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  • 1हिन्दी साहित्य के चारों कालों के नाम, दूसरे नाम और संवत् सीमाएँ बताना
  • 2संवत् में से 57 घटाकर ईस्वी वर्ष निकालना
  • 3बताना कि शुक्ल जी ने काल-विभाजन किस आधार पर किया — जनता की चित्तवृत्ति
  • 4रीतिकाल के नामकरण का कारण लक्षण-उदाहरण पद्धति के रूप में समझाना
  • 5अंतर करना कि काव्यांग निरूपण केशवदास ने किया पर अखंड परंपरा चिन्तामणि त्रिपाठी से चली
  • 6रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त धाराओं में कवियों को सही रखना
  • 7बताना कि शुक्ल जी ने रीतिकालीन लक्षण-ग्रंथकारों को आचार्य क्यों नहीं माना
  • 8आधुनिक काल का दूसरा नाम गद्यकाल क्यों पड़ा, यह कारण सहित बताना
  • 9तीनों उत्थानों की संवत् सीमाएँ और उनके बोर्ड-प्रचलित युग-नाम मिलाना
  • 10मैथिलीशरण गुप्त सहित द्विवेदी मंडल के कवियों को सही युग में रखना
  • 11छायावाद के दोनों अर्थ बताना और उसकी मुख्य विशेषताएँ गिनाना
  • 12यह जानना कि शुक्ल जी का ग्रंथ 1927 ई0 पर समाप्त होता है, इसलिए प्रगतिवाद और प्रयोगवाद उसमें नहीं हैं
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Why this chapter matters
पाँच अंक, पाँच प्रश्न, और सब बहुविकल्पीय — इस यूनिट में पूरा अंक लाना सबसे आसान है, बशर्ते कवि-कृति-काल का ढाँचा साफ हो। यह अध्याय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अपने ग्रंथ से लिखा गया है, गाइड से नहीं — इसलिए यहाँ वे बातें भी हैं जो शुक्ल जी ने स्वयं कहीं और अधिकांश पुस्तकों से छूट जाती हैं।

हिन्दी पद्य साहित्य का विकास — रीतिकाल एवं आधुनिक काल

"प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।" — आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, 'काल विभाग' का पहला वाक्य

1. इस अध्याय में क्या है

यह पूरा अध्याय यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 हिन्दी, यूनिट 2 (i) है। पाठ्यक्रम की पंक्ति शब्दशः यह है —

"हिन्दी पद्य के विकास का संक्षिप्त परिचय (रीतिकाल एवं आधुनिककाल) — 5×1=5"

तीन बातें इस एक पंक्ति में छिपी हैं, और तीनों परीक्षा में काम आती हैं।

पाठ्यक्रम कहता हैइसका अर्थ
केवल दो कालआदिकाल और भक्तिकाल कक्षा-10 के पद्य-इतिहास में नहीं हैं
5×1=5पाँच प्रश्न, हर एक 1 अंक का, सब बहुविकल्पीय — खण्ड-अ में, ओ0एम0आर0 शीट पर
"संक्षिप्त परिचय"कवि-कृति-काल का ढाँचा पूछा जाता है, आलोचना नहीं

अध्याय का क्रम यह है —

भागविषय
2शुक्ल जी ने काल बाँटे किस आधार पर
3चारों काल और उनकी सीमाएँ
4-7रीतिकाल — नामकरण, आरंभ, तीन धाराएँ, प्रमुख कवि
8शुक्ल जी की वह आलोचना जो प्रायः छूट जाती है
9-11आधुनिक काल — तीन उत्थान, द्विवेदी युग, छायावाद
12छायावाद के बाद — और वह सीमा जहाँ शुक्ल जी की पुस्तक समाप्त होती है

एक बात पहले ही स्पष्ट कर दें। आगे जहाँ भी उद्धरण चिह्नों में वाक्य आया है, वह शुक्ल जी का अपना वाक्य है, उनके ग्रंथ हिन्दी साहित्य का इतिहास (नागरी प्रचारिणी सभा, काशी) से। जहाँ बात उनके ग्रंथ के बाहर की है, वहाँ ऐसा लिखा गया है।

2. काल बाँटने का आधार — चित्तवृत्ति

अधिकांश पुस्तकें सीधे चार कालों के नाम गिना देती हैं। शुक्ल जी पहले यह बताते हैं कि बाँटा किस आधार पर जाए, और वही उनका पूरा सिद्धांत है।

"जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है।"

इससे तीन बातें निकलती हैं —

  • साहित्य बदलता है क्योंकि जनता की चित्तवृत्ति बदलती है।
  • चित्तवृत्ति बदलती है क्योंकि परिस्थिति बदलती है।
  • इसलिए इतिहास लिखते समय परिस्थिति का "किंचित् दिग्दर्शन भी साथ ही साथ आवश्यक होता है।"

और नाम कैसे पड़ा? शुक्ल जी का नियम सीधा है — जिस काल में जिस प्रकार की रचना सबसे अधिक हुई, नाम उसी पर। पर वे तुरंत एक चेतावनी भी जोड़ते हैं, और यही चेतावनी परीक्षा में सबसे अधिक भुलाई जाती है —

"यह न समझना चाहिए कि किसी विशेष काल में और प्रकार की रचनाएँ होती ही नहीं थीं।"

रीतिकाल में भी वीर रस के काव्य मिलते हैं। भूषण उसी रीतिकाल के कवि हैं। नाम प्रधान प्रवृत्ति का सूचक है, सीमा-रेखा नहीं।

3. चार काल — सीमाएँ याद रखने योग्य

शुक्ल जी हिन्दी साहित्य के लगभग 900 वर्षों को चार कालों में बाँटते हैं। संवत् उनके ग्रंथ के हैं; ईस्वी वर्ष संवत् − 57 से निकलता है।

हिन्दी साहित्य के चार काल (संवत्) आदिकाल वीरगाथाकाल पूर्व मध्यकाल भक्तिकाल उत्तर मध्यकाल रीतिकाल आधुनिक काल गद्यकाल 1050 1375 1700 1900 1984 993 ई0 1318 ई0 1643 ई0 1843 ई0 1927 ई0 कक्षा-10 के पाठ्यक्रम में केवल ये दो कक्षा-10 में नहीं
कालदूसरा नामसंवत्ईस्वीकक्षा-10 में?
आदिकालवीरगाथाकाल1050–1375993–1318नहीं
पूर्व मध्यकालभक्तिकाल1375–17001318–1643नहीं
उत्तर मध्यकालरीतिकाल1700–19001643–1843हाँ
आधुनिक कालगद्यकाल1900–19841843–1927हाँ

दो जोड़ी नाम, और दोनों पूछे जाते हैं। "उत्तर मध्यकाल" और "रीतिकाल" एक ही काल के दो नाम हैं — पहला स्थिति बताता है, दूसरा प्रवृत्ति। यही "आधुनिक काल" और "गद्यकाल" के साथ है। प्रश्न किसी भी नाम से आ सकता है।

4. रीतिकाल — नाम क्यों पड़ा

'रीति' का अर्थ यहाँ काव्य-रचना की शास्त्रीय पद्धति है — रस, अलंकार, नायिका-भेद, छंद के लक्षण और उनके उदाहरण। इस काल के कवियों ने कविता लिखने का एक निश्चित ढाँचा बना लिया, और शुक्ल जी उस ढाँचे का वर्णन बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में करते हैं —

"कवियों ने कविता लिखने का यह एक प्रणाली ही बना ली कि पहले दोहे में अलंकार या रस का लक्षण लिखना, फिर उसके उदाहरण के रूप में कवित्त या सवैया लिखना।"

