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  • 1बताना कि पाठ्यक्रम केवल दो रस, तीन अर्थालंकार और दो छन्द माँगता है
  • 2रस की परिभाषा स्थायी भाव, विभाव और अनुभाव के साथ देना
  • 3रस के चार अंग गिनाना और विभाव के दो प्रकार बताना
  • 4हास्य और करुण रस के स्थायी भाव, आलंबन, अनुभाव और संचारी भाव बताना
  • 5करुण रस और वियोग शृंगार में आशा के आधार पर अंतर करना
  • 6शब्दालंकार और अर्थालंकार का अंतर बताना और यह जानना कि पाठ्यक्रम में केवल अर्थालंकार हैं
  • 7उपमा के चारों अंग पहचानना और पूर्णोपमा तथा लुप्तोपमा में अंतर करना
  • 8रूपक को 'भेदरहित आरोप' के रूप में और उत्प्रेक्षा को 'भेद-ज्ञानपूर्वक प्रतीति' के रूप में परिभाषित करना
  • 9वाचक शब्द देखकर तीनों अलंकारों को सही क्रम में अलग करना
  • 10लघु और गुरु मात्रा तथा विषम और सम चरण पहचानना
  • 11सोरठा का लक्षण 11-13 और रोला का 24 मात्रा प्रति चरण बताना
  • 12यह समझाना कि सोरठा दोहे का उल्टा है और रोला तथा सोरठा के विषम पद एक से होते हैं
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Why this chapter matters
तीन अंक, और पाठ्यक्रम इन्हें असाधारण रूप से सँकरा रखता है — नौ रसों में से दो, सब अलंकारों में से तीन, सैकड़ों छन्दों में से दो। यानी यह पूरे प्रश्नपत्र का सबसे निश्चित हिस्सा है, बशर्ते आप वही पढ़ें जो माँगा गया है। यहाँ लक्षण भाषाभूषण और छन्दःप्रभाकर से लिए गए हैं, गाइड से नहीं।

काव्य सौन्दर्य के तत्व — रस, अलंकार और छन्द

"दोहा उलटे सोरठा।" — जगन्नाथ प्रसाद 'भानु', छन्दःप्रभाकर — सोरठा का पूरा लक्षण चार शब्दों में

1. तीन अंक, और वे कितने सँकरे हैं

पाठ्यक्रम की यह पंक्ति पूरी पढ़िए, क्योंकि इसमें जो नहीं लिखा वह उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना जो लिखा है।

पाठ्यक्रमअंक
(क) रस — हास्य एवं करुण रस (परिभाषा, उदाहरण एवं पहचान)1×1=1
(ख) अलंकार — (अर्थालंकार) उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा (लक्षण एवं उदाहरण)1×1=1
(ग) छन्द — सोरठा एवं रोला (लक्षण एवं उदाहरण)1×1=1

तीन प्रश्न, तीन अंक, और तीनों बहुविकल्पीय — यह यूनिट 2 (iv) है और खण्ड-अ का प्रश्न 3।

अब वह देखिए जो पाठ्यक्रम नहीं माँगता —

  • नौ रसों में से केवल दो। शृंगार, वीर, रौद्र, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शांत — कोई नहीं।
  • अलंकारों में केवल अर्थालंकार, और उनमें भी तीन। शब्दालंकार — अनुप्रास, यमक, श्लेष — पाठ्यक्रम में नाम लेकर नहीं हैं।
  • छन्दों में केवल दो। दोहा, चौपाई, कवित्त, सवैया, कुण्डलिया, छप्पय — कोई नहीं।

यह अध्याय जान-बूझकर छोटा है। तीन अंक के लिए तीन परिभाषाएँ, तीन-तीन उदाहरण और तीन पहचान-नियम चाहिए। उससे आगे पढ़ा हुआ इस प्रश्नपत्र में लौटकर नहीं आता।

स्रोत। रस और अलंकार के लक्षण भाषाभूषण (महाराजा जसवंत सिंह, व्रजरत्नदास की टीका सहित) से हैं, और छन्द के लक्षण छन्दःप्रभाकर (जगन्नाथ प्रसाद 'भानु') से। ये वही ग्रंथ हैं जिनसे हिन्दी में ये लक्षण चले — इसलिए जहाँ गाइडों में शब्द बदले हुए दिखें, प्रमाण यही है।

2. रस — भाव से रस तक

रस काव्य पढ़ने या नाटक देखने पर मन में उत्पन्न होने वाला आनन्द है। भाषाभूषण की टीका इसे एक वाक्य में जोड़ देती है —

"किसी काव्य या नाटक में जो भाव स्थायी रूप से वर्तमान रहता है और अन्य भाव केवल जिसके सहायक मात्र होकर उसकी पुष्टि करते हैं वे स्थायी भाव कहलाते हैं। ये भाव, विभाव, अनुभाव आदि से अभिव्यक्त होकर पाठक या दर्शक के मस्तिष्क में जो आनन्द अर्थात् रसत्व उत्पन्न करते हैं उसी को रस कहा जाता है।"

इससे रस के चार अंग निकलते हैं, और इनके नाम पूछे जाते हैं।

अंगक्या है
स्थायी भाववह भाव जो पूरे काव्य में बना रहता है — रस का बीज
विभावजिससे रस जागता है। दो प्रकार — आलंबन (जिसके सहारे भाव जगे) और उद्दीपन (जो उसे भड़काए, जैसे चंद्र, शरद)
अनुभावभाव जागने पर शरीर पर दिखने वाली चेष्टाएँ
संचारी भावआते-जाते रहने वाले सहायक भाव

नौ स्थायी भाव, नौ रस। भाषाभूषण की तालिका शब्दशः यह है —

स्थायी भावरतिहासशोकक्रोधउत्साहभयजुगुप्साविस्मय
रसशृंगारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकबीभत्सअद्भुत

