ममता — जयशंकर प्रसाद
"मैं ब्राह्मण-कुमारी हूँ; सब अपना धर्म छोड़ दें, तो मैं भी क्यों छोड़ दूँ?" — ममता, जयशंकर प्रसाद की कहानी 'ममता' में
1. इस अध्याय में क्या है
'ममता' यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी के गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii) के सात निर्धारित पाठों में से एक है। यूनिट 1 (ii) का कुल भार 11 अंक है, सातों पाठों में साझा — 6 अंक गद्यांश पर (किसी भी पाठ से) और 5 अंक जीवन-परिचय पर (किसी भी एक लेखक का)। पूरी शर्त और शेष छह पाठों की सूची यूनिट के पहले चरण — 'क्या लिखूँ' अध्याय — में दी गई है; यहाँ केवल इसकी पुनरावृत्ति नहीं की जा रही।
विधा पर एक ज़रूरी स्पष्टीकरण। 'ममता' निबंध नहीं, कहानी है — प्रसाद के कहानी-संग्रह में संकलित एक ऐतिहासिक कथा। बोर्ड इसे 'गद्य खण्ड' के अंतर्गत रखता है क्योंकि यह खण्ड निबंध और कहानी दोनों विधाओं की गद्य-रचनाओं को एक साथ समेटता है। परीक्षा में विधा पूछी जा सकती है, इसलिए यह अंतर याद रखना ज़रूरी है।
2. लेखक-परिचय — जयशंकर प्रसाद
- जन्म-मृत्यु। जयशंकर प्रसाद (1889-1937), काशी के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्म।
- कार्यक्षेत्र। हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक (प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी) — पर प्रसाद की पहचान कविता तक सीमित नहीं। वे श्रेष्ठ नाटककार और कहानीकार भी हैं।
- प्रमुख कृतियाँ। नाटक — 'स्कंदगुप्त', 'अजातशत्रु', 'चन्द्रगुप्त', 'ध्रुवस्वामिनी'। उपन्यास — 'कंकाल', 'तितली', 'इरावती'। कहानी-संग्रह — 'छाया', 'प्रतिध्वनि', 'आकाशदीप', 'आँधी', 'इन्द्रजाल' — इन्हीं में 'ममता' संकलित है। काव्य — 'कामायनी' (महाकाव्य), 'आँसू', 'लहर'।
- शुक्ल जी का मूल्यांकन। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपनी हिन्दी साहित्य का इतिहास में लिखते हैं कि तृतीय उत्थान (शुक्ल युग) के दो सबसे ऊँचे नाटककारों में जयशंकर प्रसाद और हरिकृष्ण प्रेमी थे। बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र में भी 1918-1936 के इसी काल का एक नाम 'प्रसाद युग' पूछा गया है — प्रसाद की देन नाटक, कहानी और छायावादी काव्य तीनों में है।
- कहानी-लेखन की विशेषता। प्रसाद की कहानियाँ प्रायः ऐतिहासिक अथवा भावुकता-प्रधान होती हैं, और उनमें एक स्त्री-चरित्र प्रायः केंद्र में होता है जो कर्तव्य और भावना के द्वंद्व से गुज़रता है — 'ममता' इसका प्रतिनिधि उदाहरण है।
3. कहानी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कहानी की घटनाएँ दो ऐतिहासिक बिंदुओं के बीच फैली हैं, और दोनों को पहचानना बोर्ड के प्रसंग-आधारित प्रश्नों के लिए ज़रूरी है।
| घटना | ऐतिहासिक संदर्भ |
|---|---|
| रोहतासगढ़ पर शेरशाह का अधिकार | शेरशाह सूरी द्वारा राजपूत-शासित रोहतासगढ़ दुर्ग पर विजय (सोलहवीं शताब्दी) |
| चौसा का मुगल-पठान युद्ध | 1539 ई0 में हुमायूँ और शेरशाह के बीच चौसा का युद्ध, जिसमें हुमायूँ पराजित हुए |
कहानी दिखाती है कि एक बड़ी ऐतिहासिक घटना (शेरशाह की विजय) एक छोटे, नामहीन व्यक्ति (मंत्री चूड़ामणि की पुत्री) के जीवन को किस तरह पूरी तरह बदल देती है — यही ऐतिहासिक कहानी-शैली की पहचान है।