इसी लक्षण-उदाहरण पद्धति के कारण काल का नाम रीतिकाल पड़ा। दो पंक्ति में परिभाषा, फिर उसी का एक सुंदर उदाहरण — पूरे दो सौ वर्ष की कविता इसी साँचे में ढली।

5. रीतिपरंपरा का आरंभ — केशव नहीं, चिन्तामणि

यह इस अध्याय का सबसे अधिक गलत उत्तर दिया जाने वाला प्रश्न है, इसलिए इसे धीरे से पढ़िए।

केशवदास ने सबसे पहले काव्य के सभी अंगों का शास्त्रीय निरूपण किया — इस पर शुक्ल जी को कोई संदेह नहीं —

"इसमें संदेह नहीं कि काव्यशास्त्र का सम्यक् समावेश पहले पहल आचार्य केशव ने ही किया।"

पर परंपरा उनसे नहीं चली। शुक्ल जी की अगली ही पंक्ति यह है —

"केशवदास के उपरांत तत्काल रीतिग्रंथों की परंपरा चली नहीं।"

रीतिग्रंथों की अखंड परंपरा आरंभ हुई केशव के लगभग पचास वर्ष बाद, चिन्तामणि त्रिपाठी से, संवत् 1700 के आसपास। शुक्ल जी के शब्दों में परंपरा "चिन्तामणि त्रिपाठी से चली" और "आरंभ उन्हीं से मानना चाहिए।"

प्रश्नउत्तर
काव्यांग निरूपण सबसे पहले किसने किया?केशवदास
रीतिग्रंथों की अखंड परंपरा किससे आरंभ हुई?चिन्तामणि त्रिपाठी
दोनों के बीच कितना अंतर?लगभग 50 वर्ष

और परंपरा केशव के आदर्श पर चली भी नहीं। शुक्ल जी कहते हैं वह चली "एक भिन्न आदर्श को लेकर, केशव के आदर्श को लेकर नहीं।" कारण यह है, और यह सूक्ष्म है —

  • केशव ने सामग्री ली संस्कृत के पुराने आचार्यों से — भामह और उद्भट — जिनके समय "अलंकार और अलंकार्य का स्पष्ट भेद नहीं हुआ था।"
  • बाद के हिन्दी रीतिकार चले परवर्ती ग्रंथों पर — मुख्यतः चंद्रालोक और कुवलयानंद — जहाँ यह भेद हो चुका था।

इसी से शुक्ल जी वह वाक्य लिखते हैं जो पूरे रीतिकाल को एक पंक्ति में समेट देता है —

"इस प्रकार दैवयोग से संस्कृत साहित्यशास्त्र के इतिहास की संक्षिप्त उद्धरणी हिन्दी में हो गई।"

अर्थात् हिन्दी में संस्कृत काव्यशास्त्र का पूरा विकास-क्रम दोबारा, छोटे रूप में, दोहरा दिया गया।

"कठिन काव्य का प्रेत" — एक ज़रूरी सावधानी। बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र में प्रश्न है कि केशव को 'कठिन काव्य का प्रेत' किसने कहा, और विकल्प हैं रामचन्द्र शुक्ल, ग्रियर्सन, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मिश्रबंधु। परीक्षा में उत्तर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अंकित कीजिए — यही सर्वत्र पढ़ाया जाता है।

पर एक बात साफ़ रहनी चाहिए: यह वाक्य शुक्ल जी के हिन्दी साहित्य का इतिहास में नहीं है। दोनों उपलब्ध संस्करणों का पूरा पाठ खोजने पर यह पदबंध एक बार भी नहीं मिलता। उस ग्रंथ में केशव पर उनका निर्णय इन शब्दों में है —

"केशव को कविहृदय नहीं मिला था। उनमें वह सहृदयता और भावुकता न थी।"

अर्थ दोनों का एक ही है — केशव पंडित थे, कवि नहीं — और इसी कारण यह उपाधि शुक्ल जी के नाम के साथ जुड़ गई। पर यदि कोई पूछे कि यह वाक्य उनकी किस पुस्तक के किस पृष्ठ पर है, तो सही उत्तर यह है कि इतिहास में नहीं है, और उसका मूल-स्रोत इस अध्याय के लिए सिद्ध नहीं किया जा सका।

6. रीतिकाल की तीन धाराएँ

रीतिकाल के सब कवि लक्षण-ग्रंथ लिखने वाले नहीं थे। परंपरा से उनके संबंध के आधार पर तीन धाराएँ बनती हैं।

रीतिकाल की तीन धाराएँ रीतिबद्ध लक्षण + उदाहरण दोनों केशवदास चिन्तामणि त्रिपाठी देव मतिराम भिखारीदास रीतिसिद्ध रीति जानते, ग्रंथ नहीं लिखा बिहारी लाल रसनिधि कक्षा-10 के पद्य खण्ड में बिहारी निर्धारित हैं रीतिमुक्त बंधन से मुक्त, स्वच्छंद घनानंद बोधा आलम ठाकुर तीनों एक ही काल के हैं — अंतर परंपरा से संबंध का है, समय का नहीं श्रृंगार तीनों में प्रधान रस है
धारापहचानप्रमुख कवि
रीतिबद्धलक्षण भी लिखा, उदाहरण भीकेशवदास, चिन्तामणि त्रिपाठी, देव, मतिराम, भिखारीदास
रीतिसिद्धरीति में सिद्ध, पर लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखाबिहारी लाल, रसनिधि
रीतिमुक्तपरंपरा के बंधन से मुक्त, स्वच्छंद प्रेम-काव्यघनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर

यह वर्गीकरण शुक्ल जी के ग्रंथ का शब्द नहीं है — 'रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त' नाम बाद के आलोचकों के दिए हुए हैं। पर विभाजन जिस बात पर टिका है — कौन लक्षण-ग्रंथ लिखता है और कौन नहीं — वह शुक्ल जी के विवेचन से सीधा निकलता है, और परीक्षा में यही तीन नाम पूछे जाते हैं।

यहाँ आपके अपने पाठ्यक्रम से एक जोड़ है। कक्षा-10 के पद्य खण्ड में बिहारी लाल की 'भक्ति, नीति' निर्धारित है। बिहारी रीतिसिद्ध धारा के कवि हैं — उन्होंने कोई लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा, केवल 'सतसई' के दोहे लिखे। इतिहास वाला यह प्रश्न और पद्य खण्ड वाला वह कवि एक ही व्यक्ति हैं।

7. रीतिकाल के प्रमुख कवि और ग्रंथ

कविप्रसिद्ध ग्रंथधारा
केशवदासकविप्रिया, रसिकप्रिया, रामचंद्रिकारीतिबद्ध
चिन्तामणि त्रिपाठीकविकुलकल्पतरु, काव्यप्रकाशरीतिबद्ध
बिहारी लालबिहारी सतसईरीतिसिद्ध
मतिरामरसराज, ललितललामरीतिबद्ध
देवभावविलास, रसविलासरीतिबद्ध
भूषणशिवराजभूषण, शिवाबावनी, छत्रसालदशकवीर रस
घनानंदसुजानहितरीतिमुक्त
पद्माकरजगद्विनोद, पद्माभरणरीतिबद्ध

भूषण को ध्यान से देखिए। वे रीतिकाल के कवि हैं, पर उनका रस वीर है, श्रृंगार नहीं। यही शुक्ल जी की उस चेतावनी का जीवित उदाहरण है कि काल का नाम प्रधान प्रवृत्ति बताता है, सबकी सीमा नहीं।