नवाँ रस शांत है। यहाँ एक ईमानदार बात कह देनी चाहिए — टीका स्वयं लिखती है कि "नवम रस शांत का स्थायी भाव भाषाभूषण में नहीं दिया गया है", और उसका स्थायी भाव शम या निर्वेद साहित्यदर्पण में माना गया है। यही कारण है कि कुछ पुस्तकें आठ रस गिनाती हैं और कुछ नौ।

आपके लिए इस पूरी तालिका में से दो खाने काम के हैं — हास्य और करुण।

2.1 हास्य रस

स्थायी भाव — हास। किसी की विचित्र वेशभूषा, विकृत आकृति, अटपटी चेष्टा या असंगत बात देख-सुनकर मन में जो हँसी जागती है, वही परिपक्व होकर हास्य रस बनती है।

अंगहास्य रस में
स्थायी भावहास
आलंबनविचित्र वेशभूषा या चेष्टा वाला व्यक्ति
उद्दीपनउसकी अटपटी बातें, हाव-भाव, दूसरों की प्रतिक्रिया
अनुभावमुस्कान, ठहाका, आँखों का सिकुड़ना, पेट पकड़ना
संचारी भावहर्ष, चपलता, उत्सुकता

पहचान का सूत्र — पढ़ते ही होंठों पर हँसी आ जाए और उपहास किसी की कुरूपता या विचित्रता का हो, तो हास्य रस है।

2.2 करुण रस

स्थायी भाव — शोक। किसी प्रिय की मृत्यु, स्थायी वियोग या असह्य विपत्ति से उत्पन्न दुःख जब पूर्णता तक पहुँचता है, तब करुण रस बनता है।

अंगकरुण रस में
स्थायी भावशोक
आलंबनमृत या सदा के लिए बिछुड़ा हुआ प्रिय जन
उद्दीपनउसकी वस्तुएँ, उसके गुणों का स्मरण, शव, शोक-स्थल
अनुभावरोना, विलाप, छाती पीटना, मूर्च्छा, निःश्वास
संचारी भावनिर्वेद, स्मृति, मोह, ग्लानि, चिंता

करुण और वियोग शृंगार का अंतर — यही सबसे बड़ा जाल है। दोनों में विरह है, पर

  • वियोग शृंगार में मिलन की आशा बची है। स्थायी भाव रति है।
  • करुण में मिलन की आशा समाप्त हो चुकी है — मृत्यु या स्थायी वियोग। स्थायी भाव शोक है।

एक ही सवाल पूछिए — क्या ये फिर मिल सकते हैं? उत्तर 'हाँ' हो तो वियोग शृंगार, 'नहीं' हो तो करुण।

और अपने पाठ्यक्रम से जोड़ लीजिए। पद्य खण्ड में सुभद्रा कुमारी चौहान की 'झाँसी की रानी की समाधि पर' निर्धारित है — समाधि पर खड़े होकर लिखी गई कविता का प्रधान रस करुण ही होगा। यह जोड़ पहचान को आसान बनाता है।

3. अलंकार — केवल तीन अर्थालंकार

अलंकार काव्य का आभूषण है — वह जो कथन को सुंदर बना दे। अलंकार दो प्रकार के होते हैं, और पाठ्यक्रम कोष्ठक में लिखकर एक ही चुनता है।

  • शब्दालंकार — सौंदर्य शब्द में हो। शब्द बदल दें तो चमत्कार चला जाए। अनुप्रास, यमक, श्लेष। पाठ्यक्रम में नहीं।
  • अर्थालंकार — सौंदर्य अर्थ में हो। पर्यायवाची रख दें तो भी बना रहे। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा। यही पाठ्यक्रम में हैं।
तीन अर्थालंकार — एक ही सीढ़ी के तीन डंडे उपमा तुलना — 'के समान' मुख चंद्र के समान सुंदर है दोनों अलग-अलग रहते हैं वाचक: सम, सी, जैसा, सदृश रूपक आरोप — अभेद मुख-रूपी चंद्र चरण-कमल दोनों एक हो जाते हैं कोई वाचक शब्द नहीं उत्प्रेक्षा संभावना — 'मानो' नेत्र बड़े और सरस हैं मानो वे कमल हैं भेद जानते हुए भी कल्पना वाचक: मानो, जानो, मनु, जनु पहचानने का क्रम — पहले वाचक शब्द ढूँढ़िए सम/सी/जैसा → उपमा · मानो/जनु → उत्प्रेक्षा · कोई नहीं → रूपक

3.1 उपमा

जहाँ उपमेय की उपमान से समानता दिखाई जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है।

उपमा के चार अंग होते हैं, और भाषाभूषण इन्हीं चारों में से एक-एक के लुप्त होने से लुप्तोपमा के भेद गिनाता है — धर्म-लुप्ता, वाचक-लुप्ता, उपमान-लुप्ता, उपमेय-लुप्ता।

अंगक्या हैउदाहरण में
उपमेयजिसकी तुलना की जाएमुख
उपमानजिससे तुलना की जाएचंद्र
साधारण धर्मदोनों में जो गुण समान हैसुंदरता
वाचक शब्दतुलना बताने वाला शब्दसम, सी, जैसा, सदृश

'मुख चंद्र के समान सुंदर है' — चारों अंग यहाँ मौजूद हैं। यह पूर्णोपमा है। कोई एक अंग गायब हो तो लुप्तोपमा

3.2 रूपक

भाषाभूषण का लक्षण शब्दशः —

"जहाँ उपमेय में भेदरहित उपमान का आरोप हो और निषेध-वाचक शब्द न आया हो, वहाँ रूपक होता है।"

इस परिभाषा के दो शब्द पूरा अलंकार तय करते हैं। आरोप का अर्थ है उपमान को उपमेय पर रख देना, और भेदरहित का अर्थ है दोनों में कोई अंतर न रहने देना। उपमा में मुख चंद्र जैसा था; रूपक में मुख चंद्र ही है।