शेरशाह और हुमायूँ का संघर्ष, संक्षेप में। शेरशाह सूरी ने चौसा (1539) और फिर कन्नौज (1540) में हुमायूँ को हराकर उन्हें भारत से पंद्रह वर्ष के लिए निर्वासित कर दिया था, और स्वयं सूर साम्राज्य की स्थापना की। कहानी में जो सैनिक ममता से आश्रय माँगता है, वह इसी चौसा-पराजय के तुरंत बाद, भागते हुए हुमायूँ के रूप में सामने आता है — यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रसाद की कल्पना और वास्तविक इतिहास को जोड़ने वाली कड़ी है।
4. कथासार — पहला भाग: रोहतासगढ़ में
ममता, रोहतासगढ़-दुर्गपति के ब्राह्मण मंत्री चूड़ामणि की एकमात्र पुत्री है। वह विधवा है, और लेखक इसी बिंदु पर समाज की क्रूरता की ओर संकेत करते हैं —
"वह विधवा थी — हिन्दू-विधवा संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी है।"
चूड़ामणि आने वाले संकट को भाँपकर ममता के लिए चाँदी के थालों में स्वर्ण भरकर लाते हैं — "उस दिन के लिए, बेटी! जब मंत्रित्व न रहेगा।" ममता स्वर्ण देखकर चौंक उठती है और पूछती है यह म्लेच्छ (शेरशाह के पक्ष) का उत्कोच (घूस) तो नहीं।
पिता की व्याकुलता में छिपा डर सच निकलता है — अगले ही दिन डोलियों की जाँच के विवाद में चूड़ामणि मारे जाते हैं, दुर्ग शेरशाह के हाथ पड़ता है, और अफरा-तफरी में ममता निकल भागती है।
5. कथासार — दूसरा भाग: काशी में, मुगल राजकुमार के साथ
वर्षों बाद ममता काशी के धर्मचक्र विहार के खंडहर में एक झोपड़ी में साधनारत जीवन बिताती है। एक रात एक थका, भयभीत सैनिक उसकी कुटी में आश्रय माँगता है — वह चौसा-युद्ध में शेरशाह से हारकर भागा हुआ मुगल है।
यहीं कहानी का मूल द्वंद्व खुलता है। ममता के मन में दो विचार टकराते हैं —
"ये सब विधर्मी दया के पात्र नहीं — मेरे पिता का वध करने वाले आततायी!"
और साथ ही —
"मैं ब्राह्मणी हूँ, मुझे तो अपने धर्म — अतिथिदेव की उपासना — का पालन करना चाहिए।"
कर्तव्य घृणा पर विजय पाता है। ममता मुगल को जल देती है, और अंततः आश्रय भी — "मैं तुम्हें आश्रय देती हूँ। मैं ब्राह्मण-कुमारी हूँ; सब अपना धर्म छोड़ दें, तो मैं भी क्यों छोड़ दूँ?" प्रभात में सैकड़ों अश्वारोही खोज में आते हैं। जाते समय वह मुगल राजकुमार अपने साथी से कहता है — "उस स्त्री को मैं कुछ दे न सका। उसका घर बनवा देना... यह स्थान भूलना मत।"
6. कथासार — तीसरा भाग: पहचान का अंतिम क्षण
कहानी का अंत सैंतालीस वर्ष बाद घटित होता है। ममता अब सत्तर वर्ष की वृद्धा है, अपनी झोपड़ी में मृत्युशय्या पर। एक अश्वारोही उसी स्थान को खोजते हुए आता है, यह पूछते हुए कि किसी दिन "शाहंशाह हुमायूँ" इसी छप्पर के नीचे ठहरे थे। ममता अपने अंतिम शब्दों में सत्य प्रकट करती है —
"मैंने सुना था कि वह मेरा घर बनवाने की आज्ञा दे चुका था! भगवान् ने सुन लिया, मैं आज इसे छोड़े जाती हूँ।"
वह उसी क्षण प्राण त्यागती है। कहानी की सबसे मार्मिक पंक्ति उसका अंत है — हुमायूँ के पुत्र अकबर उस स्थान पर एक भव्य अष्टकोण मंदिर बनवाते हैं, जिस पर शिलालेख है कि "सातों देश के नरेश हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था।" पर कहानी इसी वाक्य पर समाप्त होती है —
"पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं।"
7. काशी के खंडहर का वर्णन — प्रसाद की परिवेश-चित्रण शैली
जिस स्थान पर ममता मुगल सैनिक से भेंट करती है, उसका वर्णन प्रसाद की गद्य-शैली का सबसे समृद्ध नमूना है। यह स्थान है काशी का धर्मचक्र विहार, जहाँ कभी गौतम बुद्ध ने अपने पहले पाँच शिष्यों (पंचवर्गीय भिक्षु) को उपदेश दिया था — प्रसाद इस स्थल को इन शब्दों में चित्रित करते हैं —