चिन्तामणि के ग्रंथों पर एक ईमानदार टिप्पणी। शुक्ल जी लिखते हैं कि चिन्तामणि ने "तीन ग्रंथ" लिखे, पर हमारे पास जो प्रति है उसमें तीसरे का नाम स्पष्ट नहीं पढ़ा जा सकता। ऊपर की तालिका में इसीलिए दो ही नाम दिए गए हैं। जो नाम पढ़ा नहीं जा सका, वह यहाँ अनुमान से नहीं भरा गया।

8. शुक्ल जी की आलोचना — कवि थे, आचार्य नहीं

यह भाग अधिकांश पुस्तकों से गायब रहता है, और यही शुक्ल जी का असली योगदान है। उन्होंने रीतिकाल के इन सैकड़ों लक्षण-ग्रंथकारों पर एक कठोर निर्णय दिया —

"हिन्दी में लक्षण-ग्रंथ की परिपाटी पर रचना करने वाले जो सैकड़ों कवि हुए, वे आचार्य कोटि में नहीं आ सकते। वे वास्तव में कवि ही थे। उनमें आचार्यत्व के गुण नहीं थे।"

क्यों नहीं? क्योंकि उन्होंने काव्यांगों का विस्तृत विवेचन नहीं किया, तर्क से खंडन-मंडन नहीं किया, नए सिद्धांत नहीं गढ़े। एक दोहे में अधूरा लक्षण देकर वे कविकर्म में लग जाते थे।

और इसका कारण शुक्ल जी ऐसा देते हैं जो पूरी तरह अप्रत्याशित है —

"इसका कारण यह भी था कि उस समय गद्य का विकास नहीं हुआ था। जो कुछ लिखा जाता था वह पद्य में ही लिखा जाता था। पद्य में किसी बात की सम्यक् मीमांसा या उसपर तर्क-वितर्क हो नहीं सकता।"

इस एक तर्क को समझ लीजिए, क्योंकि यह दोनों कालों को जोड़ देता है —

  • रीतिकाल में आलोचना नहीं हो सकी क्योंकि गद्य नहीं था।
  • अगला काल गद्यकाल कहलाता है।

रीतिकाल की सबसे बड़ी कमी ही आधुनिक काल की सबसे बड़ी उपलब्धि है। दोनों काल एक ही कारण से आमने-सामने खड़े हैं।

9. आधुनिक काल — गद्यकाल क्यों

आधुनिक काल की सीमा संवत् 1900 से 1984 (1843–1927 ई0) है, और शुक्ल जी ने इसका दूसरा नाम गद्यकाल रखा।

नाम पद्य पर नहीं, गद्य पर पड़ा — इसमें एक विरोधाभास लगता है, पर कारण सीधा है। इस काल की सबसे बड़ी घटना पद्य में कुछ होना नहीं, बल्कि खड़ी बोली गद्य का जन्म और उसका साहित्यिक भाषा बन जाना है। निबंध, नाटक, उपन्यास, आलोचना, पत्र-पत्रिका — ये सब इसी काल में आए। इससे पहले हिन्दी में जो कुछ लिखा जाता था, वह लगभग सारा पद्य में था।

और भाषा भी बदली। रीतिकाल तक काव्य की भाषा ब्रजभाषा थी। आधुनिक काल में कविता धीरे-धीरे खड़ी बोली में आई। यह परिवर्तन एक दिन में नहीं हुआ — शुक्ल जी बताते हैं कि लंबे समय तक दोनों साथ-साथ चलीं।

10. आधुनिक काल के तीन उत्थान

यह अध्याय का सबसे उपयोगी भाग है, और सबसे कम जाना हुआ। शुक्ल जी ने आधुनिक काल को 'युग' में नहीं, उत्थान में बाँटा है।

शुक्ल जी के तीन उत्थान — और बोर्ड के युग-नाम प्रथम उत्थान सं0 1925–1950 1868–1893 ई0 खड़ी बोली गद्य का प्रवर्तन द्वितीय उत्थान सं0 1950–1975 1893–1918 ई0 खड़ी बोली काव्य में आई तृतीय उत्थान सं0 1975 से 1918 ई0 से छायावाद भारतेंदु युग भारतेंदु हरिश्चंद्र द्विवेदी युग महावीर प्रसाद द्विवेदी शुक्ल युग छायावाद का युग शुक्ल जी की पुस्तक संवत् 1984 (1927 ई0) पर समाप्त हो जाती है इसके बाद का 'शुक्लोत्तर युग' उनके ग्रंथ के बाहर है
उत्थानसंवत्ईस्वीबोर्ड का नाममुख्य बात
प्रथम1925–19501868–1893भारतेंदु युगखड़ी बोली गद्य का प्रवर्तन
द्वितीय1950–19751893–1918द्विवेदी युगकविता खड़ी बोली में आई
तृतीय1975 से1918 सेशुक्ल युगछायावाद

यहाँ वह बात है जिसका उत्तर कहीं और नहीं मिलेगा। आपका पाठ्यक्रम गद्य के लिए 'शुक्ल युग तथा शुक्लोत्तर युग' नाम देता है। ये नाम शुक्ल जी ने नहीं रखे।

उनके नाम पर वे बाद के आलोचकों ने रखे — और स्वाभाविक ही है कि कोई अपने नाम पर युग का नाम नहीं रखता। शुक्ल जी की अपनी शब्दावली 'तृतीय उत्थान' है, और वह संवत् 1975 यानी 1918 ई0 से आरंभ होती है। इसीलिए शुक्ल युग की तिथि 1918 से मानी जाती है — तिथि उनकी अपनी दी हुई है, नाम भले न हो।

द्वितीय उत्थान के कवि — शुक्ल जी क्रम से गिनाते हैं: श्रीधर पाठक, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध', महावीर प्रसाद द्विवेदी, और फिर "द्विवेदी मंडल के कवि"। मैथिलीशरण गुप्त इसी द्विवेदी मंडल के कवि हैं — और कक्षा-10 के पद्य खण्ड में उनकी 'भारतमाता का मंदिर यह' निर्धारित है। मॉडल प्रश्नपत्र में सीधा प्रश्न आया है: "मैथिलीशरण गुप्त किस युग से सम्बन्धित हैं?" उत्तर द्विवेदी युग है।

11. छायावाद — शुक्ल जी की दृष्टि से

छायावाद तृतीय उत्थान की प्रधान काव्यधारा है, और मॉडल प्रश्नपत्र में इसकी 'मुख्य विशेषता' सीधे पूछी गई है। इसलिए इसे ठीक से देखिए।

शुक्ल जी छायावाद पर तीन बातें कहते हैं, और तीनों काम की हैं —

पहली — शब्द का प्रयोग ही ढीला रहा। उनके ग्रंथ की विषय-सूची में पंक्ति है: "'छायावाद' शब्द का अनेकार्थी प्रयोग।" यानी अलग-अलग लोगों ने इसे अलग-अलग अर्थ में चलाया।

दूसरी — इसके दो अर्थ हैं, और शुक्ल जी छायावादी कवियों का वर्गीकरण भी इन्हीं दो अर्थों के अनुसार करते हैं —

अर्थआशय
संकुचित अर्थरहस्यवाद — अज्ञात, अनंत सत्ता के प्रति प्रेम और जिज्ञासा
व्यापक अर्थकाव्य-शैली की वह पद्धति जिसमें भाव चित्रात्मक और लाक्षणिक ढंग से, प्रतीकों के सहारे कहा जाता है

तीसरी — वे इसे भारतीय काव्य-परंपरा से अलग मानते हैं। उनकी विषय-सूची की पंक्ति है: "भारतीय काव्यधारा से इनका पार्थक्य", और आगे यूरोप के वादों को हिन्दी में चलाने की "अनधिकार चेष्टा" तक कही गई है। शुक्ल जी छायावाद के प्रशंसक नहीं थे — यह जानना आवश्यक है, क्योंकि आज की पुस्तकें छायावाद की प्रशंसा में लिखी जाती हैं।