उदाहरण — मुख-रूपी चंद्र, चरण-कमल, भव-सागर, कनकलता-रूपी सुंदरी

पहचान — 'रूपी' शब्द हो, या दो शब्द बिना किसी वाचक के जुड़कर एक हो गए हों (चरण-कमल), तो रूपक है।

3.3 उत्प्रेक्षा

भाषाभूषण का लक्षण —

"भेद-ज्ञानपूर्वक उपमेय में उपमान की प्रतीति होने को उत्प्रेक्षा कहते हैं। मानो, जानो, मनु, जनु आदि उत्प्रेक्षावाचक शब्द हैं।"

'भेद-ज्ञानपूर्वक' सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है। कवि जानता है कि दोनों अलग हैं, फिर भी संभावना करता है — मानो ऐसा हो। रूपक में भेद मिट जाता है; उत्प्रेक्षा में भेद बना रहता है और केवल कल्पना की जाती है।

भाषाभूषण का अपना उदाहरण — "नेत्र विशेष रूप से बड़े और सरस हैं, मानों वे कमल हैं।"

3.4 तीनों को अलग करने का क्रम

पहले यह देखिएफिर उत्तर
क्या मानो, जानो, मनु, जनु है?उत्प्रेक्षा
क्या सम, सी, जैसा, सदृश, समान है?उपमा
कोई वाचक नहीं, दोनों एक हो गए?रूपक

यह क्रम बदलिए मत। पहले उत्प्रेक्षा जाँचिए, क्योंकि 'मानो' वाले वाक्यों में तुलना भी होती है और उन्हें उपमा समझ लेने की भूल सबसे आम है।

4. छन्द — सोरठा और रोला

छन्द अक्षरों या मात्राओं की नियत व्यवस्था है। दो शब्द पहले जान लीजिए, क्योंकि दोनों लक्षण इन्हीं पर टिके हैं।

  • लघु (।) — एक मात्रा। ह्रस्व स्वर वाला अक्षर।
  • गुरु (ऽ) — दो मात्राएँ। दीर्घ स्वर, अनुस्वार या संयुक्त व्यंजन से पहले वाला अक्षर।

छन्द के चार भाग होते हैं, जिन्हें चरण या पद कहते हैं। पहला और तीसरा विषम, दूसरा और चौथा सम

तीनों एक ही परिवार के हैं दोहा (तुलना के लिए) विषम — 13 सम — 11 कुल 48 उलट दीजिए सोरठा विषम — 11 सम — 13 कुल 48 रोला चारों चरण एक से 11 + 13 = 24 प्रति चरण 'रोला के और सोरठा के विषम पद एक से होते हैं' — छन्दःप्रभाकर

4.1 सोरठा

छन्दःप्रभाकर का लक्षण चार शब्दों का है —

ल० — "सम तेरा विषमेश, दोहा उलटे सोरठा।"

यह लक्षण संख्याएँ शब्दों में छिपाकर रखता है, और यही इसे याद रखने लायक बनाता है।

  • 'तेरा' = 13 → सम चरणों (दूसरा और चौथा) में 13 मात्राएँ
  • 'ईश' = महादेव = 11 रुद्र → विषम चरणों (पहला और तीसरा) में 11 मात्राएँ

टीका इसे खोलकर लिख देती है: "सम अर्थात् दूसरे और चौथे चरणों में 13 और विषम अर्थात् पहले और तीसरे चरणों में ईश-महादेव अर्थात् 11 मात्राएँ होती हैं। दोहे का उल्टा सोरठा है।"

तुलसीदास का उदाहरण, जो छन्दःप्रभाकर स्वयं देता है —

जेहि सुमिरत सिधि होय, गन नायक करिबर बदन। करउ अनुग्रह सोइ, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥

यह रामचरितमानस के आरंभ का सोरठा है, और टीका बताती है कि "इसी का उल्टा दोहा होता है।" एक और नियम — "इसके सम चरणों में जगण का निषेध है।"

ऊपर के उदाहरण में एक बात देखिए। 'होय' और 'सोइ' आपस में तुक बना रहे हैं, और ये विषम चरणों के अंत हैं। दोहे में विषम चरण 13 मात्रा के लंबे होते हैं और तुक सम चरणों पर पड़ती है; सोरठे में विषम चरण छोटे (11) होते हैं और तुक उन पर आ जाती है। यह पहचान लक्षण-ग्रंथ का नियम नहीं, इसी उदाहरण से निकला निरीक्षण है — पर परीक्षा में तेज़ी से काम आता है।

4.2 रोला

छन्दःप्रभाकर छप्पय के लक्षण में रोला की गिनती दे देता है —

ल० — "रोला के पद चार, मत्त चोबीस धारिये।"

अर्थात् रोला के चार पद होते हैं और प्रत्येक में 24 मात्राएँ। टीका दोहराती है: "इस छन्द के आदि में रोला के चार पद चौबीस-चौबीस मात्राओं के रखो।"

24 मात्राएँ भीतर से 11 + 13 हैं, और यहीं वह वाक्य आता है जो दोनों छन्दों को जोड़ देता है —

"रोला के और सोरठा के विषम पद एक से होते हैं।"

सोरठारोला
चरण44
विषम चरण11 मात्रा
सम चरण13 मात्रा
प्रति चरण(11 या 13)24 मात्रा
यति11 और 13 पर
कुल मात्राएँ4896
प्रकारअर्धसम मात्रिकसम मात्रिक

रोला और सोरठा में एक और अंतर, जो टीका बताती है: सोरठा के सम पद के आदि में त्रिकल के बाद दो गुरु नहीं आते, पर रोला के सम पद में आ सकते हैं। यह सूक्ष्म नियम कक्षा-10 में नहीं पूछा जाता, पर बताता है कि दोनों बिल्कुल एक नहीं हैं।

एक जोड़ याद रखिए। कुण्डलिया = दोहा + रोला — छन्दःप्रभाकर का लक्षण है "दोहा रोला जोरिकै, छे पद चौबिस मत्त।" और छप्पय = रोला के चार पद + उल्लाला के दो पद। रोला अकेला छन्द नहीं, दो बड़े छन्दों का घटक है।

