By the end of this chapter you'll be able to…

  • 1यह बताना कि 'क्या लिखूँ ?' गद्य खण्ड के सात पाठों में से एक है और इसके अंक जीवन-परिचय तथा गद्यांश दोनों में बँटे हैं
  • 2पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन-परिचय और प्रमुख रचनाएँ ('कुछ', 'विश्वसाहित्य') बताना
  • 3निबंध की मूल समस्या — नमिता और अमिता के परस्पर-विरोधी विषय — बताना
  • 4गार्डिनर के कथन और लेखक की अपनी असहमति को स्पष्ट करना
  • 5निबंध-शास्त्र की जिन शर्तों पर लेखक व्यंग्य करते हैं, उन्हें उदाहरण सहित बताना
  • 6अमीर ख़ुसरो की कहानी और उसका निबंध में प्रयोग समझाना
  • 7'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' के तीन तर्क — दूरी, तरुण, वृद्ध — क्रम से बताना
  • 8यह बताना कि निबंध किस तरह समाज-सुधार तक पहुँचता है
  • 9दिए गए किसी गद्यांश का प्रसंग और आशय बताना
  • 10निबंध की शैलीगत विशेषताएँ — आत्म-कथन, उद्धरण, आत्म-व्यंग्य — पहचानना
💡
Why this chapter matters
यह निबंध निबंध-लेखन के बारे में ही निबंध है — इसलिए यह गद्यांश-आधारित प्रश्नों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि इसमें तर्क की एक साफ शृंखला है (ढोल → तरुण → वृद्ध → समाज-सुधार) जिसे किसी भी बिंदु से उद्धृत किया जा सकता है। यह अध्याय बख्शी जी के मूल संग्रह 'कुछ' (1945) से सीधे लिया गया है, किसी गाइड से नहीं।

क्या लिखूँ — पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

"असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु है, विषय नहीं।" — पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, 'क्या लिखूँ ?', कुछ (1945)

1. इस अध्याय में क्या है

'क्या लिखूँ ?' यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी के गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii) के सात निर्धारित पाठों में से एक है। यूनिट 1 (ii) का कुल भार 11 अंक है, और यह किसी एक पाठ का हिस्सा नहीं बँटा — मॉडल प्रश्नपत्र दिखाता है कि यह अंक दो हिस्सों में आता है —

खण्ड-ब प्रश्नविषयअंक
प्रश्न 1गद्य हेतु निर्धारित पाठ्यवस्तु से गद्यांश पर आधारित प्रश्न3×2=6
प्रश्न 6 (क)गद्य खण्ड के लेखकों का जीवन परिचय एवं प्रमुख रचना का नाम3+2=5

अर्थात् गद्यांश किसी भी एक पाठ से आ सकता है, और जीवन-परिचय किसी भी एक लेखक का पूछा जा सकता है। सातों पाठ पढ़ना आदर्श है; यह अध्याय उनमें से एक — बख्शी जी के 'क्या लिखूँ ?' — को मूल पुस्तक से सीधे प्रस्तुत करता है।

सातों निर्धारित पाठ, संदर्भ के लिए —

पाठलेखक
मित्रतारामचन्द्र शुक्ल
ममताजयशंकर प्रसाद
भारतीय संस्कृतिराजेन्द्र प्रसाद
अजन्ताभगवत शरण उपाध्याय
क्या लिखूँपदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन सेरामधारी सिंह दिनकर
पानी में चन्दा और चाँद पर आदमीजय प्रकाश भारती

2. लेखक-परिचय — पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

बोर्ड जीवन-परिचय के लिए 3+2=5 अंक रखता है, इसलिए यह भाग पूरा कंठस्थ करने योग्य है।