छायावाद की पहचान — प्रकृति का मानवीकरण, वैयक्तिक अनुभूति की प्रधानता, श्रृंगार का सूक्ष्म और आध्यात्मिक रूप, लाक्षणिक और चित्रमय भाषा, तथा खड़ी बोली का काव्य-भाषा के रूप में पूर्ण विकास।

चार स्तंभ — जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा।

और आपके अपने पाठ्यक्रम से जोड़ लीजिए। कक्षा-10 के पद्य खण्ड में सुमित्रानंदन पंत ('चींटी', 'चन्द्रलोक में प्रथम बार') और महादेवी वर्मा ('हिमालय से', 'वर्षा सुन्दरी के प्रति') निर्धारित हैं। गद्य खण्ड में जयशंकर प्रसाद ('ममता') हैं। छायावाद के चार में से तीन आपकी पाठ्यपुस्तक में हैं — इतिहास वाला यह भाग और आपके पाठ अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं।

12. जहाँ शुक्ल जी की पुस्तक समाप्त होती है

एक सीमा स्पष्ट कर देनी चाहिए, क्योंकि इसे न कहना छात्र को धोखा देना होगा।

शुक्ल जी की पुस्तक संवत् 1984, यानी 1927 ई0 तक ही जाती है। उसके बाद हिन्दी कविता में जो हुआ — प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता — उस पर उनके ग्रंथ में कुछ नहीं है, और हो भी नहीं सकता था।

तो इस अध्याय की सीमा यह है —

विषयशुक्ल जी के ग्रंथ में?
रीतिकाल का पूरा विवेचनहाँ, विस्तार से
भारतेंदु युग, द्विवेदी युगहाँ, प्रथम और द्वितीय उत्थान के रूप में
छायावाद का प्रारंभ और स्वरूपहाँ, तृतीय उत्थान में
प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कवितानहीं — ग्रंथ की सीमा के बाद

और बोर्ड इससे आगे भी पूछता है। यह मान लेना कि कक्षा-10 में छायावाद तक ही पूछा जाएगा, ठीक नहीं। बोर्ड के अपने मॉडल प्रश्नपत्र का पहला ही प्रश्न है — "'दूसरा सप्तक' प्रकाशित हुआ—" और उसके चार विकल्प हैं 1943, 1951, 1959, 1979। यह प्रयोगवाद है, छायावाद के बाद का, और शुक्ल जी के ग्रंथ से बाहर।

13. सप्तक — चार अंक, चार वर्ष

'सप्तक' अज्ञेय द्वारा संपादित कविता-संकलनों की श्रृंखला है। हर संकलन में सात कवि होते हैं, इसी से नाम 'सप्तक' पड़ा। यही प्रयोगवाद और नई कविता का आरंभ-बिंदु माना जाता है।

संकलनप्रकाशन वर्ष
तार सप्तक1943
दूसरा सप्तक1951
तीसरा सप्तक1959
चौथा सप्तक1979

ये चारों वर्ष एक साथ याद कीजिए। मॉडल प्रश्नपत्र में विकल्प ठीक यही चार वर्ष थे — अर्थात् प्रश्न यह जाँचता है कि आपको क्रम याद है या नहीं, न कि कोई एक तिथि। जिस सप्तक का नाम पूछा जाए, उसका क्रमांक गिनिए और तालिका से वर्ष उठाइए।

पर गद्य का 'शुक्लोत्तर युग' इस ग्रंथ के बाहर है — वह यूनिट 1 का विषय है और उसके लिए दूसरे स्रोत चाहिए।

सारांश

  • साहित्य "जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब" है — शुक्ल जी के काल-विभाजन का यही आधार है।
  • चार काल: आदिकाल (सं0 1050–1375), भक्तिकाल (1375–1700), रीतिकाल (1700–1900), आधुनिक काल (1900–1984)।
  • कक्षा-10 के पद्य-इतिहास में केवल अंतिम दो हैं; ईस्वी वर्ष संवत् में से 57 घटाकर मिलता है।
  • रीतिकाल का दूसरा नाम उत्तर मध्यकाल; आधुनिक काल का दूसरा नाम गद्यकाल।
  • नाम प्रधान प्रवृत्ति का सूचक है — रीतिकाल में भी भूषण जैसे वीर रस के कवि हैं।
  • रीतिकाल का नाम लक्षण-उदाहरण पद्धति से पड़ा: दोहे में लक्षण, फिर कवित्त या सवैया में उदाहरण।
  • काव्यांग निरूपण पहले केशवदास ने किया, पर अखंड परंपरा लगभग 50 वर्ष बाद चिन्तामणि त्रिपाठी से चली।
  • केशव ने भामह-उद्भट से सामग्री ली; बाद के रीतिकार चंद्रालोक और कुवलयानंद पर चले।
  • तीन धाराएँ: रीतिबद्ध (केशव, चिन्तामणि, देव, मतिराम), रीतिसिद्ध (बिहारी), रीतिमुक्त (घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर)।
  • शुक्ल जी का निर्णय: ये "वास्तव में कवि ही थे, उनमें आचार्यत्व के गुण नहीं थे।"
  • कारण: गद्य विकसित नहीं था, और "पद्य में किसी बात की सम्यक् मीमांसा हो नहीं सकती।"
  • आधुनिक काल गद्यकाल कहलाया क्योंकि खड़ी बोली गद्य इसी में जन्मा और साहित्यिक भाषा बना।
  • तीन उत्थान: प्रथम सं0 1925–1950 (भारतेंदु), द्वितीय 1950–1975 (द्विवेदी), तृतीय 1975 से (छायावाद)।
  • 'शुक्ल युग' नाम बाद का है; शुक्ल जी की अपनी शब्दावली 'तृतीय उत्थान' है, जो 1918 ई0 से आरंभ होती है।
  • मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी मंडल के कवि हैं — इसलिए द्विवेदी युग के।
  • छायावाद के दो अर्थ: संकुचित में रहस्यवाद, व्यापक में लाक्षणिक-चित्रात्मक शैली।
  • छायावाद के चार स्तंभ: प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी — इनमें तीन कक्षा-10 की पाठ्यपुस्तक में हैं।
  • शुक्ल जी छायावाद के प्रशंसक नहीं थे; उन्होंने इसे भारतीय काव्यधारा से पृथक् माना।
  • उनका ग्रंथ 1927 ई0 पर समाप्त होता है — प्रगतिवाद और प्रयोगवाद उसमें नहीं हैं।

परिशिष्ट — क्या इस अध्याय का नहीं है

कक्षा-10 के पद्य-इतिहास में कई ऐसी बातें पूछी हुई मान ली जाती हैं जो वास्तव में पाठ्यक्रम में हैं ही नहीं। समय बचाइए —

विषयकहाँ का है
आदिकाल, वीरगाथा काल, पृथ्वीराज रासोकक्षा-10 के पद्य-इतिहास में नहीं
भक्तिकाल की चार शाखाएँ, कबीर, जायसीकक्षा-10 के पद्य-इतिहास में नहीं
भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, शुक्ल युग का गद्ययूनिट 1 (i) — गद्य साहित्य का इतिहास
रस, अलंकार, छन्द के लक्षणयूनिट 2 (iv) — काव्य सौन्दर्य के तत्व
सूरदास, तुलसीदास, बिहारी की कविताएँपद्य खण्ड के निर्धारित पाठ, इतिहास नहीं
कवियों का विस्तृत जीवन परिचयखण्ड-ब प्रश्न 6 (ख) — 3+2=5 अंक