"काशी के उत्तर धर्मचक्र विहार, मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्ति का खंडहर था। भग्न चूड़ा, तृण-गुल्मों से ढके हुए प्राचीर, ईंटों की ढेर में बिखरी हुई भारतीय शिल्प की विभूति, ग्रीष्म की चन्द्रिका में अपने को शीतल कर रही थी।"
एक ही वाक्य में तीन कालखंड परत-दर-परत खुलते हैं — बौद्ध युग (जहाँ बुद्ध ने उपदेश दिया), मौर्य-गुप्त साम्राज्यों का वैभव (जिनके खंडहर अब घास से ढके हैं), और उसी खंडहर में अब ममता का वर्तमान जीवन।
इसी भग्नावशेष की झोपड़ी में, दीपक की मंद रोशनी में, ममता जब मुगल के आने से पहले पाठ कर रही होती है, तो वह पाठ भी सोच-समझकर चुना गया है — भगवद्गीता का श्लोक "अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते..." (जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं)।
यह विवरण दिखाता है कि ममता केवल एक साधारण स्त्री नहीं, संस्कृत-ज्ञाता और धर्मपरायण स्त्री है — जिससे आगे उसके अतिथि-धर्म के निर्णय की नींव पहले ही रखी जा चुकी होती है।
8. पात्र-परिचय
| पात्र | परिचय |
|---|---|
| ममता | रोहतासगढ़ के ब्राह्मण मंत्री चूड़ामणि की विधवा पुत्री; कहानी की नायिका |
| चूड़ामणि | रोहतासगढ़-दुर्गपति के मंत्री, ममता के पिता; दुर्ग-पतन के समय मारे जाते हैं |
| भागा हुआ मुगल | चौसा-युद्ध में हारकर भागा सैनिक, वास्तव में स्वयं हुमायूँ — कहानी के अंत में यह पहचान खुलती है |
| अकबर (अप्रत्यक्ष) | हुमायूँ का पुत्र, जो अंत में स्मारक-मंदिर बनवाता है |
9. भाषा और शैली
प्रसाद की भाषा इस कहानी में तत्सम-प्रधान, संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है — यह छायावादी गद्य की पहचान है। कुछ विशेषताएँ —
| विशेषता | उदाहरण |
|---|---|
| संस्कृत तत्सम शब्दावली | प्रकोष्ठ, अनिष्ट, तीक्ष्ण, निराश्रय, अभ्युदयशील |
| छोटे, प्रभावशाली संवाद | "मूर्ख है" — कहकर चूड़ामणि चले गये। |
| भावात्मक वाक्य-रचना | "मन में वेदना, मस्तक में आँधी, आँखों में पानी की बरसात लिये" |
| ऐतिहासिक यथार्थ के साथ काव्यात्मक वर्णन | धर्मचक्र विहार के खंडहर का वर्णन (देखें भाग 7) |
यह शैली प्रसाद के नाटकों और 'कामायनी' जैसे काव्य में भी मिलती है — भावुकता, संक्षिप्तता और तत्सम शब्दावली का यह संयोजन उनकी पहचान है।
10. कहानी का केंद्रीय भाव
कहानी का शीर्षक 'ममता' दोहरे अर्थ में काम करता है — यह नायिका का नाम भी है और उसके भीतर के वात्सल्य-भाव, करुणा और आतिथ्य-धर्म का भी प्रतीक है। कहानी दिखाती है कि —
- धार्मिक कर्तव्य व्यक्तिगत घृणा से बड़ा हो सकता है। ममता अपने पिता के हत्यारों की जाति के ही एक व्यक्ति को आश्रय देती है, केवल इसलिए कि अतिथि-धर्म उसका अपना मूल्य है, बदले की भावना नहीं।
- इतिहास बड़े नामों को याद रखता है, छोटे बलिदानों को नहीं। अंतिम पंक्ति — "पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं" — यही कहानी का सबसे तीखा सामाजिक भाष्य है। मंदिर हुमायूँ के नाम पर बनता है, उस स्त्री के नाम पर नहीं जिसने उसे शरण दी और जीवन भर वह गुप्त रहस्य छुपाए रखा।
- प्रतीक्षा और मौन त्याग। ममता सैंतालीस वर्ष तक इस घटना का उल्लेख किसी से नहीं करती, और अंतिम श्वास पर ही सत्य कहती है — यह उसके चरित्र की गहराई दिखाता है।
11. गद्यांश-आधारित अभ्यास
गद्यांश। "मैं ब्राह्मणी हूँ, मुझे तो अपने धर्म — अतिथिदेव की उपासना — का पालन करना चाहिए। परन्तु यहाँ... नहीं-नहीं ये सब विधर्मी दया के पात्र नहीं। परन्तु यह दया तो नहीं... कर्तव्य करना है। तब?"