  • पूरा नाम। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, बी0ए0 — यही नाम उनके अपने संग्रह 'कुछ' के मुखपृष्ठ पर छपा है।
  • कार्यक्षेत्र। निबंधकार, आलोचक और शिक्षक। हिन्दी के ललित निबंध (व्यक्तिगत, आत्मकथात्मक शैली के निबंध) के प्रमुख लेखकों में गिने जाते हैं।
  • प्रमुख रचना — 'कुछ' (1945)। निबंधों का एक संग्रह, जिसका पहला निबंध यही 'क्या लिखूँ ?' है। संग्रह में 'रामलाल पण्डित', 'प्रेमचन्द', 'पण्डित महावीरप्रसाद द्विवेदी', 'सुमित्रानन्दन पंत' जैसे संस्मरणात्मक निबंध भी हैं।
  • अन्य रचना। 'विश्वसाहित्य' — योरोपीय साहित्य के विकास और पाश्चात्य काव्य-समीक्षकों के मतों का परिचय देने वाली पुस्तक। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी हिन्दी साहित्य का इतिहास में इसी पुस्तक का उल्लेख किया है।
  • युग। शुक्लोत्तर युग (1936 ई0 के बाद) के निबंधकार — शुक्ल जी की पुस्तक 1939-40 पर समाप्त हो जाती है, और बख्शी जी का यह संग्रह 1945 में छपा, यानी उसके बाद का।
  • शैली की विशेषता। आत्म-कथन (स्वयं को केंद्र में रखकर लिखना), हल्का व्यंग्य, और निबंध-रचना की औपचारिक शर्तों पर ही व्यंग्य करने की प्रवृत्ति।

3. निबंध की पृष्ठभूमि — दो विद्यार्थी, दो विषय

निबंध का आरंभ एक विचित्र कठिनाई से होता है। लेखक अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध निबंधकार ए0 जी0 गार्डिनर के इस कथन से शुरू करते हैं कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है, जिसमें भाव अपने-आप उठते हैं और विषय की चिंता नहीं रहती। लेखक स्वीकार करते हैं —

"मुझे तो सोचना पड़ता है, चिन्ता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं मैं एक निबन्ध लिख सकता हूँ।"

आज की कठिनाई दोहरी है। दो विद्यार्थी — नमिता और अमिता — आदर्श निबंध की माँग करते हैं, पर दोनों के विषय बिल्कुल अलग हैं —

विद्यार्थीविषय
नमिता'दूर के ढोल सुहावने होते हैं'
अमिता'समाज-सुधार'

लेखक की समस्या यह है कि दो घंटे में दो अलग निबंध लिखना है, और दोनों विषय ऐसे हैं जिन पर पहले से विचार करने का अवसर नहीं मिला था।

4. निबंध-शास्त्र की पंडिताऊ शर्तों पर व्यंग्य

निबंध का सबसे रोचक भाग वह है जहाँ लेखक "निबंध-शास्त्र के आचार्यों" की बताई शर्तों को एक-एक करके परखते हैं, और हर शर्त में कोई-न-कोई विरोधाभास दिखा देते हैं।

शर्त — निबंध छोटा होना चाहिए। लेखक इसे स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि इसमें उनका ही लाभ है।

शर्त — पहले रूप-रेखा बनानी चाहिए। लेखक इसे असंभव बताते हैं और गार्डिनर का ही उदाहरण देते हैं, जिन्हें अपने लेखों का शीर्षक बनाने में इतनी कठिनाई होती थी कि वे यह काम मित्रों पर छोड़ देते थे। लेखक आगे लिखते हैं —

"शेक्सपीयर को भी नाटक लिखने में जितनी कठिनता न हुई होगी उतनी कठिनता नाटकों के नामकरण में हुई होगी। तभी तो घबड़ाकर नाम न रख सकने के कारण उन्होंने अपने एक नाटक का नाम रख दिया 'जैसा तुम चाहो'।"

शर्त — भाषा में प्रवाह हो, वाक्य छोटे-छोटे हों। यहाँ लेखक सबसे तीखा व्यंग्य करते हैं — वे "मास्टर" हैं, इसलिए विद्वत्ता दिखाने के लिए लंबे वाक्य लिखने का बहाना गढ़ते हैं, और वाणभट्ट की कादम्बरी के आधे-आधे पृष्ठ के वाक्यों का उदाहरण देते हैं।