एक अंतर जो बार-बार भ्रम पैदा करता है। 'भक्तिकाल' पद्य-इतिहास में नहीं है, पर सूरदास और तुलसीदास आपके पद्य खण्ड में निर्धारित पाठ हैं। उनकी कविता पढ़नी है और उनका जीवन परिचय भी लिखना है — पर भक्तिकाल का इतिहास खण्ड-अ में नहीं पूछा जाएगा। पाठ अलग, इतिहास अलग।

Key formulas & results

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काल-विभाजन का आधार
साहित्य = जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब
शुक्ल जी के 'काल विभाग' अध्याय का पहला वाक्य
संवत् से ईस्वी
ईस्वी = संवत् − 57
सं0 1900 − 57 = 1843 ई0। हर तिथि इसी से मिलाइए
आदिकाल
वीरगाथाकाल · संवत् 1050–1375 · 993–1318 ई0
कक्षा-10 के पद्य-इतिहास में नहीं
पूर्व मध्यकाल
भक्तिकाल · संवत् 1375–1700 · 1318–1643 ई0
कक्षा-10 के पद्य-इतिहास में नहीं
उत्तर मध्यकाल
रीतिकाल · संवत् 1700–1900 · 1643–1843 ई0
पाठ्यक्रम में है। दोनों नामों से प्रश्न आता है
आधुनिक काल
गद्यकाल · संवत् 1900–1984 · 1843–1927 ई0
पाठ्यक्रम में है। नाम गद्य पर पड़ा, पद्य पर नहीं
रीतिकाल का नामकरण
दोहे में लक्षण → कवित्त या सवैया में उदाहरण
इसी लक्षण-उदाहरण पद्धति से नाम पड़ा
काव्यांग निरूपण सबसे पहले
केशवदास
शुक्ल जी: 'काव्यशास्त्र का सम्यक् समावेश पहले पहल आचार्य केशव ने ही किया'
रीतिपरंपरा का वास्तविक आरंभ
चिन्तामणि त्रिपाठी, संवत् 1700 के आसपास
केशव से लगभग 50 वर्ष बाद। यही सबसे अधिक गलत होने वाला उत्तर है
केशव का स्रोत बनाम बाद के रीतिकारों का
केशव → भामह, उद्भट · बाद के → चंद्रालोक, कुवलयानंद
इसीलिए परंपरा 'एक भिन्न आदर्श को लेकर' चली
रीतिकाल की तीन धाराएँ
रीतिबद्ध · रीतिसिद्ध · रीतिमुक्त
क्रमशः लक्षण-ग्रंथ लिखने वाले, न लिखने वाले, और बंधन से मुक्त
शुक्ल जी का निर्णय रीतिकवियों पर
वे कवि थे, आचार्य नहीं
कारण — गद्य विकसित नहीं था, और पद्य में मीमांसा हो नहीं सकती
प्रथम उत्थान
संवत् 1925–1950 · 1868–1893 ई0 · भारतेंदु युग
खड़ी बोली गद्य का प्रवर्तन
द्वितीय उत्थान
संवत् 1950–1975 · 1893–1918 ई0 · द्विवेदी युग
श्रीधर पाठक, हरिऔध, महावीर प्रसाद द्विवेदी, द्विवेदी मंडल
तृतीय उत्थान
संवत् 1975 से · 1918 ई0 से · शुक्ल युग
छायावाद। 'शुक्ल युग' नाम बाद का है, शुक्ल जी का अपना शब्द 'तृतीय उत्थान' है
छायावाद के दो अर्थ
संकुचित = रहस्यवाद · व्यापक = लाक्षणिक-चित्रात्मक शैली
शुक्ल जी इन्हीं दो अर्थों के अनुसार छायावादी कवियों का वर्गीकरण करते हैं
छायावाद के चार स्तंभ
प्रसाद · निराला · पंत · महादेवी
इनमें प्रसाद, पंत और महादेवी आपकी अपनी पाठ्यपुस्तक में हैं
सप्तक के चार वर्ष
तार 1943 · दूसरा 1951 · तीसरा 1959 · चौथा 1979
मॉडल प्रश्नपत्र के विकल्प ठीक यही चार वर्ष थे — क्रम याद रखिए, तिथि नहीं
⚠️

Common mistakes & fixes

These are the exact errors that cost students marks in board exams. Read them once, save yourself the trouble.

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रीतिपरंपरा का आरंभ केशवदास से बताना
काव्यांग निरूपण केशवदास ने पहले किया, पर परंपरा उनसे नहीं चली। शुक्ल जी स्पष्ट लिखते हैं — 'केशवदास के उपरांत तत्काल रीतिग्रंथों की परंपरा चली नहीं।' अखंड परंपरा लगभग 50 वर्ष बाद चिन्तामणि त्रिपाठी से आरंभ हुई। प्रश्न में 'सबसे पहले निरूपण' है तो केशव, 'अखंड परंपरा का आरंभ' है तो चिन्तामणि।
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रीतिकाल की सीमा संवत् 1700–1900 की जगह ईस्वी 1700–1900 लिख देना
ये संवत् हैं, ईस्वी नहीं। ईस्वी में यह काल 1643–1843 है। हर बार 57 घटाइए। संवत् और ईस्वी मिला देने से दो सौ वर्ष की गलती हो जाती है और पूरा उत्तर बदल जाता है।
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आधुनिक काल का दूसरा नाम 'छायावाद काल' या 'खड़ी बोली काल' लिखना
शुक्ल जी ने इसका नाम गद्यकाल रखा। छायावाद इस काल की एक धारा है, पूरे काल का नाम नहीं — वह तृतीय उत्थान में आता है। दूसरा नाम पूछा जाए तो उत्तर गद्यकाल ही है।
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बिहारी को रीतिबद्ध कवि बताना
बिहारी रीतिसिद्ध हैं। उन्होंने कोई लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा, केवल 'बिहारी सतसई' के दोहे लिखे। रीतिबद्ध वे हैं जिन्होंने लक्षण और उदाहरण दोनों लिखे — केशव, चिन्तामणि, देव, मतिराम, भिखारीदास।
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घनानंद को रीतिबद्ध या रीतिसिद्ध धारा में रखना
घनानंद रीतिमुक्त हैं — परंपरा के बंधन से मुक्त, स्वच्छंद प्रेम-काव्य लिखने वाले। इसी धारा में बोधा, आलम और ठाकुर आते हैं। 'मुक्त' शब्द ही संकेत है: बंधन से मुक्त।
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मैथिलीशरण गुप्त को छायावादी युग का कवि बताना
वे द्विवेदी युग के हैं, द्विवेदी मंडल के कवि के रूप में। शुक्ल जी द्वितीय उत्थान में श्रीधर पाठक, हरिऔध और महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद 'द्विवेदी मंडल के कवि' गिनाते हैं। यह प्रश्न आधिकारिक मॉडल प्रश्नपत्र में सीधे आ चुका है।
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यह मानना कि रीतिकाल में केवल श्रृंगार रस की रचनाएँ हुईं
शुक्ल जी स्वयं चेतावनी देते हैं — 'यह न समझना चाहिए कि किसी विशेष काल में और प्रकार की रचनाएँ होती ही नहीं थीं।' भूषण इसी रीतिकाल के कवि हैं और उनका रस वीर है। काल का नाम प्रधान प्रवृत्ति बताता है, सीमा नहीं।
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'शुक्ल युग' नाम शुक्ल जी का दिया हुआ मान लेना
कोई अपने नाम पर युग का नाम नहीं रखता। शुक्ल जी की अपनी शब्दावली 'तृतीय उत्थान' है, जो संवत् 1975 यानी 1918 ई0 से आरंभ होती है। 'शुक्ल युग' और 'शुक्लोत्तर युग' नाम बाद के आलोचकों के हैं।
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छायावाद की मुख्य विशेषता 'युद्धों का वर्णन' या 'भक्ति की प्रधानता' चुनना
छायावाद की पहचान प्रकृति का मानवीकरण, वैयक्तिक अनुभूति, सूक्ष्म और लाक्षणिक भाषा तथा खड़ी बोली का पूर्ण काव्य-विकास है। युद्ध-वर्णन वीरगाथाकाल की प्रवृत्ति है और भक्ति की प्रधानता भक्तिकाल की — दोनों विकल्प दूसरे कालों से उठाकर रखे जाते हैं।
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उत्तर में प्रगतिवाद, प्रयोगवाद या नई कविता का विवरण जोड़ना
पाठ्यक्रम 'रीतिकाल एवं आधुनिककाल' कहता है और कक्षा-10 में आधुनिक काल की धाराएँ छायावाद तक ही आती हैं। शुक्ल जी का ग्रंथ भी 1927 ई0 पर समाप्त हो जाता है, इसलिए ये तीनों उसमें हैं ही नहीं। इन्हें जोड़ना दूसरी कक्षा का उत्तर लिखना है।
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'उत्तर मध्यकाल' और 'रीतिकाल' को दो अलग काल समझना
ये एक ही काल के दो नाम हैं — पहला काल-क्रम में उसकी स्थिति बताता है, दूसरा उसकी प्रधान प्रवृत्ति। यही जोड़ी 'आधुनिक काल' और 'गद्यकाल' की भी है। प्रश्न किसी भी नाम से आ सकता है, उत्तर वही रहेगा।
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शुक्ल जी को छायावाद का समर्थक बताना
वे समर्थक नहीं थे। उनके ग्रंथ में छायावाद पर 'भारतीय काव्यधारा से इनका पार्थक्य' और यूरोप के वादों को हिन्दी में चलाने की 'अनधिकार चेष्टा' जैसी पंक्तियाँ हैं। आज की पुस्तकें छायावाद की प्रशंसा में लिखी जाती हैं, इसलिए यह उलटा याद रह जाता है।
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यह मान लेना कि कक्षा-10 में छायावाद से आगे नहीं पूछा जाता
बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र का पहला ही प्रश्न 'दूसरा सप्तक' (1951) पर है, जो प्रयोगवाद है और शुक्ल जी के ग्रंथ से बाहर। छायावाद तक शुक्ल जी से पढ़िए, पर सप्तक के चारों वर्ष अलग से याद कीजिए।
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'कठिन काव्य का प्रेत' को शुक्ल जी के 'इतिहास' का उद्धरण बताना
परीक्षा में कर्ता के रूप में रामचन्द्र शुक्ल ही अंकित कीजिए, पर यह पदबंध उनके 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में कहीं नहीं है। उसमें केशव पर उनका वाक्य है — 'केशव को कविहृदय नहीं मिला था।' अर्थ वही है, शब्द वे नहीं।