सारांश

  • काव्य सौन्दर्य के तत्व 3 अंक के हैं — यूनिट 2 (iv), खण्ड-अ प्रश्न 3, तीनों बहुविकल्पीय।
  • पाठ्यक्रम केवल दो रस, तीन अर्थालंकार और दो छन्द माँगता है — बाकी सब बाहर है।
  • रस वह आनन्द है जो स्थायी भाव के विभाव-अनुभाव से अभिव्यक्त होने पर उत्पन्न होता है।
  • रस के चार अंग — स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव।
  • विभाव दो प्रकार का है — आलंबन और उद्दीपन।
  • नौ स्थायी भाव और नौ रस हैं; भाषाभूषण में शांत रस का स्थायी भाव नहीं दिया गया।
  • हास्य रस का स्थायी भाव हास है; करुण रस का स्थायी भाव शोक
  • करुण और वियोग शृंगार का अंतर आशा का है — मिलन संभव हो तो शृंगार, न हो तो करुण।
  • अलंकार दो प्रकार के — शब्दालंकार और अर्थालंकार; पाठ्यक्रम में केवल अर्थालंकार हैं।
  • उपमा के चार अंग — उपमेय, उपमान, साधारण धर्म, वाचक शब्द।
  • चारों अंग हों तो पूर्णोपमा, कोई एक न हो तो लुप्तोपमा।
  • रूपक — 'उपमेय में भेदरहित उपमान का आरोप', जैसे मुख-रूपी चंद्र, चरण-कमल।
  • उत्प्रेक्षा — 'भेद-ज्ञानपूर्वक उपमेय में उपमान की प्रतीति'; वाचक मानो, जानो, मनु, जनु।
  • पहचान का क्रम — पहले मानो/जनु देखिए (उत्प्रेक्षा), फिर सम/सी/जैसा (उपमा), दोनों न हों तो रूपक।
  • लघु एक मात्रा का, गुरु दो मात्रा का; पहला-तीसरा चरण विषम, दूसरा-चौथा सम।
  • सोरठा — विषम चरण 11, सम चरण 13 मात्रा; कुल 48। 'दोहा उलटे सोरठा'।
  • सोरठे का लक्षण 'सम तेरा विषमेश' है — तेरा यानी 13, ईश यानी 11।
  • सोरठे में तुक विषम चरणों के अंत में मिलती है, दोहे में सम चरणों के अंत में।
  • रोला — चार पद, प्रत्येक 24 मात्रा, यति 11 और 13 पर; कुल 96।
  • 'रोला के और सोरठा के विषम पद एक से होते हैं' — छन्दःप्रभाकर।
  • कुण्डलिया = दोहा + रोला; छप्पय = रोला के चार पद + उल्लाला के दो पद।

परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है

यह वह सूची है जिस पर सबसे अधिक समय बरबाद होता है। तीन अंक के लिए तीन चीज़ें चाहिए, तीस नहीं।

विषयस्थिति
शृंगार, वीर, रौद्र, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शांत, वात्सल्य रसपाठ्यक्रम में नहीं — केवल हास्य और करुण
अनुप्रास, यमक, श्लेषशब्दालंकार — पाठ्यक्रम कोष्ठक में 'अर्थालंकार' लिखता है
अतिशयोक्ति, यमक, विरोधाभास, मानवीकरणअर्थालंकार तो हैं, पर नाम लेकर पाठ्यक्रम में नहीं
दोहा, चौपाई, कवित्त, सवैया, कुण्डलिया, छप्पयपाठ्यक्रम में नहीं — केवल सोरठा और रोला
गण (यगण, मगण, तगण आदि) और गण-सूत्रकक्षा-10 में नहीं; लक्षण में उल्लेख भर आता है
वर्णिक वृत्त और उनके भेदकक्षा-10 में नहीं; यहाँ केवल मात्रिक छन्द चाहिए
रस-निष्पत्ति के सिद्धांत, साधारणीकरणउच्च कक्षाओं का विषय

दोहे पर एक अपवाद। दोहा पाठ्यक्रम में नहीं है, पर सोरठे का पूरा लक्षण ही 'दोहा उलटे सोरठा' है — इसलिए दोहे की 13-11 व्यवस्था जानना आवश्यक है। इतना ही जानिए; उसके 23 भेद नहीं।

Key formulas & results

Everything you need to memorise, in one card. Screenshot this for revision.