फिर संस्कृत के कवि श्रीहर्ष का उल्लेख करते हैं, जिन्होंने जान-बूझकर अपने काव्य में ऐसी गुत्थियाँ डालीं जो साधारण पाठकों से न सुलझ सकें, और सेनापति का भी, जिनकी कविता मूर्खों के लिए जान-बूझकर दुर्बोध है। यह पूरी सूची निबंध-शास्त्र की गंभीर सलाह का मज़ाक है, गंभीर सलाह नहीं।

5. दो पद्धतियाँ — पंडिताऊ बनाम अंग्रेज़ी निबंधकार

इन शर्तों से निराश होकर लेखक एक दूसरी पद्धति की ओर मुड़ते हैं — अंग्रेज़ी के निबंधकारों की, जिनके "जन्मदाता मानहेन (मॉन्तेन) समझे जाते हैं।" इस पद्धति की विशेषता लेखक इस तरह बताते हैं —

"उन्होंने स्वयं जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया उसी को अपने प्रबन्धों में लिपिबद्ध कर दिया।"

ऐसे निबंधों में न कवि की उदात्त कल्पना होती है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि, न विज्ञों का गंभीर तर्क — केवल लेखक की सच्ची अनुभूति और सच्ची अभिव्यक्ति। लेखक इसी पद्धति को अपनाने का निर्णय लेते हैं — पर समस्या बनी रहती है: दो निबंध लिखने हैं, समय एक ही है।

6. अमीर ख़ुसरो की युक्ति — दो विषय, एक निबंध

समाधान के लिए लेखक अमीर ख़ुसरो की एक कहानी याद करते हैं। एक बार प्यास लगने पर ख़ुसरो एक कुएँ के पास पहुँचे, जहाँ चार स्त्रियाँ पानी भर रही थीं। पानी माँगने पर हरेक ने एक अलग विषय पर कविता सुनने की शर्त रखी — खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल। ख़ुसरो ने एक ही दोहे में चारों की इच्छा पूरी कर दी —

"खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला; आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।"

लेखक इसी युक्ति को अपनाते हैं — एक ही निबंध में दोनों विषयों को साध लेते हैं, "एक ही ढेले से दो चिड़ियाँ" मारते हुए।

7. मुख्य विषय — दूर के ढोल सुहावने क्यों होते हैं

निबंध का वास्तविक विषय अब आरंभ होता है, और यहीं लेखक समाज-सुधार को भी इसी तर्क में पिरो देते हैं।

पहला तर्क — दूरी कर्कशता को मधुर बना देती है। ढोल के पास बैठे व्यक्ति के कान के पर्दे फटते हैं, पर वही शब्द दूर किसी नदी-तट पर संध्या के समय किसी और के हृदय में विवाह-उत्सव का चित्र अंकित कर देते हैं। लेखक लिखते हैं —

"ढोल की ध्वनि के साथ आनन्द का कलरव, उत्सव का प्रमोद और प्रेम का संगीत ये तीनों मिले रहते हैं। तभी उनकी कर्कशता समीपस्थ लोगों को भी कटु नहीं प्रतीत होती और दूरस्थ लोगों के लिए तो वह अत्यन्त मधुर बन जाती है।"

दूसरा तर्क — तरुणों के लिए भविष्य दूर है, इसलिए मधुर। जो तरुण जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र मनोमोहक लगता है — प्रेम ही उनका सर्वस्व है, रोग और मृत्यु भी उन्हें सुखद लगते हैं क्योंकि उनमें प्रेम की मधुरता घुली रहती है। संसार में प्रवेश करते ही यह कल्पित संसार विलीन हो जाता है।

तीसरा तर्क — वृद्धों के लिए अतीत दूर है, इसलिए मधुर। जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, उन्हें अतीत की स्मृति सुखद लगती है। लेखक इस विषमता को एक पंक्ति में बाँधते हैं —

"तरुण भविष्य के वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक।"

समाज-सुधार से जुड़ाव। इन्हीं दो विरोधी खिंचावों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है, और इसीलिए वर्तमान काल सदैव सुधारों का केंद्र बना रहता है। लेखक भारत के सुधारकों की एक सूची देते हैं — बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी — और कहते हैं कि सुधारकों का यह क्रम कभी समाप्त नहीं होता, क्योंकि जो आज सुधार है वही कल दोष बन जाता है।

