरपूर्वक विदा करते हैं
मानवीकरण का उदाहरण
चेतक को 'बन्धु', 'तू' कहकर सम्बोधन — पशु का मनुष्यवत् चित्रण
चेतक-मृत्यु के अंश में यह अलंकार बार-बार पूछा जाने वाला बिंदु है
कवि का दूसरा पाठ्यक्रम-सम्बन्ध
पाण्डेय जी की रचना 'तुमुल' यू0पी0 बोर्ड की ज़िलेवार खण्डकाव्य सूची में भी है (वाराणसी, इटावा, बिजनौर आदि ज़िलों के लिए)
एक ही कवि की दो रचनाएँ यूनिट 2 (ii) और यूनिट 2 (iii) दोनों में आ सकती हैं, ज़िले के अनुसार
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Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
यह मान लेना कि पद्य खण्ड के पूरे 11 अंक इसी एक पाठ से आते हैं
11 अंक तेरहों पाठों में साझा हैं — 6 अंक पद्यांश के (किसी भी पाठ से) और 5 अंक जीवन-परिचय के (किसी भी एक कवि का)। एक ही पाठ पूरी तरह तैयार करने से पूरे अंक नहीं मिलते।
WATCH OUT
'हल्दीघाटी' को केवल युद्ध-वर्णन की कविता समझना
यह वीर रस से करुण रस की ओर मुड़ने वाला खण्डकाव्य है — चेतक-मृत्यु का अंश करुण रस का उदाहरण है, केवल वीर रस का नहीं।
WATCH OUT
मानसिंह को बंदी बनाने वाले प्रसंग को प्रताप की क्रूरता समझना
इसके विपरीत — प्रताप बंदी शत्रु को बाँधकर जीतना कायरता मानते हैं और मानसिंह को आदरपूर्वक मुक्त कर देते हैं। यह प्रसंग प्रताप की उदारता और युद्ध-नैतिकता दिखाता है।
WATCH OUT
चेतक को केवल एक घोड़ा (साधारण पशु-पात्र) मानकर प्रसंग की गम्भीरता कम आँकना
काव्य में चेतक को मानवीकरण अलंकार द्वारा 'बन्धु' कहा गया है — यह उसे कथा का सह-नायक बना देता है, इसलिए यह अंश करुण रस के सबसे प्रामाणिक उदाहरणों में गिना जाता है।
WATCH OUT
अकबर-दरबार वाले अंश को केवल वैभव-वर्णन समझना, विरोधाभास न पहचानना
कवि जान-बूझकर अकबर के वैभव और प्रताप की निर्धन आज़ादी को साथ-साथ रखते हैं ताकि दिखा सकें कि स्वाधीनता वैभव से बड़ी है — यही विरोधाभास अलंकार-प्रश्नों में पूछा जाता है।

Practice problems

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Readiness check

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8 questions~6 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • 'हल्दीघाटी' — श्याम नारायण पाण्डेय, 1949 संस्करण, इंडियन प्रेस, प्रयाग
  • पद्य खण्ड (यूनिट 2 ii) कुल 11 अंक, तेरह पाठों में साझा — इसी एक पाठ से नहीं
  • 6 अंक पद्यांश के (कोई भी पाठ), 5 अंक जीवन-परिचय के (कोई भी एक कवि)
  • हल्दीघाटी युद्ध — 18 जून 1576, खमनोर-बलीचा दर्रे के निकट, बनास नदी के सहारे
  • महाराणा प्रताप (मेवाड़) बनाम मानसिंह (मुग़ल सेनापति) — निर्णायक विजय किसी को नहीं
  • चित्तौड़ की पुकार — कवि चित्तौड़ को सजीव व्यक्ति की तरह सम्बोधित करते हैं
  • वीर सिपाहियों का उत्साह — अनुप्रास व पुनरुक्ति से गति पाता ओज गुण का उदाहरण
  • अकबर का वैभव बनाम प्रताप की आज़ादी — विरोधाभास अलंकार
  • मानसिंह बंदी व क्षमा — प्रताप के अनुसार बंदी शत्रु को बाँधकर जीतना कायरता है
  • चेतक का चंचल वेग — युद्ध में उसकी फुर्ती हवा को भी लज्जित करती है
  • चेतक की वीरगति — 'हा चेतक, हा चेतक, हाय' — करुण रस का चरम बिंदु
  • चेतक को 'बन्धु' कहना — मानवीकरण अलंकार का उदाहरण
  • काव्य वीर रस से करुण रस की ओर मुड़ता है — दोनों रसों के उदाहरण एक ही पाठ में
  • छंद — तुकांत चतुष्पदी (चार पंक्तियों के बंद, गीति-शैली के निकट)
  • पाण्डेय जी की 'तुमुल' रचना ज़िलेवार खण्डकाव्य सूची में भी शामिल है

Uttar Pradesh (UPMSP) marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: यूनिट 2 (ii) पद्य खण्ड — कुल 11 अंक, तेरह पाठों में साझा। किसी एक पाठ के लिए निश्चित अंक-विभाजन नहीं है।