शब्दार्थ। अतिथिदेव — अतिथि को देवता मानने की भारतीय परंपरा। विधर्मी — भिन्न धर्म का व्यक्ति। उपासना — पूजा, पालन।
प्रश्न 1 (2 अंक)। यह पंक्ति किस पात्र के मन की उधेड़बुन दिखाती है, और उसका द्वंद्व क्या है? उत्तर संकेत — ममता के मन की उधेड़बुन — एक ओर पिता के हत्यारों की जाति के प्रति घृणा, दूसरी ओर अतिथि-धर्म का कर्तव्य।
प्रश्न 2 (2 अंक)। ममता अंततः किस निर्णय पर पहुँचती है, और उसका आधार क्या है? उत्तर संकेत — वह मुगल को आश्रय देने का निर्णय लेती है; आधार यह है कि यह दया नहीं, कर्तव्य है — वह ब्राह्मण-कुमारी होने के नाते अपना धर्म नहीं छोड़ेगी, चाहे सामने वाला व्यक्ति कोई भी हो।
प्रश्न 3 (2 अंक)। कहानी के अंत से इस निर्णय का क्या संबंध जुड़ता है? उत्तर संकेत — वह भागा हुआ मुगल वास्तव में हुमायूँ था; ममता का यह कर्तव्य-पालन ही आगे चलकर मुगल सम्राट अकबर द्वारा उस स्थान पर मंदिर बनवाए जाने की घटना से जुड़ जाता है — यद्यपि उस मंदिर पर ममता का नाम कहीं नहीं है।
सारांश
'ममता' जयशंकर प्रसाद की एक ऐतिहासिक कहानी है, जो यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी के गद्य खण्ड (यूनिट 1 ii, 11 अंक, सात पाठों में साझा) में निर्धारित है। यह निबंध नहीं, कहानी है — यह भेद परीक्षा में पूछा जा सकता है।
कहानी तीन कालखंडों में फैली है। पहले भाग में रोहतासगढ़ के पतन में ममता के पिता चूड़ामणि मारे जाते हैं और वह पलायन करती है। दूसरे भाग में काशी के एक खंडहर में वह चौसा-युद्ध से भागे एक मुगल सैनिक को आश्रय देती है — यहाँ घृणा और कर्तव्य का द्वंद्व होता है, और अतिथि-धर्म जीतता है।
तीसरे भाग में, सैंतालीस वर्ष बाद, पता चलता है कि वह सैनिक स्वयं सम्राट हुमायूँ था, और उसके पुत्र अकबर उस स्थान पर एक भव्य मंदिर बनवाते हैं — पर उस मंदिर पर ममता का नाम कहीं नहीं है।
कहानी का केंद्रीय भाव यही है — धार्मिक कर्तव्य व्यक्तिगत घृणा से बड़ा हो सकता है, और इतिहास बड़े नामों को याद रखता है, उन्हें सहारा देने वाले छोटे बलिदानों को नहीं।
परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है
- गद्यांश के प्रश्न किसी भी पाठ से आ सकते हैं। यह अध्याय केवल एक पाठ (ममता) कवर करता है। मित्रता, भारतीय संस्कृति, अजन्ता, क्या लिखूँ, ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से, पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी इसमें नहीं हैं।
- प्रसाद की अन्य कहानियाँ और नाटक। उनके संग्रहों में 'आकाशदीप', 'पुरस्कार' जैसी अन्य प्रसिद्ध कहानियाँ भी हैं, और 'स्कंदगुप्त', 'अजातशत्रु' जैसे नाटक भी — पर पाठ्यक्रम में इस यूनिट के लिए केवल 'ममता' निर्धारित है।
- कामायनी का विश्लेषण। प्रसाद का महाकाव्य 'कामायनी' छायावाद और उच्चतर कक्षाओं में पढ़ाया जाता है; कक्षा-10 के इस पाठ्यक्रम का विषय नहीं है।