निबंध का अंतिम मोड़। लेखक भविष्यवाणी करते हैं कि आज का प्रगतिशील साहित्य भी कुछ समय बाद अतीत का स्मारक बन जाएगा, और आज के तरुण ही वृद्ध होकर उसी अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। निबंध उसी पंक्ति पर लौटकर समाप्त होता है जिससे उसका शीर्षक बना —

"…ऐसे ही स्वप्न सुखद होते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।"

'क्या लिखूँ ?' की बनावट — एक निबंध, दो विषय समस्या नमिता — दूर के ढोल अमिता — समाज-सुधार युक्ति अमीर ख़ुसरो — एक दोहे में चार इच्छाएँ पूरी एक निबंध दोनों विषय एक तर्क-सूत्र में जुड़े तरुण भविष्य दूर, इसलिए मधुर — क्रान्ति चाहते वृद्ध अतीत दूर, इसलिए मधुर — गौरव सहेजते परिणाम दोनों का द्वंद्व ही वर्तमान को सुधार का केन्द्र बनाता है

8. निबंध-शैली की विशेषताएँ

विशेषताउदाहरण
आत्म-कथन शैलीलेखक स्वयं को केंद्र में रखकर पूरा निबंध बुनते हैं
विद्वत्तापूर्ण उद्धरणगार्डिनर, शेक्सपीयर, वाणभट्ट, श्रीहर्ष, सेनापति, अमीर ख़ुसरो
हल्का आत्म-व्यंग्य"मैं तो मास्टर हूँ" — अपनी ही दुर्बलता पर हँसी
तर्क की शृंखलाढोल → तरुण का भविष्य → वृद्ध का अतीत → समाज-सुधार — एक तर्क से दूसरे तक स्वाभाविक बहाव
उद्देश्य और शीर्षक की एकतानिबंध जिस पंक्ति से चलता है, उसी पर लौटकर समाप्त होता है

9. गद्यांश-आधारित अभ्यास

बोर्ड के खण्ड-ब प्रश्न 1 का ढाँचा है — किसी गद्यांश पर 3 प्रश्न, 2-2 अंक के। नीचे एक प्रतिनिधि गद्यांश और उसी ढाँचे पर प्रश्न दिए गए हैं।

गद्यांश। "दूर के ढोल सुहावने होते हैं, क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर, संध्या समय, किसी दूसरे के कान से वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।"

शब्दार्थ। कर्कशता — कठोरता, कटु ध्वनि। संचार करना — फैलाना, भर देना।

प्रश्न 1 (2 अंक)। गद्यांश के अनुसार दूर के ढोल सुहावने क्यों लगते हैं? उत्तर संकेत — क्योंकि दूरी उनकी कर्कशता को कम कर देती है और वही ध्वनि निकट सुनने वाले को कटु, पर दूर सुनने वाले को मधुर लगती है।

प्रश्न 2 (2 अंक)। इस गद्यांश का प्रसंग स्पष्ट कीजिए — यह किस निबंध से और किस संदर्भ में लिया गया है? उत्तर संकेत — यह पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के निबंध 'क्या लिखूँ ?' से है, जहाँ लेखक 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' विषय पर निबंध लिखते हुए इस भौतिक उदाहरण से अपनी बात आरंभ करते हैं।

प्रश्न 3 (2 अंक)। लेखक इसी तर्क को आगे किस विषय तक ले जाते हैं? उत्तर संकेत — तरुणों के लिए भविष्य, वृद्धों के लिए अतीत — दोनों दूर होने के कारण मधुर लगते हैं, और यही खिंचाव समाज को निरंतर सुधार की ओर धकेलता रहता है।

दूसरा गद्यांश। "तरुण भविष्य के वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत के खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक। इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है।"

शब्दार्थ। क्षुब्ध — अशांत, असंतुष्ट। संरक्षक — रक्षा करने वाला, बचाए रखने वाला।

प्रश्न 1 (2 अंक)। तरुण और वृद्ध के स्वभाव में लेखक क्या विरोधाभास दिखाते हैं? उत्तर संकेत — तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और क्रांति के समर्थक होते हैं, जबकि वृद्ध अतीत को वर्तमान में खींचना चाहते हैं और अतीत-गौरव के संरक्षक होते हैं।