Practice problems

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Readiness check

Are you exam-ready for हिन्दी पद्य साहित्य का विकास — रीतिकाल एवं आधुनिक काल?

12 problems from this chapter. Try each one, reveal the worked solution, mark yourself honestly — get your gap report at the end.

12 questions~8 min

5-minute revision

The whole chapter, distilled. Read this the night before the exam.

  • साहित्य जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब है — शुक्ल जी के काल-विभाजन का यही आधार है
  • काल का नाम प्रधान प्रवृत्ति बताता है; उस काल में दूसरी तरह की रचनाएँ भी होती रहीं
  • आदिकाल का दूसरा नाम वीरगाथाकाल, सीमा संवत् 1050–1375 (993–1318 ई0)
  • पूर्व मध्यकाल का दूसरा नाम भक्तिकाल, सीमा संवत् 1375–1700 (1318–1643 ई0)
  • उत्तर मध्यकाल का दूसरा नाम रीतिकाल, सीमा संवत् 1700–1900 (1643–1843 ई0)
  • आधुनिक काल का दूसरा नाम गद्यकाल, सीमा संवत् 1900–1984 (1843–1927 ई0)
  • ईस्वी वर्ष निकालने का नियम — संवत् में से 57 घटाइए
  • कक्षा-10 के पद्य-इतिहास में केवल रीतिकाल और आधुनिक काल हैं
  • रीतिकाल का नाम लक्षण-उदाहरण पद्धति से पड़ा — दोहे में लक्षण, कवित्त या सवैया में उदाहरण
  • काव्यांगों का शास्त्रीय निरूपण सबसे पहले केशवदास ने किया
  • रीतिग्रंथों की अखंड परंपरा चिन्तामणि त्रिपाठी से चली, केशव के लगभग पचास वर्ष बाद
  • केशव ने भामह और उद्भट से सामग्री ली; बाद के रीतिकार चंद्रालोक और कुवलयानंद पर चले
  • रीतिबद्ध कवि — केशवदास, चिन्तामणि त्रिपाठी, देव, मतिराम, भिखारीदास
  • रीतिसिद्ध कवि — बिहारी लाल, रसनिधि; इन्होंने लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा
  • रीतिमुक्त कवि — घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर; परंपरा के बंधन से मुक्त
  • भूषण रीतिकाल के कवि हैं पर उनका रस वीर है — शिवराजभूषण, शिवाबावनी, छत्रसालदशक
  • शुक्ल जी का निर्णय — रीतिकाल के लक्षण-ग्रंथकार वास्तव में कवि थे, आचार्य नहीं
  • इसका कारण उन्होंने यह दिया कि गद्य विकसित नहीं था और पद्य में मीमांसा हो नहीं सकती
  • आधुनिक काल गद्यकाल कहलाया क्योंकि खड़ी बोली गद्य इसी में जन्मा और साहित्यिक भाषा बना
  • काव्यभाषा रीतिकाल तक ब्रजभाषा थी; आधुनिक काल में कविता खड़ी बोली में आई
  • प्रथम उत्थान संवत् 1925–1950 (1868–1893 ई0) — भारतेंदु युग
  • द्वितीय उत्थान संवत् 1950–1975 (1893–1918 ई0) — द्विवेदी युग
  • तृतीय उत्थान संवत् 1975 से (1918 ई0 से) — शुक्ल युग, जिसकी प्रधान धारा छायावाद है
  • 'शुक्ल युग' नाम बाद के आलोचकों का है; शुक्ल जी का अपना शब्द 'तृतीय उत्थान' है
  • द्वितीय उत्थान के कवि — श्रीधर पाठक, हरिऔध, महावीर प्रसाद द्विवेदी और द्विवेदी मंडल
  • मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी मंडल के कवि हैं, इसलिए द्विवेदी युग के
  • छायावाद का संकुचित अर्थ रहस्यवाद है, व्यापक अर्थ लाक्षणिक-चित्रात्मक काव्यशैली
  • छायावाद की पहचान — प्रकृति का मानवीकरण, वैयक्तिक अनुभूति, लाक्षणिक भाषा, खड़ी बोली
  • छायावाद के चार स्तंभ — प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी
  • शुक्ल जी छायावाद के समर्थक नहीं थे; उन्होंने इसे भारतीय काव्यधारा से पृथक् माना
  • शुक्ल जी का ग्रंथ 1927 ई0 पर समाप्त होता है — प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता उसमें नहीं हैं
  • सप्तक अज्ञेय द्वारा संपादित; हर संकलन में सात कवि
  • तार सप्तक 1943, दूसरा सप्तक 1951, तीसरा सप्तक 1959, चौथा सप्तक 1979
  • 'कठिन काव्य का प्रेत' — उत्तर रामचन्द्र शुक्ल, पर यह पदबंध उनके 'इतिहास' में नहीं है
  • शुक्ल जी का अपना वाक्य: 'केशव को कविहृदय नहीं मिला था'

Uttar Pradesh (UPMSP) marks blueprint

Where the marks come from in this chapter — so you can plan your prep.