रस की परिभाषा
स्थायी भाव + विभाव + अनुभाव + संचारी भाव → रस
भाषाभूषण की टीका: स्थायी भाव अभिव्यक्त होकर जो आनन्द उत्पन्न करता है वही रस
रस के चार अंग
स्थायी भाव · विभाव · अनुभाव · संचारी भाव
विभाव के दो प्रकार — आलंबन और उद्दीपन
हास्य रस
स्थायी भाव = हास
विचित्र वेशभूषा, आकृति या चेष्टा से उत्पन्न
करुण रस
स्थायी भाव = शोक
प्रिय की मृत्यु या स्थायी वियोग से उत्पन्न
करुण बनाम वियोग शृंगार
मिलन की आशा बची = शृंगार · आशा समाप्त = करुण
एक ही सवाल — क्या ये फिर मिल सकते हैं?
अलंकार के दो प्रकार
शब्दालंकार (शब्द में सौंदर्य) · अर्थालंकार (अर्थ में सौंदर्य)
पाठ्यक्रम कोष्ठक में 'अर्थालंकार' लिखता है — शब्दालंकार बाहर हैं
उपमा के चार अंग
उपमेय · उपमान · साधारण धर्म · वाचक शब्द
चारों हों तो पूर्णोपमा, कोई एक न हो तो लुप्तोपमा
उपमा के वाचक शब्द
सम · सी · जैसा · सदृश · समान · तुल्य
मुख चंद्र के समान सुंदर है
रूपक का लक्षण
उपमेय में भेदरहित उपमान का आरोप
भाषाभूषण, शब्दशः। मुख-रूपी चंद्र, चरण-कमल, भव-सागर
उत्प्रेक्षा का लक्षण
भेद-ज्ञानपूर्वक उपमेय में उपमान की प्रतीति
भाषाभूषण। वाचक — मानो, जानो, मनु, जनु
अलंकार पहचानने का क्रम
मानो/जनु → उत्प्रेक्षा · सम/सी/जैसा → उपमा · कोई नहीं → रूपक
क्रम बदलिए मत — 'मानो' वाले वाक्य उपमा जैसे दिखते हैं
लघु और गुरु
लघु (।) = 1 मात्रा · गुरु (ऽ) = 2 मात्रा
दीर्घ स्वर, अनुस्वार या संयुक्त व्यंजन से पहले का अक्षर गुरु
विषम और सम चरण
पहला और तीसरा = विषम · दूसरा और चौथा = सम
दोनों छन्दों के लक्षण इन्हीं शब्दों में कहे गए हैं
सोरठा
विषम चरण 11 मात्रा · सम चरण 13 मात्रा · कुल 48
छन्दःप्रभाकर: 'सम तेरा विषमेश, दोहा उलटे सोरठा' — तेरा = 13, ईश = 11
दोहा (तुलना के लिए)
विषम चरण 13 · सम चरण 11 · कुल 48
सोरठा इसी का उल्टा है — इसीलिए दोहा जानना पड़ता है
रोला
चार पद · प्रत्येक 24 मात्रा · यति 11 और 13 पर · कुल 96
छन्दःप्रभाकर: 'रोला के पद चार, मत्त चोबीस धारिये'
रोला और सोरठा का संबंध
दोनों के विषम पद एक से होते हैं
छन्दःप्रभाकर का अपना वाक्य — इसी से रोला का 11+13 निकलता है
रोला किन छन्दों में आता है
कुण्डलिया = दोहा + रोला · छप्पय = रोला के 4 पद + उल्लाला के 2 पद
रोला अकेला छन्द नहीं, दो बड़े छन्दों का घटक भी है
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Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
'मानो' वाले वाक्य को उपमा बता देना
'मानो, जानो, मनु, जनु' उत्प्रेक्षा के वाचक शब्द हैं, उपमा के नहीं। भाषाभूषण साफ़ लिखता है कि ये 'उत्प्रेक्षावाचक शब्द' हैं। उपमा के वाचक सम, सी, जैसा, सदृश हैं। इसीलिए पहचान का क्रम यह होना चाहिए — पहले 'मानो' जाँचिए, फिर 'जैसा'।
WATCH OUT
रूपक और उत्प्रेक्षा को एक जैसा मान लेना
पूरा अंतर एक शब्द का है — भेद। रूपक में 'भेदरहित आरोप' होता है, यानी उपमेय और उपमान एक ही हो जाते हैं (मुख-रूपी चंद्र)। उत्प्रेक्षा में 'भेद-ज्ञानपूर्वक प्रतीति' होती है, यानी कवि जानता है कि दोनों अलग हैं और केवल संभावना करता है (मानो वे कमल हैं)। भेद मिट गया तो रूपक, बचा रहा तो उत्प्रेक्षा।
WATCH OUT
अनुप्रास, यमक या श्लेष को उत्तर मानना
ये तीनों शब्दालंकार हैं और पाठ्यक्रम कोष्ठक में साफ़ 'अर्थालंकार' लिखता है। माँगे गए तीन अलंकार उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा हैं। विकल्पों में शब्दालंकार जान-बूझकर रखे जाते हैं क्योंकि उनके नाम अधिक परिचित लगते हैं।
WATCH OUT
करुण रस वाले पद्यांश को वियोग शृंगार बता देना
दोनों में विरह है, पर अंतर आशा का है। वियोग शृंगार में मिलन की आशा बची रहती है और स्थायी भाव रति होता है। करुण में आशा समाप्त हो चुकी है — मृत्यु या स्थायी वियोग — और स्थायी भाव शोक होता है। एक ही सवाल पूछिए: क्या ये फिर मिल सकते हैं?
WATCH OUT
हास्य रस का स्थायी भाव 'हँसी' के बजाय 'हर्ष' लिखना
स्थायी भाव हास है। हर्ष एक संचारी भाव है, जो आता-जाता रहता है और स्थायी भाव की पुष्टि भर करता है। भाषाभूषण की तालिका में स्थायी भाव की पंक्ति में 'हास' है और उसके नीचे रस की पंक्ति में 'हास्य'। संचारी भाव को स्थायी भाव मान लेना यहाँ सबसे आम भूल है।
WATCH OUT
सोरठा की मात्राएँ 13-11 लिखना
वह दोहा है। सोरठा उसका उल्टा है — विषम चरण 11 और सम चरण 13। छन्दःप्रभाकर का लक्षण ही 'दोहा उलटे सोरठा' है, और उसकी टीका में साफ़ लिखा है कि सम चरणों में 13 और विषम में 11 मात्राएँ होती हैं। दोनों के कुल 48 ही रहते हैं, इसलिए योग से पहचान नहीं होगी — चरण-वार गिनिए।
WATCH OUT
'सम तेरा विषमेश' के 'ईश' को नाम समझ लेना
यह लक्षण संख्याएँ शब्दों में छिपाकर रखता है। 'तेरा' का अर्थ 13 है और 'ईश' यानी महादेव का अर्थ 11 है, क्योंकि रुद्र ग्यारह माने गए हैं। पुराने छन्द-ग्रंथ संख्याएँ इसी तरह लिखते थे ताकि लक्षण स्वयं एक दोहा बन सके। अर्थ खुल जाए तो लक्षण भूलता नहीं।
WATCH OUT
रोला में 24 मात्राएँ पूरे छन्द की मान लेना
24 मात्राएँ प्रति चरण हैं, पूरे छन्द की नहीं। छन्दःप्रभाकर की टीका है — 'रोला के चार पद चौबीस-चौबीस मात्राओं के रखो'। चार चरण मिलकर कुल 96 मात्राएँ बनते हैं। विकल्पों में 24 और 96 दोनों रखे जाते हैं, इसलिए पढ़िए कि प्रश्न चरण की बात कर रहा है या छन्द की।
WATCH OUT
उपमा के चार अंगों में 'साधारण धर्म' छोड़ देना
चार अंग हैं — उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द। साधारण धर्म वह गुण है जो दोनों में समान है; 'मुख चंद्र के समान सुंदर है' में वह 'सुंदरता' है। भाषाभूषण लुप्तोपमा के भेद ही इन चारों में से एक-एक के लुप्त होने से गिनाता है — धर्म-लुप्ता, वाचक-लुप्ता, उपमान-लुप्ता, उपमेय-लुप्ता।
WATCH OUT
शांत रस को नौवाँ मानकर उसका स्थायी भाव भी भाषाभूषण से बताना
भाषाभूषण की टीका स्वयं कहती है कि 'नवम रस शांत का स्थायी भाव भाषाभूषण में नहीं दिया गया है' और वह साहित्यदर्पण में शम या निर्वेद माना गया है। इसीलिए कुछ पुस्तकें आठ रस गिनाती हैं और कुछ नौ। वैसे भी कक्षा-10 में केवल हास्य और करुण चाहिए।
WATCH OUT
छन्द के प्रश्न में गण (यगण, मगण, तगण) गिनने लगना
सोरठा और रोला दोनों मात्रिक छन्द हैं — इनमें मात्राएँ गिनी जाती हैं, वर्णों का क्रम नहीं। गण वर्णिक वृत्तों में काम आते हैं और कक्षा-10 के पाठ्यक्रम में नहीं हैं। लक्षण में जगण-निषेध जैसा उल्लेख भर आता है; उस पर प्रश्न नहीं बनता।
WATCH OUT
नौ रस, सब अलंकार और सारे छन्द रटने में समय लगाना
पाठ्यक्रम की पंक्ति असाधारण रूप से सँकरी है — दो रस, तीन अर्थालंकार, दो छन्द। शृंगार, वीर, अनुप्रास, यमक, दोहा, चौपाई, कवित्त, सवैया इनमें से कोई नाम लेकर नहीं है। तीन अंक के लिए तीन परिभाषाएँ और तीन-तीन उदाहरण पर्याप्त हैं।