प्रश्न 2 (2 अंक)। वर्तमान 'सदैव क्षुब्ध' क्यों रहता है, गद्यांश के आधार पर बताइए। उत्तर संकेत — क्योंकि दो विपरीत दिशाओं में खींचने वाली शक्तियाँ (तरुणों की क्रांति-चाह और वृद्धों की अतीत-रक्षा) एक साथ वर्तमान पर काम करती हैं, जिससे वह कभी स्थिर या संतुष्ट नहीं हो पाता।

प्रश्न 3 (2 अंक)। निबंध में यह विरोधाभास अंततः किस निष्कर्ष तक पहुँचाता है? उत्तर संकेत — यही विरोधाभास समाज को निरंतर सुधार की ओर धकेलता है, और इसीलिए इतिहास में बुद्ध से गांधी तक सुधारकों की शृंखला कभी समाप्त नहीं होती।

सारांश

'क्या लिखूँ ?' पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के संग्रह 'कुछ' (1945) का पहला निबंध है, और यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी के गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii, 11 अंक) के सात पाठों में से एक। निबंध की चतुराई यह है कि वह स्वयं इस समस्या पर है कि निबंध लिखा कैसे जाए — दो विद्यार्थियों के परस्पर-विरोधी विषयों को अमीर ख़ुसरो की एक चतुर युक्ति से एक साथ साध लिया जाता है।

रास्ते में लेखक निबंध-शास्त्र की पंडिताऊ शर्तों — छोटे वाक्य, रूप-रेखा, प्रवाह — पर हल्का व्यंग्य करते हैं, और अंग्रेज़ी निबंधकारों (मॉन्तेन-परंपरा) की आत्म-कथात्मक शैली को अपनाने का निर्णय लेते हैं।

मुख्य विषय — दूर के ढोल सुहावने क्यों होते हैं — तीन तर्कों में खुलता है: दूरी कर्कशता को मधुर बनाती है; तरुणों के लिए दूर भविष्य मधुर है; वृद्धों के लिए दूर अतीत मधुर है। इसी विरोधाभास से निबंध समाज-सुधार तक पहुँचता है — वर्तमान सदा क्षुब्ध रहता है क्योंकि तरुण भविष्य को खींचना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को, और यही खिंचाव सुधारकों की अनवरत शृंखला — बुद्ध से गांधी तक — को जन्म देता है।

परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है

  • गद्यांश के प्रश्न किसी भी पाठ से आ सकते हैं। यह अध्याय केवल एक पाठ (क्या लिखूँ) कवर करता है। शेष छह — मित्रता, ममता, भारतीय संस्कृति, अजन्ता, ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से, पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी — इसमें नहीं हैं।
  • 'कुछ' के अन्य निबंध। संग्रह में 'रामलाल पण्डित', 'प्रेमचन्द', 'पण्डित महावीरप्रसाद द्विवेदी' जैसे अन्य संस्मरणात्मक निबंध भी हैं, पर पाठ्यक्रम में केवल 'क्या लिखूँ ?' निर्धारित है।
  • 'विश्वसाहित्य' का विस्तृत विवरण। बख्शी जी की यह दूसरी पुस्तक जीवन-परिचय में नाम लेने के लिए पर्याप्त है; उसकी विषय-वस्तु पाठ्यक्रम में नहीं माँगी गई।