Typical chapter weightage: यूनिट 2 (i) — पद्य साहित्य का इतिहास: 05 अंक (पाठ्यक्रम की इकाईवार तालिका)। प्रश्नपत्र में यह खण्ड-अ का प्रश्न 2 है, 5×1=5, सब बहुविकल्पीय।

Question typeMarks eachTypical countWhat it tests
बहुविकल्पीय (खण्ड-अ, प्रश्न 2)15कालों के नाम, दूसरे नाम और संवत् सीमाएँ; रीतिकाल का नामकरण तथा परंपरा का आरंभ; रीतिबद्ध-रीतिसिद्ध-रीतिमुक्त वर्गीकरण; तीन उत्थान और उनके युग-नाम; कोई कवि किस युग का; छायावाद की मुख्य विशेषता
लघु उत्तरीय — इस यूनिट में बोर्ड नहीं पूछता, समझ जाँचने के लिए2-30 (अभ्यास हेतु)यही सामग्री खण्ड-ब प्रश्न 6 (ख) के कवि-जीवन-परिचय (3+2=5) में परोक्ष रूप से काम आती है, जहाँ कवि को उसके युग में रखना पड़ता है
Prep strategy
  • पहले चारों कालों की तालिका कंठस्थ कीजिए — नाम, दूसरा नाम, संवत्। यही आधा यूनिट है
  • हर संवत् के साथ ईस्वी भी लिखिए। विकल्पों में दोनों मिलाकर रखे जाते हैं और यही जाल है
  • दोनों नाम-जोड़ियाँ अलग से याद रखिए: उत्तर मध्यकाल = रीतिकाल, आधुनिक काल = गद्यकाल
  • रीतिकाल के लिए एक ही पंक्ति काफी है — केशव ने पहले किया, चिन्तामणि से परंपरा चली, बीच में पचास वर्ष
  • तीन धाराओं के कवियों की सूची लिखकर रटिए; इसमें नाम अदल-बदल कर पूछे जाते हैं
  • तीन उत्थानों की संवत् सीमाएँ और उनके युग-नाम एक साथ याद कीजिए, अलग-अलग नहीं
  • अपने पद्य खण्ड के तेरह कवियों को उनके काल या युग के सामने लिखिए — इससे दोनों यूनिट एक साथ तैयार होते हैं
  • छायावाद के लिए चार शब्द याद रखिए: मानवीकरण, वैयक्तिकता, लाक्षणिकता, खड़ी बोली

Where this shows up in the real world

This chapter isn't just an exam topic — it lives in the world around you.

पद्य खण्ड के तेरह निर्धारित कवियों को उनके काल और युग में…

पद्य खण्ड के तेरह निर्धारित कवियों को उनके काल और युग में रखना — यही ज्ञान खण्ड-ब के 3+2=5 अंक वाले जीवन-परिचय प्रश्न की रीढ़ है

किसी भी हिन्दी कविता को पढ़ते ही उसकी भाषा से काल पहचान लेना

किसी भी हिन्दी कविता को पढ़ते ही उसकी भाषा से काल पहचान लेना — ब्रजभाषा का श्रृंगार-दोहा रीतिकाल का है, खड़ी बोली की प्रकृति-कविता छायावाद की

यह समझना कि साहित्य क्यों बदलता है

यह समझना कि साहित्य क्यों बदलता है — शुक्ल जी की चित्तवृत्ति वाली दृष्टि इतिहास और नागरिक शास्त्र के उत्तरों में भी काम आती है

कक्षा-11 और 12 की हिन्दी में यही काल-विभाजन आगे बढ़ता है

कक्षा-11 और 12 की हिन्दी में यही काल-विभाजन आगे बढ़ता है, इसलिए यहाँ बना ढाँचा दो वर्ष और चलता है

यू0पी0 पुलिस

यू0पी0 पुलिस, यू0पी0एस0एस0एस0सी0 और लेखपाल जैसी राज्य भर्ती परीक्षाओं के सामान्य हिन्दी खंड में कवि-कृति-काल के प्रश्न इसी सूची से आते हैं

किसी पुस्तक या गाइड की गलती पकड़ लेना

किसी पुस्तक या गाइड की गलती पकड़ लेना — जैसे रीतिपरंपरा का आरंभ केशवदास से बता देना, जो एक बहुत प्रचलित भूल है

Exam strategy

Battle-tested tips from teachers and toppers for this chapter.

1
खण्ड-अ ओ0एम0आर0 शीट पर है — गोला पूरा काला कीजिए, और उत्तर अंकित करने के बाद न काटिए, न इरेजर या व्हाइटनर लगाइए। यह निर्देश आधिकारिक मॉडल प्रश्नपत्र में स्पष्ट लिखा है
2
प्रारंभ के 15 मिनट प्रश्नपत्र पढ़ने के लिए हैं — इन्हीं में इतिहास वाले पाँचों प्रश्न पहचान लीजिए, क्योंकि इन्हें सोचने में समय नहीं लगता
3
तिथि वाले प्रश्न में पहले देखिए कि विकल्प संवत् में हैं या ईस्वी में; यही सबसे आम जाल है
4
कवि-वर्गीकरण के प्रश्न में हर विकल्प की धारा मन में बोलिए, फिर जो अलग पड़े वही उत्तर है
5
छायावाद की विशेषता पूछी जाए तो दूसरे कालों से उठाए गए विकल्प पहचानिए — युद्ध-वर्णन वीरगाथाकाल का है, भक्ति की प्रधानता भक्तिकाल की
6
'सबसे पहले' और 'परंपरा का आरंभ' — इन दो पदों को अलग-अलग पढ़िए; केशव और चिन्तामणि का पूरा अंतर इन्हीं दो शब्दों पर टिका है
7
इतिहास वाले उत्तर में विवरण मत जोड़िए — यह बहुविकल्पीय भाग है, यहाँ केवल सही विकल्प चाहिए
8
यदि जीवन-परिचय वाले वर्णनात्मक प्रश्न में कवि का युग लिखने का अवसर मिले तो अवश्य लिखिए, क्योंकि यह उत्तर को इतिहास से जोड़ देता है

Going beyond the textbook

For olympiad aspirants and curious learners — topics that build on this chapter.

STRETCH
शुक्ल जी कहते हैं कि रीतिकाल में गंभीर आलोचना इसलिए न हो सकी क्योंकि गद्य नहीं था। इस तर्क को उलटकर देखिए — क्या भक्तिकाल में भी यही बाधा थी, और यदि हाँ, तो भक्तिकाल की महानता किस बात में मानी जाती है?
STRETCH
शुक्ल जी ने काल का नाम प्रधान प्रवृत्ति पर रखा। भूषण जैसे कवि इस नियम के अपवाद हैं। सोचिए कि यदि नामकरण का आधार भाषा होती (ब्रजभाषा काल, खड़ी बोली काल) तो विभाजन कहाँ-कहाँ बदल जाता
STRETCH
'छायावाद' शब्द के अनेकार्थी प्रयोग पर शुक्ल जी की आपत्ति थी। किसी एक छायावादी कविता को लेकर दिखाइए कि उसमें रहस्यवाद वाला अर्थ लागू होता है या शैली वाला — और क्या दोनों एक साथ हो सकते हैं
STRETCH
रीतिमुक्त कवि रीतिकाल में ही थे, फिर भी परंपरा से मुक्त थे। पता कीजिए कि घनानंद की भाषा और भाव रीतिबद्ध कवियों से किन दो बातों में स्पष्ट अलग पड़ते हैं
STRETCH
शुक्ल जी का ग्रंथ 1927 ई0 पर रुक जाता है। यदि वे बीस वर्ष और लिखते तो प्रगतिवाद को वे किस दृष्टि से देखते — उनके छायावाद संबंधी विचारों से अनुमान लगाइए और अपना तर्क लिखिए
STRETCH
अपने पद्य खण्ड के तेरहों कवियों की एक समय-रेखा बनाइए। देखिए कि कौन-सा काल सबसे अधिक भरा है और कौन-सा खाली — और सोचिए कि पाठ्यक्रम ने वह चुनाव क्यों किया होगा

Where else this chapter is tested

CBSE board isn't the only one — other exams test this chapter too.