Practice problems

Work through this chapter's problems as a readiness check — reveal each solution, mark yourself honestly, and get your gap report at the end.

Readiness check

Are you exam-ready for काव्य सौन्दर्य के तत्व — रस, अलंकार और छन्द?

10 problems from this chapter. Try each one, reveal the worked solution, mark yourself honestly — get your gap report at the end.

10 questions~7 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • काव्य सौन्दर्य के तत्व 3 अंक के हैं — खण्ड-अ प्रश्न 3, तीनों बहुविकल्पीय
  • पाठ्यक्रम केवल दो रस, तीन अर्थालंकार और दो छन्द माँगता है
  • रस वह आनन्द है जो स्थायी भाव के विभाव-अनुभाव से अभिव्यक्त होने पर उत्पन्न होता है
  • रस के चार अंग — स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव
  • विभाव दो प्रकार का — आलंबन (जिसके सहारे भाव जगे) और उद्दीपन (जो उसे भड़काए)
  • हास्य रस का स्थायी भाव हास है
  • करुण रस का स्थायी भाव शोक है
  • हास्य के अनुभाव — मुस्कान, ठहाका, आँखों का सिकुड़ना
  • करुण के अनुभाव — रोना, विलाप, छाती पीटना, मूर्च्छा
  • करुण और वियोग शृंगार का अंतर आशा का है — आशा बची तो शृंगार, समाप्त तो करुण
  • भाषाभूषण में शांत रस का स्थायी भाव नहीं दिया गया; वह साहित्यदर्पण में शम या निर्वेद है
  • अलंकार दो प्रकार के — शब्दालंकार और अर्थालंकार; पाठ्यक्रम में केवल अर्थालंकार
  • अनुप्रास, यमक और श्लेष शब्दालंकार हैं, इसलिए पाठ्यक्रम से बाहर
  • उपमा के चार अंग — उपमेय, उपमान, साधारण धर्म, वाचक शब्द
  • चारों अंग हों तो पूर्णोपमा, कोई एक न हो तो लुप्तोपमा
  • उपमा के वाचक शब्द — सम, सी, जैसा, सदृश, समान, तुल्य
  • रूपक — 'उपमेय में भेदरहित उपमान का आरोप'; मुख-रूपी चंद्र, चरण-कमल, भव-सागर
  • उत्प्रेक्षा — 'भेद-ज्ञानपूर्वक उपमेय में उपमान की प्रतीति'
  • उत्प्रेक्षा के वाचक शब्द — मानो, जानो, मनु, जनु
  • पहचान का क्रम — पहले मानो/जनु, फिर सम/सी/जैसा, दोनों न हों तो रूपक
  • रूपक में भेद मिट जाता है, उत्प्रेक्षा में भेद बना रहता है
  • लघु एक मात्रा का, गुरु दो मात्रा का होता है
  • पहला और तीसरा चरण विषम, दूसरा और चौथा सम
  • दोहा — विषम 13, सम 11 मात्रा; कुल 48
  • सोरठा — विषम 11, सम 13 मात्रा; कुल 48। 'दोहा उलटे सोरठा'
  • सोरठे का लक्षण 'सम तेरा विषमेश' — तेरा यानी 13, ईश यानी महादेव यानी 11
  • सोरठे के सम चरणों में जगण का निषेध है
  • रोला — चार पद, प्रत्येक 24 मात्रा, यति 11 और 13 पर; कुल 96
  • 'रोला के और सोरठा के विषम पद एक से होते हैं' — छन्दःप्रभाकर
  • कुण्डलिया = दोहा + रोला; छप्पय = रोला के चार पद + उल्लाला के दो पद
  • सोरठा और रोला दोनों मात्रिक छन्द हैं — गण नहीं गिने जाते