Key formulas & results

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निबंध का स्रोत
'क्या लिखूँ ?' = 'कुछ' (1945) का पहला निबंध
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, बी0ए0 — मूल पुस्तक की विषय-सूची में पहला शीर्षक
दो विषय, एक युक्ति
नमिता — दूर के ढोल सुहावने + अमिता — समाज-सुधार = अमीर ख़ुसरो की पद्धति से एक निबंध
ख़ुसरो के एक दोहे में चार इच्छाओं की पूर्ति वाली कहानी से प्रेरित
तीन तर्कों का क्रम
दूरी कर्कशता को मधुर बनाती है → तरुण के लिए भविष्य दूर है → वृद्ध के लिए अतीत दूर है
इसी क्रम से निबंध समाज-सुधार तक पहुँचता है
सुधारकों की सूची
बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद, महात्मा गांधी
लेखक के अपने शब्दों में — यह सूची यहीं समाप्त नहीं होती
अंग्रेज़ी निबंध-परंपरा का जनक
मानहेन (मॉन्तेन) — आत्म-कथात्मक निबंध-शैली के प्रवर्तक
लेखक इसी पद्धति को अपनाने का निर्णय लेते हैं
पंडिताऊ शर्तों के उदाहरण
लंबे वाक्य — वाणभट्ट (कादम्बरी) · दुर्बोधता — श्रीहर्ष, सेनापति
लेखक इन्हें गंभीर सलाह नहीं, व्यंग्य के लिए उद्धृत करते हैं
निबंध की शुरुआत और अंत
दोनों जगह एक ही पंक्ति — 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं'
शीर्षक और निष्कर्ष की एकता निबंध की बनावट का मूल है
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

WATCH OUT
यह मान लेना कि यह पूरे गद्य खण्ड के 11 अंक इसी एक पाठ से आते हैं
11 अंक सातों पाठों में साझा हैं — 6 अंक गद्यांश के (किसी भी पाठ से) और 5 अंक जीवन-परिचय के (किसी भी एक लेखक का)। एक ही पाठ पूरी तरह तैयार करने से पूरे अंक नहीं मिलते।
WATCH OUT
निबंध को केवल 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' विषय पर मान लेना
निबंध वास्तव में दो विषयों को जोड़ता है — नमिता का 'दूर के ढोल' और अमिता का 'समाज-सुधार'। अमीर ख़ुसरो की युक्ति से लेखक दोनों को एक साथ साधते हैं।
WATCH OUT
गार्डिनर के कथन को लेखक की अपनी राय समझ लेना
लेखक गार्डिनर के कथन से असहमति नहीं जताते, पर स्पष्ट कहते हैं कि उन्हें स्वयं वह मानसिक स्थिति अनुभव नहीं होती — उन्हें सोचना, चिंता करनी और परिश्रम करना पड़ता है।
WATCH OUT
वाणभट्ट, श्रीहर्ष और सेनापति के उदाहरणों को लेखक की प्रशंसा समझना
ये उदाहरण व्यंग्य के लिए हैं — लेखक दिखाते हैं कि 'विद्वत्तापूर्ण' दिखने के लिए वाक्यों को जान-बूझकर लंबा या दुर्बोध बनाना कितना हास्यास्पद है।
WATCH OUT
समाज-सुधार वाले भाग को निबंध से अलग समझना
यह निबंध का ही विस्तार है — तरुण और वृद्ध के परस्पर-विरोधी खिंचाव (भविष्य बनाम अतीत) के कारण वर्तमान सदा असंतुष्ट रहता है, और यही समाज को निरंतर सुधार की ओर धकेलता है।
WATCH OUT
मॉन्तेन (Montaigne) के नाम की वर्तनी में उलझना
मूल पुस्तक में यह नाम पुरानी वर्तनी में 'मानहेन' छपा है (आधुनिक हिन्दी में 'मॉन्तेन')। बोर्ड के लिए मूल भावार्थ याद रखना पर्याप्त है — वे आत्म-कथात्मक निबंध-परंपरा के जनक माने जाते हैं।

Practice problems

Work through this chapter's problems as a readiness check — reveal each solution, mark yourself honestly, and get your gap report at the end.

Readiness check

Are you exam-ready for क्या लिखूँ — पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी?

9 problems from this chapter. Try each one, reveal the worked solution, mark yourself honestly — get your gap report at the end.