यू0पी0 बोर्ड हाईस्कूल परीक्षा — हिन्दी (विषय कोड 901), खण्ड-अ प्रश्न 2
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-10 के चारों यूनिट टेस्ट, जिनमें दो पूर्णतः बहुविकल्पीय हैं
यू0पी0 बोर्ड कक्षा-11 और 12 हिन्दी, जहाँ यही काल-विभाजन विस्तार से आता है
यू0पी0 पुलिस, लेखपाल और यू0पी0एस0एस0एस0सी0 पी0ई0टी0 के सामान्य हिन्दी खंड
सी0टी0ई0टी0 तथा यू0पी0टी0ई0टी0 के हिन्दी भाषा प्रश्नपत्र

Questions students ask

The real ones — pulled from the Q&A community and tutor sessions.

दोनों उत्तर सही हैं, पर अलग-अलग प्रश्नों के। काव्यांगों का शास्त्रीय निरूपण सबसे पहले केशवदास ने किया — शुक्ल जी को इसमें कोई संदेह नहीं। पर रीतिग्रंथों की अखंड परंपरा उनसे नहीं चली; वह लगभग पचास वर्ष बाद चिन्तामणि त्रिपाठी से आरंभ हुई, और शुक्ल जी लिखते हैं कि 'आरंभ उन्हीं से मानना चाहिए।' प्रश्न में यदि 'सबसे पहले निरूपण' है तो केशव, और यदि 'परंपरा का आरंभ' है तो चिन्तामणि। शब्द ध्यान से पढ़िए।

क्योंकि नाम उस बात पर पड़ा जो इस काल में पहली बार हुई। कविता तो हर काल में लिखी गई — पर खड़ी बोली गद्य इसी काल में जन्मा और साहित्यिक भाषा बना। निबंध, नाटक, उपन्यास, आलोचना और पत्र-पत्रिका सब इसी काल की देन हैं। इससे पहले हिन्दी में जो कुछ लिखा जाता था, वह लगभग सारा पद्य में था — और शुक्ल जी के अनुसार यही कारण था कि रीतिकाल में गंभीर आलोचना हो ही न सकी।

एक ही नियम है — ईस्वी = संवत् − 57। रीतिकाल संवत् 1700–1900 है, तो ईस्वी में 1643–1843। एक सुरक्षा-जाँच याद रखिए: विकल्पों में यदि चार अंकों की संख्या 1700 या 1900 जैसी 'गोल' दिखे तो वह प्रायः संवत् है, और 1643 या 1843 जैसी 'विषम' दिखे तो ईस्वी। परीक्षा में विकल्प इसी भ्रम पर बनाए जाते हैं, इसलिए हर तिथि के साथ यह भी लिखकर याद कीजिए कि वह संवत् है या ईस्वी।

अंतर सिर्फ इस पर है कि कवि का लक्षण-ग्रंथ की परंपरा से क्या संबंध था। रीतिबद्ध — परंपरा से बँधे, लक्षण भी लिखा और उदाहरण भी (केशव, चिन्तामणि, देव, मतिराम)। रीतिसिद्ध — रीति में सिद्ध थे पर लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा, सीधे काव्य लिखा (बिहारी)। रीतिमुक्त — बंधन से मुक्त, स्वच्छंद प्रेम-काव्य (घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर)। तीनों एक ही काल के हैं; अंतर समय का नहीं, परंपरा से संबंध का है।

नहीं, और यह सोचकर देखिए तो स्पष्ट भी है — कोई अपने ही नाम पर युग का नाम नहीं रखता। शुक्ल जी की अपनी शब्दावली 'तृतीय उत्थान' है, और वह संवत् 1975 यानी 1918 ई0 से आरंभ होती है। 'शुक्ल युग' और 'शुक्लोत्तर युग' नाम बाद के आलोचकों ने दिए। यही कारण है कि शुक्ल युग की तिथि 1918 से मानी जाती है — वह तिथि शुक्ल जी की अपनी दी हुई है, नाम भले न हो।

वे उसके प्रशंसक नहीं थे, और यह जानना ज़रूरी है क्योंकि आज की पुस्तकें छायावाद की प्रशंसा में लिखी जाती हैं। उनके ग्रंथ में छायावाद पर 'भारतीय काव्यधारा से इनका पार्थक्य' जैसी पंक्ति है, 'छायावाद' शब्द के अनेकार्थी प्रयोग पर आपत्ति है, और यूरोप के दूसरे वादों को हिन्दी में चलाने को उन्होंने 'अनधिकार चेष्टा' तक कहा है। परीक्षा में छायावाद की विशेषताएँ पूछी जाती हैं, राय नहीं — पर यदि शुक्ल जी की दृष्टि पूछी जाए तो उत्तर आलोचनात्मक है, प्रशंसात्मक नहीं।

कक्षा-10 के पद्य-इतिहास के लिए नहीं। पाठ्यक्रम 'रीतिकाल एवं आधुनिककाल' कहता है और आधुनिक काल की जो धाराएँ यहाँ पूछी जाती हैं वे छायावाद तक आती हैं। शुक्ल जी का ग्रंथ भी 1927 ई0 पर समाप्त हो जाता है, इसलिए ये तीनों उसमें हैं ही नहीं — प्रगतिवाद 1936 के बाद का है और प्रयोगवाद 1943 के बाद का। समय बचाइए और उसे रीतिकाल की तीन धाराओं पर लगाइए, जहाँ से प्रश्न निश्चित रूप से आता है।

बहुत सीधा संबंध है, और इसे जोड़ लेने से दो यूनिट एक साथ तैयार हो जाती हैं। बिहारी लाल आपके पद्य खण्ड में हैं और इतिहास में रीतिसिद्ध धारा के कवि हैं। मैथिलीशरण गुप्त आपके पद्य खण्ड में हैं और द्विवेदी युग के हैं। सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा आपके पद्य खण्ड में हैं और छायावाद के चार स्तंभों में से दो हैं। एक तालिका बनाइए जिसमें तेरहों निर्धारित कवियों के सामने उनका काल या युग लिखा हो — यही खण्ड-अ के इतिहास वाले प्रश्नों और खण्ड-ब के जीवन-परिचय वाले प्रश्नों, दोनों में काम आती है।

हाँ, थोड़ा। पाठ्यक्रम 'रीतिकाल एवं आधुनिककाल' कहता है और उसकी कोई ऊपरी सीमा नहीं देता। बोर्ड के मॉडल प्रश्नपत्र का पहला ही प्रश्न 'दूसरा सप्तक' (1951) पर है, जो प्रयोगवाद है। इसलिए छायावाद तक का विवेचन शुक्ल जी से पढ़िए — वह गहरा और प्रामाणिक है — और उसके आगे के लिए कम से कम सप्तक के चारों वर्ष तथा प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता के नाम याद रखिए।
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