Uttar Pradesh (UPMSP) marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: यूनिट 2 (iv) — काव्य सौन्दर्य के तत्व: 03 अंक (पाठ्यक्रम की इकाईवार तालिका)। खण्ड-अ प्रश्न 3 में तीन उप-प्रश्न, हर एक 1 अंक का, तीनों बहुविकल्पीय।

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय (खण्ड-अ, प्रश्न 3)13रस — हास्य और करुण का स्थायी भाव, परिभाषा और पद्यांश में पहचान; अलंकार — उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा का लक्षण और उदाहरण; छन्द — सोरठा और रोला की मात्रा-व्यवस्था
लघु उत्तरीय — इस यूनिट में बोर्ड नहीं पूछता, समझ जाँचने के लिए20 (अभ्यास हेतु)लक्षण अपने शब्दों में लिखकर अलंकारों में अंतर करना और छन्दों की मात्रा गिनकर दिखाना — बहुविकल्पीय विकल्प इन्हीं अंतरों पर बनते हैं
Prep strategy
  • सबसे पहले पाठ्यक्रम की पंक्ति दोहराइए — दो रस, तीन अर्थालंकार, दो छन्द। इससे बाहर कुछ नहीं
  • रस के लिए केवल दो स्थायी भाव याद रखिए — हास और शोक; बाकी तालिका पहचानने भर के लिए
  • करुण बनाम वियोग शृंगार के लिए एक ही सवाल रटिए — क्या ये फिर मिल सकते हैं?
  • अलंकार के लिए वाचक शब्दों की दो सूचियाँ बनाइए: मानो-जानो-मनु-जनु, और सम-सी-जैसा-सदृश
  • पहचान का क्रम मत बदलिए — पहले उत्प्रेक्षा, फिर उपमा, अंत में रूपक
  • छन्द के लिए एक ही पंक्ति याद कीजिए — दोहा 13-11, सोरठा 11-13, रोला 24 प्रति चरण
  • 'सम तेरा विषमेश' का अर्थ खोलकर लिखिए; अर्थ खुलते ही यह लक्षण भूलता नहीं
  • पद्य खण्ड पढ़ते समय हर दोहे-सोरठे पर रुककर मात्राएँ गिनिए — अभ्यास वहीं हो जाएगा
  • अनुप्रास, यमक, श्लेष, दोहा, चौपाई और सात अन्य रसों पर समय मत लगाइए

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

पद्यांश की व्याख्या लिखते समय रस और अलंकार का उल्लेख कर देना

पद्यांश की व्याख्या लिखते समय रस और अलंकार का उल्लेख कर देना — खण्ड-ब का पद्यांश प्रश्न 6 अंक का है

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पद्य खण्ड के कवियों को पढ़ते हुए उनकी शैली पहचानना — बिहारी के दोहे, तुलसी के सोरठे

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सुभद्रा कुमारी चौहान की 'झाँसी की रानी की समाधि पर' जैसी कविता का प्रधान रस पहचान लेना

निबन्ध और पत्र में उपमा या रूपक का सचेत प्रयोग

निबन्ध और पत्र में उपमा या रूपक का सचेत प्रयोग, जिससे भाषा में चमक आती है

यू0पी0 पुलिस

यू0पी0 पुलिस, लेखपाल और पी0ई0टी0 के सामान्य हिन्दी खंड में यही रस-अलंकार-छन्द पूछे जाते हैं

कक्षा-11 और 12 में काव्यशास्त्र इसी नींव पर आगे बढ़ता है

कक्षा-11 और 12 में काव्यशास्त्र इसी नींव पर आगे बढ़ता है — नौ रस, सब अलंकार और अनेक छन्द

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
खण्ड-अ ओ0एम0आर0 शीट पर है — गोला पूरा काला कीजिए, और अंकित करने के बाद न काटिए, न व्हाइटनर लगाइए
2
अलंकार के प्रश्न में पहले वाचक शब्द पर उँगली रखिए, फिर विकल्प पढ़िए
3
रस के प्रश्न में पहले स्थायी भाव सोचिए, फिर रस — उल्टा करने पर भ्रम होता है
4
छन्द के प्रश्न में देखिए कि पूछा गया है विषम चरण या सम चरण, चरण या पूरा छन्द
5
दोहा और सोरठा दोनों 48 मात्रा के हैं, इसलिए योग वाले विकल्प से कुछ तय नहीं होगा
6
यदि विकल्पों में अनुप्रास, यमक या श्लेष दिखें तो प्रायः वे भरती के हैं — पाठ्यक्रम में अर्थालंकार ही हैं
7
पद्यांश देकर रस पूछा जाए तो अंतिम पंक्ति देखिए; भाव प्रायः वहीं पूरा होता है
8
इस भाग के तीनों प्रश्न सबसे कम समय लेते हैं — इन्हें पहले हल करके वर्णनात्मक खण्ड के लिए समय बचाइए

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
भाषाभूषण उपमा के चार अंगों में से एक-एक के लुप्त होने से चार भेद गिनाता है, दो-दो के लुप्त होने से छह। सोचिए कि तीन अंग लुप्त होने पर कितने भेद बनेंगे और क्या तब भी उपमा बची रहेगी
STRETCH
'दोहा उलटे सोरठा' — किसी प्रसिद्ध दोहे को लेकर उसके चरण उलटकर देखिए कि क्या वह सचमुच सोरठा बन जाता है, और अर्थ पर क्या असर पड़ता है
STRETCH
भाषाभूषण में शांत रस का स्थायी भाव नहीं दिया गया। पता कीजिए कि किन आचार्यों ने शांत को रस माना और किन्होंने नहीं, और उनके तर्क क्या थे
STRETCH
रूपक और उत्प्रेक्षा के बीच एक और अलंकार आता है जिसे भाषाभूषण 'अपह्नुति' कहता है। उसका लक्षण खोजिए और बताइए कि वह इन दोनों से कैसे अलग पड़ता है
STRETCH
छन्दःप्रभाकर कहता है कि सोरठा के सम पद में त्रिकल के बाद दो गुरु नहीं आते, पर रोला के सम पद में आ सकते हैं। किसी सोरठे और किसी रोले पर यह नियम जाँचकर देखिए
STRETCH
अपने पद्य खण्ड के सभी दोहों और सोरठों की सूची बनाकर उनकी मात्राएँ गिनिए। देखिए कि कवि कहीं नियम तोड़ता है या नहीं, और यदि तोड़ता है तो क्यों