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
पद्यांश पर आधारित (खण्ड-ब, प्रश्न 2)23पद्यांश का प्रसंग, आशय, रस-अलंकार — किसी भी एक निर्धारित पाठ से लिया जा सकता है
जीवन परिचय एवं प्रमुख रचना (खण्ड-ब, प्रश्न 6-ख)3+21किसी भी एक कवि का जीवन-वृत्त और उनकी प्रमुख रचना का नाम
बहुविकल्पीय (खण्ड-अ, प्रश्न 6-11 क्षेत्र में)10-2कवि-कृति मिलान, रस-अलंकार पहचान
Prep strategy
  • पहले पाण्डेय जी का जीवन-परिचय कंठस्थ कीजिए — यह 5 अंकों के लिए सीधे काम आता है
  • कथा-क्रम (चित्तौड़ → अकबर का आदेश → युद्ध → मानसिंह क्षमा → चेतक की वीरगति) को एक पंक्ति के फ्लो-चार्ट की तरह याद रखिए
  • कम-से-कम तीन उद्धरण याद रखिए — एक वीर रस का, एक करुण रस का — इससे पद्यांश-आधारित प्रश्न का उत्तर प्रामाणिक बनता है
  • यह मत भूलिए कि यह तेरह पाठों में से एक ही है — शेष पाठों की भी कम-से-कम जीवन-परिचय तालिका बनाइए

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

पद्यांश-आधारित प्रश्नों के लिए एक तैयार, प्रामाणिक उदाहरण

पद्यांश-आधारित प्रश्नों के लिए एक तैयार, प्रामाणिक उदाहरण — प्रसंग, आशय और रस-अलंकार तीनों तरह के प्रश्नों के लिए उपयुक्त

रस-पहचान कौशल

रस-पहचान कौशल — एक ही पाठ में वीर और करुण दोनों रसों के उदाहरण

जीवन-परिचय प्रश्न के लिए तैयार सामग्री

जीवन-परिचय प्रश्न के लिए तैयार सामग्री — पाण्डेय जी, उनकी रचनाएँ और रस-परम्परा

काव्य-सौन्दर्य (यूनिट 2 iv) से जुड़ाव

काव्य-सौन्दर्य (यूनिट 2 iv) से जुड़ाव — यहीं से मानवीकरण, अनुप्रास, विरोधाभास के व्यावहारिक उदाहरण मिलते हैं

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
पद्यांश आधारित प्रश्न में सबसे पहले प्रसंग (पाठ और कवि का नाम) लिखिए, फिर आशय
2
जीवन-परिचय के 3+2=5 अंकों में 3 अंक जीवन-वृत्त के लिए और 2 अंक प्रमुख रचना के नाम के लिए हैं — दोनों अलग-अलग स्पष्ट लिखिए
3
रस पूछे जाने पर पहले स्थायी भाव बताइए, फिर उदाहरण — जैसे 'शोक स्थायी भाव है, इसलिए यह करुण रस है'
4
समय कम हो तो कम-से-कम कथा का क्रम (चित्तौड़ → अकबर का आदेश → युद्ध → मानसिंह क्षमा → चेतक की वीरगति) क्रम से लिखिए — यही काव्य की रीढ़ है

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
'हल्दीघाटी' और सुभद्रा कुमारी चौहान की 'झांसी की रानी की समाधि पर' दोनों ऐतिहासिक वीरांगना/वीर-प्रसंगों पर आधारित हैं। दोनों की रस-योजना और स्वर की तुलना कीजिए
STRETCH
प्रताप द्वारा मानसिंह को क्षमा करने और महाभारत या रामायण के किसी युद्ध-नैतिकता प्रसंग के बीच समानता खोजिए
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कवि ने चेतक को 'मानवीकरण' द्वारा सह-नायक बना दिया है। हिन्दी साहित्य के किसी अन्य पशु-पात्र (जैसे लोककथाओं में) से इसकी तुलना कीजिए
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'ओज गुण' की परिभाषा खोजकर बताइए कि हल्दीघाटी के किन-किन भाषिक तत्वों (शब्द-चयन, वाक्य-गठन) से यह गुण उत्पन्न होता है

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CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

यू0पी0 बोर्ड हाईस्कूल परीक्षा — हिन्दी (विषय कोड 901), खण्ड-ब पद्यांश एवं जीवन-परिचय प्रश्न
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-9 हिन्दी — समान पद्य-खण्ड ढाँचा
अन्य राज्य बोर्डों की हिन्दी परीक्षाएँ जहाँ वीर-रस-प्रधान खण्डकाव्य पाठ्यक्रम में हों

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

नहीं। पद्यांश के प्रश्न किसी भी एक पाठ से आ सकते हैं, और जीवन-परिचय भी किसी भी एक कवि का पूछा जा सकता है। यह अध्याय तेरह में से एक — 'हल्दीघाटी' — को मूल स्रोत से पूरी तरह कवर करता है ताकि कम-से-कम एक पाठ पूरी तरह तैयार हो; शेष पाठों की जीवन-परिचय तालिका अलग से बनानी चाहिए।

'हल्दीघाटी' पद्य खण्ड (यूनिट 2 ii) का निर्धारित पाठ है — महाराणा प्रताप-मानसिंह युद्ध पर आधारित। 'तुमुल' ज़िलेवार खण्ड काव्य (यूनिट 2 iii) की सूची में है, जो केवल कुछ निर्धारित ज़िलों (वाराणसी, इटावा, बिजनौर आदि) के विद्यार्थियों के लिए पढ़ाया जाता है।

युद्ध की मुख्य घटनाएँ (तिथि, पक्ष, स्थान) ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित हैं, पर काव्य के भीतर के संवाद और विस्तृत दृश्य-चित्रण कवि की साहित्यिक अभिव्यक्ति हैं, जैसा हर ऐतिहासिक खण्डकाव्य में होता है। परीक्षा के उत्तर में इसे काव्य के अंश के रूप में ही उद्धृत करना चाहिए, इतिहास की प्रामाणिक घटना के रूप में नहीं।

मूल पुस्तक से — श्याम नारायण पाण्डेय के 'हल्दीघाटी' के 1949 संस्करण (इंडियन प्रेस, प्रयाग; archive.org पर उपलब्ध डिजिटल संस्करण) से सीधे।
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Last reviewed on 17 September 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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