9 questions~6 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • 'क्या लिखूँ ?' — पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, संग्रह 'कुछ' (1945) का पहला निबंध
  • गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii) कुल 11 अंक, सात पाठों में साझा — इसी एक पाठ से नहीं
  • 6 अंक गद्यांश के (कोई भी पाठ), 5 अंक जीवन-परिचय के (कोई भी एक लेखक)
  • नमिता का विषय — दूर के ढोल सुहावने होते हैं; अमिता का विषय — समाज-सुधार
  • गार्डिनर का कथन — लिखने की विशेष मानसिक स्थिति होती है; लेखक असहमत नहीं, पर स्वयं वह अनुभव नहीं करते
  • निबंध-शास्त्र की शर्तें — छोटा निबंध, पूर्व-निर्धारित रूप-रेखा, प्रवाहमय भाषा — सब पर हल्का व्यंग्य
  • वाणभट्ट (कादम्बरी) — लंबे वाक्यों का उदाहरण; श्रीहर्ष और सेनापति — दुर्बोधता के उदाहरण
  • मानहेन (मॉन्तेन) — आत्म-कथात्मक अंग्रेज़ी निबंध-परंपरा के जनक
  • अमीर ख़ुसरो — चार स्त्रियों की इच्छा एक दोहे में पूरी करने की कथा
  • दूरी का पहला तर्क — ढोल की कर्कशता दूर से मधुर लगती है
  • दूसरा तर्क — तरुणों के लिए भविष्य दूर, इसलिए मधुर
  • तीसरा तर्क — वृद्धों के लिए अतीत दूर, इसलिए मधुर
  • इसी विरोधाभास से वर्तमान सदा क्षुब्ध रहता है — समाज-सुधार का स्रोत
  • सुधारकों की सूची — बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राममोहन राय, दयानंद, गांधी
  • निबंध की शुरुआत और अंत एक ही पंक्ति से — 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं'
  • बख्शी जी शुक्लोत्तर युग के लेखक — 'कुछ' 1945 में छपी, शुक्ल जी के ग्रंथ (1939-40 तक) के बाद

Uttar Pradesh (UPMSP) marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: यूनिट 1 (ii) गद्य खण्ड — कुल 11 अंक, सात पाठों में साझा। किसी एक पाठ के लिए निश्चित अंक-विभाजन नहीं है।

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
गद्यांश पर आधारित (खण्ड-ब, प्रश्न 1)23गद्यांश का प्रसंग, आशय, भाषा-सौंदर्य — किसी भी एक निर्धारित पाठ से लिया जा सकता है
जीवन परिचय एवं प्रमुख रचना (खण्ड-ब, प्रश्न 6-क)3+21किसी भी एक लेखक का जीवन-वृत्त और उनकी प्रमुख रचना का नाम
बहुविकल्पीय (खण्ड-अ, प्रश्न 6-11 क्षेत्र में)10-2लेखक-कृति मिलान, विधा-पहचान — मॉडल प्रश्नपत्र में अजातशत्रु, इलाचन्द्र जोशी जैसे प्रश्न इसी श्रेणी के थे
Prep strategy
  • पहले बख्शी जी का जीवन-परिचय कंठस्थ कीजिए — यह 5 अंकों के लिए सीधे काम आता है
  • निबंध की तर्क-शृंखला (ढोल → तरुण → वृद्ध → समाज-सुधार) को एक पंक्ति के फ्लो-चार्ट की तरह याद रखिए
  • कम-से-कम तीन उद्धरण याद रखिए — इससे गद्यांश-आधारित प्रश्न का उत्तर प्रामाणिक बनता है
  • यह मत भूलिए कि यह सात पाठों में से एक ही है — शेष छह की भी कम-से-कम जीवन-परिचय तालिका बनाइए

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

गद्यांश-आधारित प्रश्नों के लिए एक तैयार, प्रामाणिक उदाहरण

गद्यांश-आधारित प्रश्नों के लिए एक तैयार, प्रामाणिक उदाहरण — प्रसंग, आशय और भाषा-सौंदर्य तीनों तरह के प्रश्नों के लिए उपयुक्त

निबंध-लेखन कौशल

निबंध-लेखन कौशल — तर्क की शृंखला कैसे बनाई जाती है, इसका व्यावहारिक उदाहरण

जीवन-परिचय प्रश्न के लिए तैयार सामग्री

जीवन-परिचय प्रश्न के लिए तैयार सामग्री — बख्शी जी, उनकी रचनाएँ और युग

यूनिट 1 (i) के 'शुक्लोत्तर युग' से जुड़ाव

यूनिट 1 (i) के 'शुक्लोत्तर युग' से जुड़ाव — यही निबंध उस यूनिट में प्रमाण के रूप में प्रयुक्त हुआ है