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

यू0पी0 बोर्ड हाईस्कूल परीक्षा — हिन्दी (विषय कोड 901), खण्ड-अ प्रश्न 3
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 के चारों यूनिट टेस्ट, जिनमें दो पूर्णतः बहुविकल्पीय हैं
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-11 और 12 हिन्दी, जहाँ काव्यशास्त्र विस्तार से आता है
यू0पी0 पुलिस, लेखपाल और यू0पी0एस0एस0एस0सी0 पी0ई0टी0 के सामान्य हिन्दी खंड
सी0टी0ई0टी0 तथा यू0पी0टी0ई0टी0 के हिन्दी भाषा प्रश्नपत्र

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

वाचक शब्द ढूँढ़िए, और एक निश्चित क्रम में। पहले देखिए कि 'मानो, जानो, मनु, जनु' है या नहीं — हो तो उत्प्रेक्षा। न हो तो देखिए कि 'सम, सी, जैसा, सदृश, समान' है या नहीं — हो तो उपमा। दोनों में से कुछ न हो और दो शब्द जुड़कर एक हो गए हों, तो रूपक। यह क्रम बदलिए मत, क्योंकि 'मानो' वाले वाक्यों में तुलना भी होती है और उन्हें उपमा समझ लेना सबसे आम भूल है।

एक ही सवाल पूछिए — क्या ये दोनों फिर मिल सकते हैं? यदि हाँ, तो वियोग शृंगार है, क्योंकि मिलन की आशा बची है और स्थायी भाव रति है। यदि नहीं — मृत्यु हो गई हो या बिछोह स्थायी हो — तो करुण रस है और स्थायी भाव शोक। दोनों में विरह, आँसू और विलाप दिख सकते हैं, इसलिए बाहरी लक्षणों से मत जाइए; आशा है या नहीं, यही तय करता है।

यह छन्दःप्रभाकर का सोरठा-लक्षण है और इसमें संख्याएँ शब्दों में छिपी हैं। 'तेरा' का अर्थ तेरह यानी 13 है, और वह सम चरणों (दूसरे और चौथे) के लिए है। 'विषमेश' का अर्थ है विषम चरणों में ईश — और ईश यानी महादेव 11 हैं, क्योंकि रुद्र ग्यारह माने गए हैं। पुराने छन्द-ग्रंथ संख्याएँ इसी तरह लिखते थे ताकि लक्षण स्वयं एक छन्द बन सके। अर्थ खुल जाने पर यह भूलता नहीं।

क्योंकि सोरठे का पूरा लक्षण ही उस पर टिका है। छन्दःप्रभाकर सोरठे को चार शब्दों में परिभाषित करता है — 'दोहा उलटे सोरठा'। दोहे की व्यवस्था 13-11 जाने बिना आप सोरठे की 11-13 याद नहीं रख पाएँगे, और परीक्षा में दोनों संख्याएँ विकल्पों में साथ रखी जाती हैं। इतना ही जानिए — दोहा 13-11 — उसके तेईस भेद पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं।

प्रति चरण की। छन्दःप्रभाकर की टीका है — 'रोला के चार पद चौबीस-चौबीस मात्राओं के रखो'। यानी हर चरण में 24, और चारों मिलाकर कुल 96 मात्राएँ। भीतर से ये 24 मात्राएँ 11 और 13 में बँटी होती हैं, इसीलिए ग्रंथ कहता है कि रोला और सोरठा के विषम पद एक से होते हैं। परीक्षा में 24 और 96 दोनों विकल्पों में रखे जाते हैं, इसलिए पढ़िए कि प्रश्न चरण की बात कर रहा है या छन्द की।

नहीं। पाठ्यक्रम असाधारण रूप से सँकरा है और यह आपके पक्ष में है — रस में केवल हास्य और करुण, अलंकार में केवल उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा, छन्द में केवल सोरठा और रोला। नौ रसों की तालिका इतनी भर देखिए कि हास्य और करुण को उसमें रख सकें। शृंगार, वीर, अनुप्रास, यमक, दोहा, चौपाई और सवैया इस प्रश्नपत्र में नाम लेकर नहीं आते।

हास। भाषाभूषण की तालिका में स्थायी भाव की पंक्ति में हास है और ठीक उसके नीचे रस की पंक्ति में हास्य। हर्ष एक संचारी भाव है — वह आता-जाता रहता है और स्थायी भाव की पुष्टि भर करता है, उसकी जगह नहीं लेता। संचारी भाव को स्थायी भाव मान लेना इस प्रश्न की सबसे आम भूल है, और विकल्पों में दोनों साथ रखे जाते हैं।

प्रश्न बहुविकल्पीय है, इसलिए प्रायः सीधे लक्षण पूछा जाता है — जैसे सोरठे के विषम चरण में कितनी मात्राएँ। पर कभी पद्यांश देकर छन्द पहचानने को भी कहा जा सकता है, और तब गिनना पड़ता है। इसीलिए लघु-गुरु की पहचान अभ्यास में रखिए: ह्रस्व स्वर वाला अक्षर लघु, दीर्घ स्वर या अनुस्वार या संयुक्त व्यंजन से पहले वाला अक्षर गुरु। पद्य खण्ड के दोहे-सोरठे पर यह अभ्यास मुफ़्त में हो जाता है।
Verified by the tuition.in editorial team
Last reviewed on 4 September 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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