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
गद्यांश आधारित प्रश्न में सबसे पहले प्रसंग (पाठ और लेखक का नाम) लिखिए, फिर आशय
2
जीवन-परिचय के 3+2=5 अंकों में 3 अंक जीवन-वृत्त के लिए और 2 अंक प्रमुख रचना के नाम के लिए हैं — दोनों अलग-अलग स्पष्ट लिखिए
3
उद्धरण देते समय उसे उद्धरण-चिह्न में रखिए और स्रोत (निबंध का नाम) साथ लिखिए — इससे उत्तर की प्रामाणिकता बढ़ती है
4
समय कम हो तो कम-से-कम निबंध के तीन तर्क (दूरी, तरुण, वृद्ध) क्रम से लिखिए — यही निबंध की रीढ़ है

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
लेखक अमीर ख़ुसरो की जिस युक्ति का प्रयोग करते हैं, वह वस्तुतः एक ही भाषिक इकाई से कई अर्थ निकालने की कला है। हिन्दी की श्लेष और यमक जैसी अलंकार-युक्तियों से इसकी तुलना कीजिए
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मॉन्तेन-शैली (आत्म-कथात्मक निबंध) और भारतीय निबंध-परंपरा (जैसे शुक्ल जी के विचारात्मक निबंध) के बीच का बुनियादी अंतर लिखिए — विषय केंद्र में है या लेखक स्वयं?
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यह निबंध 'निबंध के बारे में निबंध' है — इसे साहित्य में 'मेटा-टेक्स्ट' कहा जाता है। हिन्दी के किसी अन्य निबंध या कहानी में ऐसी आत्म-निर्देशात्मकता खोजिए
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बुद्ध से गांधी तक की सुधारक-सूची में हर व्यक्ति ने किस विशिष्ट 'दोष' के विरुद्ध सुधार किया, यह शोध कर एक तालिका बनाइए

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CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

यू0पी0 बोर्ड हाईस्कूल परीक्षा — हिन्दी (विषय कोड 901), खण्ड-ब गद्यांश एवं जीवन-परिचय प्रश्न
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-9 हिन्दी — समान गद्य-खण्ड ढाँचा
अन्य राज्य बोर्डों की हिन्दी परीक्षाएँ जहाँ ललित निबंध पाठ्यक्रम में हों

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The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

नहीं। गद्यांश के प्रश्न किसी भी एक पाठ से आ सकते हैं, और जीवन-परिचय भी किसी भी एक लेखक का पूछा जा सकता है। यह अध्याय सातों में से एक — 'क्या लिखूँ ?' — को मूल स्रोत से पूरी तरह कवर करता है ताकि कम-से-कम एक पाठ पूरी तरह तैयार हो; शेष छह पाठों की जीवन-परिचय तालिका अलग से बनानी चाहिए।

दोनों। लेखक की चतुराई यही है कि वे अमीर ख़ुसरो की युक्ति अपनाकर दोनों विषयों को एक ही तर्क-शृंखला में पिरो देते हैं — दूरी के कारण चीज़ें मधुर लगती हैं (ढोल, भविष्य, अतीत), और इसी विरोधाभास से समाज-सुधार जन्म लेता है।

नहीं, वे एक विशेष प्रकार की पंडिताऊ, औपचारिक सलाह पर व्यंग्य करते हैं — जैसे जान-बूझकर वाक्य लंबे या दुर्बोध बनाना। इसके विपरीत वे मॉन्तेन-परंपरा की सहज, आत्म-कथात्मक शैली को अपनाते हैं, जो स्वयं एक निबंध-पद्धति है, अराजकता नहीं।

मूल पुस्तक से — पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के संग्रह 'कुछ' (1945, archive.org पर उपलब्ध डिजिटल संस्करण) से सीधे, जिसमें यह निबंध पहले स्थान पर है।
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Last reviewed on 14 September 2026. Written and reviewed by subject-matter experts — read about our process.
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